ब्रिक्स देशों की बढ़ती एकजुटता और डी-डॉलराइजेशन की कोशिशों से अमेरिका की चिंता बढ़ सकती है। जानिए चीन, रूस और भारत की रणनीति का डॉलर पर क्या असर होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आर्थिक नीतियों और टैरिफ के दबाव के बीच ब्रिक्स देशों की बढ़ती एकजुटता ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या चीन, भारत और रूस मिलकर डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की दिशा में कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं?
क्या ब्रिक्स का बढ़ता सहयोग अमेरिका की आर्थिक ताकत पर असर डाल सकता है? दिल्ली के भारत मंडपम में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक मंच पर मौजूदगी ने इस चर्चा को और हवा दे दी।
दरअसल, ब्रिक्स देशों के बीच बढ़ता आर्थिक सहयोग ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका अपनी व्यापार नीति में टैरिफ को एक बड़े हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत कई देशों पर लगाए गए शुल्क को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में असहमति देखने को मिली है। ऐसे माहौल में ब्रिक्स देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
अगर यह प्रक्रिया बड़े स्तर पर आगे बढ़ती है तो इसका असर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर पड़ सकता है। वजह यह है कि अमेरिकी डॉलर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेन-देन में सबसे प्रभावशाली मुद्रा बना हुआ है। ब्रिक्स देशों की ओर से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान माध्यमों को बढ़ावा देने की कोशिश अमेरिका के आर्थिक प्रभाव के लिए चुनौती मानी जा रही है।
इस पूरी रणनीति में चीन और रूस की भूमिका खास मानी जा रही है। दोनों देश लंबे समय से डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में काम कर रहे हैं। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद यह प्रयास और तेज हुआ है।
रूस के विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापारिक लेन-देन में चीनी युआन की भूमिका भी पहले की तुलना में बढ़ी है। इसका मकसद यह है कि पश्चिमी वित्तीय प्रणाली पर किसी एक देश की निर्भरता कम की जा सके।
बैंकिंग के मोर्चे पर भी चीन और रूस अपने वैकल्पिक सिस्टम विकसित कर चुके हैं। चीन का CIPS यानी Cross-Border Interbank Payment System अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए इस्तेमाल किया जाता है,
जबकि रूस ने पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के बीच SPFS नाम की भुगतान प्रणाली विकसित की है। ऐसे में दोनों देशों के पास SWIFT से अलग वित्तीय नेटवर्क का विकल्प मौजूद है। हालांकि इन प्रणालियों की वैश्विक पहुंच और डॉलर आधारित व्यवस्था के बराबर प्रभाव को लेकर अभी कई सीमाएं बनी हुई हैं।
अब सबसे अहम सवाल भारत की भूमिका को लेकर है। भारत इस पूरे मामले में सीधे किसी एक खेमे में खड़े होने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता रहा है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग करता है, तो दूसरी ओर ब्रिक्स और SCO के माध्यम से रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों के साथ भी संवाद बनाए रखता है।
यही वजह है कि भारत की स्थिति चीन और रूस से कुछ अलग दिखाई देती है। भारत डॉलर व्यवस्था को अचानक खत्म करने की बात करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी जरूरत और रणनीतिक हितों के अनुसार विकल्पों को मजबूत करने पर जोर देता है।
रूस के साथ ऊर्जा और व्यापारिक संबंध, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और चीन के साथ जटिल लेकिन जरूरी संवाद—इन सभी के बीच भारत संतुलन साधने की कोशिश करता है।
ऐसे में यह सवाल लगातार चर्चा में है कि क्या मोदी, पुतिन और जिनपिंग की यह साझेदारी ट्रम्प की आर्थिक रणनीति के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है। अगर ब्रिक्स के बड़े देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाते हैं
और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां मजबूत होती हैं, तो लंबे समय में डॉलर की मांग पर कुछ असर पड़ सकता है। इससे अमेरिका की आर्थिक नीतियों के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश भी मजबूत हो सकती है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डॉलर की वैश्विक स्थिति सिर्फ अमेरिकी ताकत पर निर्भर नहीं है, बल्कि दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में उसकी गहरी स्वीकार्यता, अमेरिकी वित्तीय बाजारों की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में लंबे समय से बने भरोसे से भी जुड़ी है। दूसरी ओर ब्रिक्स देशों के अपने-अपने आर्थिक और रणनीतिक हित हैं, जो हमेशा एक जैसे नहीं होते।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद इसका बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा चीन और भारत के आर्थिक हितों में भी कई जगह प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। ऐसे में सिर्फ ब्रिक्स देशों के एक मंच पर आने से डॉलर का वर्चस्व तुरंत खत्म हो जाएगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल इतना जरूर है कि ब्रिक्स के भीतर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर निर्भरता घटाने की चर्चा ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिक्स की यह रणनीति कितनी दूर तक जाती है और क्या अमेरिका के आर्थिक दबदबे को वास्तव में कोई बड़ी चुनौती मिल पाती है।
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