महाराष्ट्र की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर बेटियों की पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए साड़ी में मैराथन दौड़ीं। चप्पल हाथ में लेकर नंगे पैर दौड़ते हुए हासिल की जीत।
मां की ममता और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उसका संघर्ष किस हद तक जा सकता है, महाराष्ट्र के बीड जिले से सामने आई एक कहानी इसकी शानदार मिसाल पेश करती है। अंबाजोगाई की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने अपनी बेटियों की पढ़ाई के लिए ऐसी दौड़ लगाई, जिसने प्रतियोगिता देखने वालों के साथ-साथ सोशल मीडिया यूजर्स का भी ध्यान खींच लिया।
खास बात यह रही कि रमाबाई किसी विशेष स्पोर्ट्स ड्रेस या महंगे रनिंग शूज के साथ मैदान में नहीं उतरी थीं। उन्होंने साड़ी पहनकर दौड़ में हिस्सा लिया और रास्ते की मुश्किलों के बावजूद आखिर तक हिम्मत नहीं छोड़ी।
अंबाजोगाई में आयोजित ‘अमृत दौड़’ प्रतियोगिता में रमाबाई भी प्रतिभागी बनीं। दौड़ शुरू होने के बाद उनकी चप्पलें रास्ते में बार-बार परेशानी पैदा करने लगीं।
కూతుళ్ల చదువు కోసం…
కాళ్లకు చెప్పులు కూడా లేకుండా పరుగెత్తింది!బాధ్యతలు అడ్డొచ్చినా…
పేదరికం వెంటాడినా…
తన కూతుళ్ల భవిష్యత్తు కోసం ఓ తల్లి మారథాన్లో పాల్గొని విజయం సాధించింది!ఆమె గెలిచింది కేవలం ఒక రేసు కాదు…
తన కూతుళ్ల కలలకు బాట వేసింది! #Mother #DaughtersEducation… pic.twitter.com/H7nkGVYz4W— Telugu Stride (@TeluguStride) August 31, 2026
ऐसे में उन्होंने चप्पल पैरों से निकालकर हाथ में पकड़ ली और नंगे पैर ही दौड़ जारी रखी। बारिश के कारण रास्ते में कीचड़ था और जगह-जगह पत्थर भी पड़े थे, लेकिन इन परिस्थितियों ने उनके कदम नहीं रोके। साड़ी संभालते हुए उन्होंने पूरी ताकत के साथ दौड़ लगाई और अंत में प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल कर लिया।
रमाबाई की इस जीत को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने मैराथन के लिए किसी तरह की विशेष ट्रेनिंग नहीं ली थी। जहां दूसरे प्रतियोगी तैयारी और स्पोर्ट्स ड्रेस के साथ पहुंचे थे, वहीं रमाबाई के पास न प्रशिक्षण था और न ही दौड़ने के लिए विशेष जूते।
उनके पास केवल जीतने की दृढ़ इच्छा और अपनी बेटियों के भविष्य को बेहतर बनाने का संकल्प था। यही जज्बा उन्हें कठिन रास्ते पर लगातार आगे बढ़ाता रहा।
रमाबाई का जीवन भी लंबे संघर्षों से जुड़ा रहा है। पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया।
वह अंबाजोगाई की एक अकादमी में रसोइए के तौर पर काम करती हैं और मेहनत से परिवार का खर्च चलाती हैं। उनकी एक बेटी बीएससी की पढ़ाई कर रही है, जबकि दूसरी बेटी पुलिस भर्ती की तैयारी में जुटी है। बेटियों की शिक्षा का खर्च पूरा करने के लिए रमाबाई लगातार मेहनत करती हैं।
मैराथन में जीत के बाद उन्हें पुरस्कार के तौर पर 3 हजार रुपये मिले। रकम भले ही बड़ी न हो, लेकिन रमाबाई के लिए यह राशि बेहद मायने रखती है। उन्होंने तय किया कि इस इनाम का इस्तेमाल भी अपनी बेटियों की पढ़ाई में करेंगी। उनके लिए यह प्रतियोगिता सिर्फ जीत हासिल करने का जरिया नहीं थी, बल्कि बेटियों के सपनों को पूरा करने की कोशिश का हिस्सा थी।
रमाबाई की कहानी यह बताती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत इरादा इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देता है। न प्रशिक्षण, न स्पोर्ट्स शूज और न ही आसान रास्ता, इसके बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत से बाजी मार ली।
उनकी तस्वीर और वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं और लोग उनके संघर्ष को सलाम कर रहे हैं। रमाबाई ने साबित किया कि मां अपने बच्चों के भविष्य के लिए मुश्किल से मुश्किल रास्ता भी तय करने का हौसला रखती है।
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