SIR पर ममता बनर्जी का हमला: बोलीं—चुनाव आयोग बंगाल को कर रहा है टारगेट, नामों के मामूली मिसमैच पर नोटिस हों वापस!
पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन “SIR” को लेकर सियासी और कानूनी टकराव बुधवार को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। सुनवाई के दौरान राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अदालत में मौजूद रहीं और उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग जान बूझकर बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है।
ममता ने कहा कि जिस प्रक्रिया को सामान्य तौर पर दो साल में पूरा किया जाना चाहिए था, उसे महज तीन महीनों में जबरन लागू किया जा रहा है, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक पेशी
यह पहला मौका रहा जब किसी मौजूदा मुख्यमंत्री ने खुद सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर अपनी बात रखी।
आमतौर पर ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री की ओर से वकील दलील देते हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने स्वयं हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वह इस मुद्दे से सीधे तौर पर जुड़ी हैं और राज्य के लोगों की पीड़ा को नजदीक से जानती है।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि वास्तविक मतदाताओं को किसी भी कीमत पर वोटर लिस्ट से बाहर ने किया जाए।
नाम के मामूली अंतर पर नोटिस का मुद्दा
ममता बनर्जी और उनके वकीलों ने दलील दी कि लाखों मतदाताओं को केवल नाम या स्पेलिंग में मामूली अंतर के आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं। बंगाली से अंग्रेज़ी में अनुवाद के दौरान दत्ता, गांगुली या रॉय जैसे नामों की वर्तनी बदल जाना आम बात है, लेकिन इन्हीं कारणों से लोगों को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी की श्रेणी में डाल दिया गया।
मुख्यमंत्री ने मांग की कि ऐसे मामलों में जारी नोटिस तत्काल वापस लिए जाएं क्योंकि इससे समय की कमी के बीच आम लोग बेवजह परेशान हो रहे हैं।
असम को लेकर सवाल, बंगाल पर ही क्यों सख्ती?
मुख्यमंत्री ने अदालत में सवाल उठाया कि जब चार राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में चुनाव होने हैं, तो SIR की सख्ती केवल कुछ राज्यों में ही क्यों दिखाई दे रही है?
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उन्होंने खास तौर पर असम का जिक्र करते हुए कहा कि वहां ऐसी प्रक्रिया लागू नहीं की जा रही जबकि बंगाल में चुनाव से ठीक पहले इतनी तेजी दिखाई जा रही है। ममता ने इसे चयनात्मक कार्रवाई बताते हुए कहा कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
अदालत की टिप्पणियां और इसके समाधान
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि असली और पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी माना कि नामों की स्पेलिंग या स्थानीय बोली के कारण होने वाली गलतियों का समाधान निकाला जाना चाहिए।
अदालत ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार ऐसे अधिकारियों की टीम उपलब्ध कराए, जो बंगाली और स्थानीय भाषाओं को समझते हों ताकि जांच के दौरान वास्तविक मतदाताओं को राहत मिल सके। साथ ही, कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से तय समय सीमा में जवाब मांगा है।
ममता ने लगाए कई आरोप
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि खेती के मौसम और लोगों के प्रवास के दौरान इस प्रक्रिया को लागू करना अव्यावहारिक है। उन्होंने कहा कि इस जल्दबाजी के कारण कई लोग तनाव में हैं, कुछ बीमार पड़े हैं और कई परिवार मानसिक दबाब झेल रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि बड़ी संख्या में नाम हटाए गए, जबकि लोगों को अपील का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
सवाल पॉलिटिक्स-वाला
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह व्यावहारिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है और किसी भी तरह की असंवेदनशील कार्रवाई से बचा जाना चाहिए। अब अगली सुनवाई में यह तय होगा कि SIR की प्रक्रिया में क्या बदलाव किए जाते हैं और नामों के मामूली अंतर से जुड़े मामलों में मतदाताओं को किस तरह की राहत मिलती है।
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