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दिल्ली। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के भीतर नेतृत्व को लेकर रस्साकशी अब चरम पर पहुंच गई है, जिससे दिल्ली में बैठे पार्टी हाईकमान के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं।
,मीडिया रिपोर्ट बताती है कि उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार (डीकेएस) अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा कर रहे हैं। उनका मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद हुए एक “डील” के तहत, जिसमें कार्यकाल को आधा-आधा बांटने की बात थी, अब उनका नंबर है। उनके पास ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट के उदाहरण मौजूद हैं कि अपना अगला कदम कैसे तय करना है।
पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस संकट में हस्तक्षेप करते हुए कहा है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ मिलकर इस मुद्दे को सुलझाया जाएगा। डीकेएस का दावा है कि सत्ता साझा करने को लेकर छह-सात लोगों की मौजूदगी में एक “डील” हुई थी, जबकि सिद्धारमैया का खेमा ऐसी किसी भी डील से साफ इनकार करता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पार्टी प्रबंधकों (जैसे रणदीप सुरजेवाला और के.सी. वेणुगोपाल) के पास सिद्धारमैया को हटाने या डीकेएस को मनाने का कोई ठोस आधार या “लीवरेज” नहीं है, क्योंकि विधायकों का बहुमत अभी भी सिद्धारमैया के साथ है. आज तक विधायकों की गिनती भी नहीं कराई गई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि यह मामला कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए भी पेचीदा है. राहुल गांधी, जो देश भर में जाति जनगणना और ओबीसी/दलित राजनीति की वकालत करते रहे हैं, उनके लिए एक ओबीसी मुख्यमंत्री (सिद्धारमैया) को हटाना राजनीतिक रूप से विनाशकारी हो सकता है।
वर्तमान में कांग्रेस के पास केवल तीन राज्य हैं—हिमाचल और तेलंगाना में मुख्यमंत्री सवर्ण (रेड्डी और राजपूत) हैं, केवल कर्नाटक में ओबीसी सीएम है। वहीं, डीकेएस को प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी का करीबी माना जाता है और वे नकदी की कमी से जूझ रही पार्टी के लिए ‘फंड मैनेजर’ की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कांग्रेस को अतीत की एक बड़ी गलती का भी डर है. 35 साल पहले, राजीव गांधी ने हवाई अड्डे पर ही तत्कालीन सीएम वीरेंद्र पाटिल (लिंगायत समुदाय के नेता) को हटाने की घोषणा कर दी थी।
इस अपमानजनक विदाई ने लिंगायत समुदाय को कांग्रेस से दूर कर दिया और राज्य में भाजपा के उदय का रास्ता खोल दिया. राहुल गांधी उस इतिहास को दोहराना नहीं चाहेंगे. रिपोर्ट के मुताबिक, सिद्धारमैया बिना लड़ाई के नहीं जाएंगे और अगर उन्हें हटाया गया तो वे अपने किसी करीबी को सीएम बनाने की कोशिश करेंगे. वहीं, डीकेएस के पास यह तय करने का विकल्प है कि वे सिंधिया की तरह बगावत करें या पायलट की तरह इंतजार करें।
“द हिंदू” में खबर है कि कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर सत्ता हस्तांतरण को लेकर चल रहा संघर्ष अब शायद किसी नतीजे की ओर आगे बढ़त नज़र आ रहा है. संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले, कांग्रेस आलाकमान से कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके डिप्टी डी.के. शिवकुमार (जो पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष भी हैं) के बीच ‘सत्ता संघर्ष’ पर फैसला आने की उम्मीद है।
ख़बर के मुताबिक, डीके शिवकुमार, राहुल गांधी (जो अपनी मां के साथ सत्तारूढ़ जोड़ी से मिलने की उम्मीद कर रहे हैं) को 2023 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की जीत के समय हुए एक अनौपचारिक ‘सत्ता-साझाकरण समझौते’ से अवगत कराने के लिए भी उत्सुक हैं। वे इसमें कितना कामयाब होते हैं, यह सामने आने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
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