चांचल का 'महा-संग्राम': खाकी, खादी और भोजपुरी तड़के के बीच 92% मतदान ने बढ़ाई धड़कनें

चांचल का ‘महा-संग्राम’: खाकी, खादी और भोजपुरी तड़के के बीच 92% मतदान ने बढ़ाई धड़कनें

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चांचल का ‘महा-संग्राम’: खाकी, खादी और भोजपुरी तड़के के बीच 92% मतदान ने बढ़ाई धड़कनें

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(कोलकाता से लौटकर नैवेद्य पुरोहित)

बंगाल के मालदा जिले का चांचल क्षेत्र गुरुवार को राजनीति के हर रंग का गवाह बना। एक तरफ प्रशासन का ‘अनुभव’ है, तो दूसरी तरफ ‘स्टार पावर’ की चमक। पहले चरण के मतदान में 92% के करीब रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हुई है, जिसने राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। यह भारी मतदान पश्चिम बंगाल के बदलते मिजाज और ‘खामोश गुस्से’ या ‘प्रचंड समर्थन’ की ओर इशारा कर रहा है।

उम्मीदवारों का प्रोफाइल: खाकी बनाम सियासत
इस बार चांचल की जंग काफी दिलचस्प है क्योंकि मैदान में उतरे चेहरे अपने आप में अलग पहचान रखते हैं:
1. प्रसून बनर्जी (टीएमसी): तृणमूल ने निहार रंजन घोष का पत्ता काटकर पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रसून बनर्जी को उतारा है। ‘खाकी’ की छवि वाले प्रसून बाबू प्रशासन पर अपनी पकड़ का दावा कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर ‘बाहरी’ होने का टैग और निहार रंजन के समर्थकों की नाराजगी उनके लिए चुनौती है।
2. रतन दास (बीजेपी): भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ता रतन दास पर भरोसा जताया है। उनके पक्ष में माहौल बनाने के लिए खुद भोजपुरी सुपरस्टार और भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने एक विशाल रैली की। तिवारी की रैली में उमड़ी भीड़ ने यह साफ कर दिया कि भाजपा यहाँ ‘हिंदुत्व’ और ‘विकास’ के कॉम्बो के साथ सेंध लगाने को तैयार है।
3. आसिफ महबूब (कांग्रेस): कांग्रेस के पुराने दिग्गज और पूर्व विधायक आसिफ महबूब की वापसी ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। चांचल का ऐतिहासिक झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा है, और आसिफ का व्यक्तिगत आधार टीएमसी के समीकरण बिगाड़ सकता है।
विकास की चमक और ‘डर’ का साया
चांचल की शिशिर कॉलोनी में रहने वाले फर्स्ट टाइम वोटर पीयूष जैन की मानें तो चांचल आज एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। नए मॉल्स और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ ने यहाँ की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। 70% मुस्लिम आबादी वाले इस क्षेत्र में सामाजिक संवेदनशीलता बहुत अधिक है। पीयूष बताते हैं कि त्योहारों के समय मारवाड़ी और स्थानीय व्यापारियों में एक ‘डर’ रहता है, जिससे व्यापार प्रभावित होता है। व्यापारी वर्ग ऐसी सरकार चाहता है जो उन्हें भयमुक्त वातावरण दे सके।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मुद्दे
चांचल में पलायन सबसे बड़ा नासूर रहा है। जहाँ अमीर लोग बेहतर जीवन के लिए बाहर जा रहे हैं, वहीं गरीब युवा रोजगार की तलाश में पलायन को मजबूर हैं। सरकारी स्कूलों की बदहाली और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव आज भी यहाँ चुनावी चर्चा के केंद्र में है। मनोज तिवारी जैसे स्टार प्रचारकों की रैली का असर और 92% मतदान यह बताता है कि बंगाल की जनता ने किसी एक तरफ झुकने का मन बना लिया है। क्या प्रसून बनर्जी की ‘खाकी’ का रसूख काम आएगा, या रतन दास के साथ ‘कमल’ खिलेगा? या फिर आसिफ महबूब अपनी पुरानी विरासत बचा लेंगे? भारी वोटिंग अक्सर सत्ता विरोधी लहर का संकेत होती है लेकिन 4 मई को ही पता चलेगा कि चांचल के लोगों ने किसे अपना भाग्यविधाता चुना है।

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