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क्या चुनाव आयोग ही बीजेपी है, या फिर बीजेपी ही चुनाव आयोग है।
पर्चा चुनाव आयोग का और सील उस पर भाजपा की! केरल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग की एक चूक ने बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। चुनाव आयोग द्वारा जारी एक आधिकारिक पत्र पर भारतीय जनता पार्टी की मुहर पाए जाने के बाद विपक्षी दलों ने आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस घटनाक्रम ने पहले से ही गर्म चुनावी माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
दरअसल, चुनाव आयोग ने 20 मार्च को सभी राजनीतिक दलों, जिला निर्वाचन अधिकारियों और रिटर्निंग अधिकारियों को एक पत्र भेजा था। इस पत्र के साथ 19 मार्च 2019 का एक पुराना दस्तावेज संलग्न किया गया था, जो उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड के सार्वजनिक खुलासे से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले पर आधारित FAQ था।
ह एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा था, लेकिन जब यह दस्तावेज राजनीतिक दलों तक पहुंचा तो उसमें एक बड़ी चूक सामने आई।
इस दस्तावेज के नीचे चुनाव आयोग की आधिकारिक सील की जगह बीजेपी की केरल इकाई की मुहर लगी हुई थी। यही नहीं, आरोप यह भी सामने आया कि यह पत्र किसी आधिकारिक चुनाव आयोग के ईमेल पते से नहीं, बल्कि एक निजी ईमेल आईडी से भेजा गया था।
जैसे ही यह मामला सामने आया, केरल की राजनीति में हलचल तेज हो गई और विपक्षी दलों ने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
केरल में सत्तारूढ़ दल सीपीआई(एम) ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। पार्टी ने सोशल मीडिया पर दस्तावेज की तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि यह कोई साधारण ‘क्लेरिकल एरर’ नहीं हो सकता, बल्कि यह चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच कथित साठगांठ की ओर इशारा करता है।
पार्टी ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे दोनों संस्थाओं को नियंत्रित करने वाला कोई एक ही केंद्र है। सीपीआई(एम) ने यह भी कहा कि अगर यह गलती है तो यह बेहद गंभीर है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
केरल कांग्रेस ने भी इस मामले में कड़ा रुख अपनाया और चुनाव आयोग से स्पष्ट जवाब मांगा। पार्टी ने सवाल किया कि आयोग का आधिकारिक पत्र बीजेपी की मुहर के साथ कैसे जारी हो सकता है।
उन्होंने यह भी पूछा कि क्या चुनाव आयोग बीजेपी के कार्यालय से संचालित हो रहा है या फिर यह किसी बड़ी गड़बड़ी का संकेत है। इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को एक बार फिर यह कहने का अवसर दे दिया कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।
विवाद बढ़ता देख केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) रथन यू. खेलकर ने इस मामले पर आधिकारिक बयान जारी किया। उन्होंने इस पूरी घटना को ‘क्लेरिकल एरर’ यानी दफ्तर की एक साधारण गलती बताया।
उनके अनुसार, बीजेपी की केरल इकाई ने हाल ही में उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़े 2019 के दिशा-निर्देशों पर स्पष्टीकरण मांगते हुए एक दस्तावेज की प्रति जमा की थी, जिस पर पार्टी की मुहर लगी हुई थी। कार्यालय में काम के दौरान उसी प्रति को गलती से अन्य राजनीतिक दलों को भेज दिया गया।
सीईओ ने यह भी बताया कि जैसे ही इस चूक का पता चला, तत्काल कार्रवाई करते हुए 21 मार्च को उप मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा एक औपचारिक पत्र जारी कर उस गलत दस्तावेज को वापस ले लिया गया।
साथ ही सभी संबंधित पक्षों को सही जानकारी उपलब्ध कराई गई। उन्होंने आश्वासन दिया कि यह पूरी तरह अनजाने में हुई गलती थी और इसका किसी प्रकार की राजनीतिक पक्षपात से कोई संबंध नहीं है।
हालांकि, चुनाव आयोग की इस सफाई के बावजूद विपक्ष संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि यह घटना उन आरोपों को और मजबूत करती है, जो वे लंबे समय से चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच कथित नजदीकी को लेकर लगाते रहे हैं।
कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी जैसे दल पहले भी मतदाता सूची में गड़बड़ी, वोटों की कथित चोरी और चुनाव प्रक्रिया में पक्षपात के आरोप लगाते रहे हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने वर्ष 2025 में कई बार सार्वजनिक मंचों से आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग और बीजेपी की मिलीभगत के कारण वोटों में हेरफेर हो रहा है।
उन्होंने कर्नाटक के एक विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में फर्जी वोटरों का मुद्दा भी उठाया था। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल खड़े किए थे।
विपक्ष का यह भी आरोप है कि चुनाव आयोग चुनाव की तारीखों का ऐलान भी बीजेपी के अनुकूल समय पर करता है, जिससे सत्ताधारी दल को राजनीतिक लाभ मिलता है।
इसके अलावा ईवीएम में गड़बड़ी, मतदाता सूची में डुप्लिकेट नाम, फर्जी पते और फॉर्म 6 के दुरुपयोग जैसे मुद्दों को भी विपक्ष लगातार उठाता रहा है। हालांकि, चुनाव आयोग इन सभी आरोपों को निराधार और राजनीतिक प्रेरित बताकर खारिज करता रहा है। बीजेपी भी इन आरोपों को लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास करार देती है।
केरल में 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और ऐसे समय में यह विवाद सामने आना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहले से ही राज्य में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विवाद चल रहा है, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे पर धांधली के आरोप लगा रहे हैं।
ऐसे में चुनाव आयोग के दस्तावेज पर बीजेपी की मुहर मिलना राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना रहा है।
कुल मिलाकर, यह घटना भले ही चुनाव आयोग के अनुसार एक प्रशासनिक चूक हो, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ काफी बड़े हैं। चुनाव से ठीक पहले सामने आई इस गलती ने आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं और विपक्ष को सरकार तथा चुनावी संस्थाओं पर निशाना साधने का नया मुद्दा दे दिया है।
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