सतलुज से काफी पानी बह चुका है

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सतलुज से काफी पानी बह चुका है

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सुदीप ठाकुर (वरिष्ठ पत्रकार )

छब्बीस साल पहले 28 मई, 2000 की देर रात करीब तीन बजे चंडीगढ़ के बस अड्डे पर उतरते समय मेरे जेहन में पंजाब को लेकर जो तस्वीरें थीं, उनमें हिंसा और मानवीय त्रासदियों का मिला-जुला रूप था।

मैं पहली बार इधर आया था। मेरे मन में यह खयाल अभी दिलजीत दोसांझ की चर्चित और अभी प्रतिबंधित कर दी गई फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर उठे तूफान के बाद आया।

दरअसल चंडीगढ़ में दैनिक भास्कर की नौकरी के लिए रायपुर से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर यहां आना हुआ था। मगर बस से उतरने के बाद ऐसा कुछ नहीं लगा, जिसे लेकर दिल्ली से चंडीगढ़ के बीच बस के सफर में मन में तरह-तरह के भाव आते रहे।

वह एक उमस भरी बेचैन कर देने वाली रात थी। रायपुर की गर्मी से एकदम अलग। बस से उतरने के बाद मैंने बस अड्डे के ही नजदीक एक छोटे होटल में कमरा लिया।

अगली सुबह मुझे दैनिक भास्कर के दफ्तर पहुंचना था। सुबह निधीश त्यागी अपने साथ घर ले गए। मैं दो दिन बाद रायपुर लौट आया था और 12 जून को फिर वापसी हुई और दैनिक भास्कर में नौकरी का सिलसिला शुरू हो गया।

चंडीगढ़ यों तो केंद्र शासित प्रदेश है और पंजाब और हरियाणा की राजधानी भी है, लिहाजा वहां इन दोनों राज्यों का खासा असर है। चंडीगढ़ की अपनी खुद की एक अलग तबियत तो खैर है ही।

सतलुज की चर्चाओं के बीच चंडीगढ़ याद इसलिए आया, क्योंकि 1990 के दशक के आखिर तक यानी 2000 के आते-आते चंडीगढ़ और पंजाब खासा बदल चुका था। ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के दंगों के जख्मों से पंजाब और चंडीगढ़ काफी हद तक उबर चुके थे। कम से कम चंडीगढ़ की सड़कों पर और बदलते सांस्कृतिक परिवेश को देखकर तो ऐसा ही लगता था।

दैनिक भास्कर के दफ्तर का नजारा भी बेहद जीवंत था। देर रात तक काम करने के बाद घर लौटते हुए कभी एहसास नहीं हुआ कि यह वह इलाका है, जिसने हिंसा का लंबा दौर देखा है।

ऐसे कितने वाकये याद हैं, जब देर रात काम खत्म करने के बाद चाय पीने चंडीगढ़ के बस अडडे जाना होता था। कुल मिलाकर जीवंत माहौल था, जिसमें निधीश त्यागी, संजय पांडेय, अरुण आदित्य, सुधीर गोरे, किरण मोरे, श्यामाकांत दुबे और राजेश रंजन जैसे दूसरे शहरों से आए साथियों के साथ ही बलवंत तक्षक, दीपक धीमान, जगविंदर पटियाल, सरबजीत सिंह, शायदा और मनीषा भल्ला जैसे ढेर सारे पंजाब और हरियाणा के साथी थे।

बदलते पंजाब और चंडीगढ़ की एक तस्वीर यह भी थी कि महिला साथी काम खत्म कर बेखौफ स्कूटर से घर लौटती थीं। ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों ने पंजाब को गहरे जख्म दिए। हालत यह थी कि कश्मीर और पंजाब में आतंकी हिंसा में होने वाली मौतें अखबारों के पहले पन्नों पर आंकड़ों में बदल गई थीं।
2000 के आते-आते हिंसा पर काफी हद तक काबू पा लिया गया था। उस दौर में कुछ बदलाव हो रहे थे, जिनसे खासतौर से पंजाब के युवा प्रभावित थे।
एक तो यह कि 1980 और 1990 के दशक के मध्य तक पंजाब में उग्रवाद का जो दौर था, वह ढलान पर आ चुका था और वहां पंजाबी पॉप की धमक सुनाई दे रही थी। 2000 के आसपास अचानक पंजाबी प़ॉप की बाढ़-सी आ गई थी।

यह आज के रील के दौर से काफी पहले की बात है। लोक गायकों के अलबम खासे लोकप्रिय हो रहे थे। दिलजीत दोसांझ खुद 2002 के आसपास अपने पहले अलबम के साथ सामने आए थे। यह सब कुछ कुछ बरसों में ही बदला था।

दैनिक भास्कर में उन दिनों अखबार की समीक्षा करने वाले पंजाब यूनिवर्सिटी के हिंदी डिपार्टमेंट में प्राध्यापक रहे दिवंगत य़श गुलाटी कई बार बताया करते थे कि इनसरजेंसी के दौर में बाइक पर पीछे बैठने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और कैसे चंडीगढ़ से राज्य के कई हिस्सों पर चलने वाले बसों के परिवहन पर रात में रोक लगी थी।

उन्हीं दिनों एक और बदलाव हो रहा था। कभी हरित क्रांति का चेहरा बने पंजाब में 1990 के दशक के मध्य के आसपास खेती का संकट एक नए रूप में सामने आने लगा था। यह संकट कपास की खेती की बर्बादी से शुरू हुआ था। 2000 के आसपास पंजाब के गांवों से बड़ी संख्या में किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आ रही थीं।

खेती से जुड़े कुछ ऐसे दृश्य भी सामने आते थे, जिनसे लगता था कि पंजाब और हरियाणा के किसान कितने खुशहाल हैं। जैसे फसल कटने के बाद चंडीगढ के किसान चौक के नजदीक स्थित पासपोर्ट दफ्तर में कनाडा, यूके, अमेरिका जाने वाले किसानों की कतारें। इसके साथ ही गांवों में आलाशीन शादियों और महंगी लिमोजीन से बारात निकालने की खबरें भी आती थीं।

दबे पांव एक और आहट भी आ रही थी। यह आहट थी नशे के बढ़ते कारोबार की। कहते हैं, इसकी शुरुआत हुई थी प्रवासी मजदूरों को नशे का आदी बनाने से ताकि वे देर तक काम कर सकें। मगर इसने पंजाब के युवाओं को भी अपनी जद में ले लिया था।

इन सबके बीच यदा कदा, खालिस्तानी आतंकवाद के फिर से सुलगने की धीमीं फुसफुसहाटें भी सुनाई देती थीं। पंजाब ने विभाजन के गहरे जख्म सहे हैं। खालिस्तानी अलगाववाद के दौर ने उसे नए जख्म दिए। 2000 के आसपास पंजाब हिंसा के दौर से निकल कर नई करवट ले रहा था।

यदा-कदा पूर्व खालिस्तानियों के किस्से भी सुनाई देते थे। ऐसी खबरें भी आती थीं जिनसे पता चलता था कि कभी हथियार उठा चुके कई युवा स्कूल बसों के ड्राइवर बनकर गुजर बसर कर रहे हैं।

इसी दौरान 2002 में अमृतसर के पूर्व डिप्टी कमिश्नर सरबजीत सिंह की किताब आई थीः Operation Black Thunder: An Eyewitness Account of Terrorism in Punjab पढ़ने का मौका मिला।

सरबजीत सिंह 1988 में उस वक्त अमृतसर के डीसी थे, जिस दौरान ऑपरेशन ब्लैक थंडर चलाया गया था और उसके चलते बड़े पैमाने पर खालिस्तानी उग्रवादियों ने समर्पण किए थे। इस किताब में उन्होंने उस दौर के हालात पर विस्तार से लिखा है।

उन्होंने लिखा कि कैसे जब अमृतसर में उनकी पोस्टिंग डीवी से के रूप में हुई थी, तब स्वर्ण मंदिर के पूरे इलाके में उग्रवादियों का कब्जा था। वह लिखते हैं कि उन्होंन तय किया था कि काम संभालने के पहले वह श्री हरमिंदर साहिब में मत्था टेकने जाएंगे। मुश्किल यह थी कि वहां चप्पे चप्पे पर उग्रवादी थे।
सरबजीत सिंह ने तय किया कि वह अपनी पत्नी के साथ इस तरह वहां जाएंगे ताकि यह न लगे कि वे एक साथ वहां आए हैं। उन्हें डर था कि उन्हें और उनकी पत्नी को निशाना बनाया जा सकता है। वह वहां मार्बल के व्यापारी बनकर गए थे और सुरक्षित मत्था टेककर लौट आए थे। इसके कुछ समय बाद ही वहां ऑपरेशन ब्लैक थंडर को अंजाम दिया गया था।

जून 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद 1988 के ऑपरेशन ब्लैक थंडर II के बाद पंजाब में हिंसा थमी नहीं, बल्कि इसका दायरा बढ़ता गया। 31 अगस्त, 1995 को पंजाब सहित पूरा देश उस वक्त हिल गया था, जब पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह चंडीगढ़ स्थित सचिवालय परिसर में आत्मघाती खालिस्तानी आतंकवादी ने बम धमाके से उड़ा दिया था। इस धमाके में 17 लोगों की जानें गई थीं।

इस धमाके के कुछ महीने बाद 27 अक्टूबर, 1995 को मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की पुलिस हिरासत में मार डालने की खबर आई थी। सतलुज फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक है।

निस्संदेह दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा के किरदार को परदे पर जीवंत कर दिया है। यह कहानी बार बार दोहराई जा चुकी है कि कैसे बैंक के डायरेक्टर रहे जसवंत सिंह खालड़ा अपने एक मित्र के लापता हो जाने के बाद लावारिस बताकर की गई हजारों हत्याओं का सच उजागर किया था।

खालड़ा ने श्मशान घाट और सरकारी दस्तावजों से रिकॉर्ड निकालकर उजागर किया था कि 1984 से 1995 के दौरान पुलिस हिरासत में कैसे 2,097 लोगों की हत्या कर मामले को रफा दफा करने की कोशिशें की गईं। हालांकि फिल्म में मौतों का आंकड़ा 25 हजार बताया गया है।

पंजाब का हिंसक दौर समकालीन भारत का एक बदनुमा दाग है। अतीत के जख्मों को कथाओं, कविताओं और फिल्मों के जरिये संचित करना कोई नई बात भी नहीं है।
यह भी संभव है कि फिल्मों में कुछ अतिरेक भी हों। आखिर दूसरे विश्व युद्ध और होलोकास्ट पर न जाने कितनी फिल्में बनी हैं। शिंडलर्स लिस्ट और द पियानिस्ट जैसी फिल्मों को तो ऑस्कर तक मिला है।

सतलुज प्रोपैगैंडा फिल्म तो नहीं ही है, जिस तरह से कश्मीर फाइल्स और केरला फाइल्स बनाई गईं। इस पर जरूर सवाल हो सकते हैं कि इसमें पुलिस का बर्बर चेहरा तो सामने आता है, लेकिन खालिस्तानी हिंसा से ग्रस्त परिवारों ने जो सहा उसे अनदेखा कर दिया गया।

अलगाववाद या इनसरजेंसी का सामना करने वाले राज्यों में मानवाधिकार का रिकॉर्ड हमारे यहां अच्छा नहीं है और इस मामले में पंजाब अपवाद नहीं था। जसवंत सिंह खाल़ड़ा ने जब न्यायेतर हत्याओं का मुद्दा उठाया तो उन्हें पुलिस ने ही अगवा कर लिया, उन्हें बेहद अमानवीय यातनाएं दीं और हिरासत में उनकी हत्या कर दी गई। हत्या करने के बाद उनका शव सतलुज और ब्यास नदी के संगम पर फेंक दिया गया था।

उस दौर से अब तक सतलुज से काफी पानी बह चुका है। मगर दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज ने मानो उन जख्मों की याद दिला दी है। दरअसल सवाल इस फिल्म के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर लगने और फिर उस पर रोक लगाने से उपजे हैं।

वह भी ऐसे समय, जब पंजाब में कुछ समय बाद चुनाव होने हैं। बल्कि खबरें तो यह हैं कि पंजाब के विभिन्न हिस्सों में बकायदा इस फिल्म के प्रायोजित प्रदर्शन करवाए गए हैं।

इसे तीन साल तक पहले ही लटकाए रखा गया था और अब इसे प्रदर्शित होने के तुरंत बाद रोका गया है। इसके पीछे सिर्फ सियासत है। से समझना मुश्किल नहीं है। फिल्म और उस पर लगी रोक के बहाने जिस तरह की सियासत हो रही है, वह पंजाब को उस दौर में ले जा सकती है, जिसकी उसने बड़ी कीमत चुकाई है। पंजाब इससे बेहतर का हकदार है।

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