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भावनाओं का बाजार ‘सोशल मीडिया’

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भावनाओं का बाजार सोशल मीडिया

कुछ साल पहले तक किसी दुर्घटना, हिंसा या त्रासदी की खबर सुनकर लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से दुख, गुस्सा या बेचैनी पैदा होती थी। आज वही खबरें एक स्क्रॉल में गुज़र जाती हैं एक रील खत्म होते ही अगली शुरू हो जाती है, चाहे वह किसी हादसे का वीडियो हो या किसी की खुशी का पल।

सोशल मीडिया ने संचार को जितना आसान बनाया है, उतनी ही तेज़ी से उसने हमारी भावनाओं को भी एक “बाज़ार” में बदल दिया है, जहाँ हर इमोशन गुस्सा, डर, सहानुभूति, आक्रोश कंटेंट है, और हर कंटेंट का मकसद है ज़्यादा देर तक स्क्रीन पर बांधे रखना। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे समाज को संवेदनहीन (desensitized) बना रही है।

आंकड़े क्या कहते हैं

मिशिगन विश्वविद्यालय के एक तीन दशक लंबे अध्ययन में सामने आया कि अमेरिकी कॉलेज छात्रों में सहानुभूति (empathy) के स्तर में करीब 40 प्रतिशत की गिरावट आई है, और यह गिरावट खासतौर पर उस दौर में तेज़ हुई जब सोशल मीडिया लोकप्रिय होना शुरू हुआ।

मनोरोग विशेषज्ञों की हालिया समीक्षा बताती है कि बार-बार हिंसक या परेशान करने वाले कंटेंट के संपर्क में आने से मस्तिष्क का “एमिग्डाला” (डर और भावनाओं को प्रोसेस करने वाला हिस्सा) कम सक्रिय होने लगता है, जबकि भावनात्मक प्रसंस्करण से जुड़ा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स भी कम काम करता है। यही वजह है कि लोग गंभीर घटनाओं पर भी “कुछ महसूस नहीं होता” जैसी प्रतिक्रिया देने लगते हैं।

यूथ एंडोमेंट फंड के एक सर्वे के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत किशोरों ने ऑनलाइन असली हिंसा से जुड़ा कंटेंट देखा होने की बात स्वीकार की।
शोधकर्ता ह्यूसमन और उनके सहयोगियों के दीर्घकालिक अध्ययन बताते हैं कि बचपन में मीडिया हिंसा के बार-बार संपर्क में आना वयस्क होने पर आक्रामक व्यवहार की संभावना बढ़ा देता है यह पैटर्न ठीक उसी संवेदनहीनता की प्रक्रिया से मेल खाता है जो आज सोशल मीडिया पर देखी जा रही है।

भारत की तस्वीर

भारत में यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है, क्योंकि यहाँ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाली आबादी बहुत बड़ी और बहुत युवा है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार भारत में करीब 35 करोड़ सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हैं, और डिजिटल लत को लेकर सर्वे में चिंता जताई गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी गेमिंग डिसऑर्डर को अंतरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण (ICD-11) में मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में शामिल किया है, जो डिजिटल माध्यमों की लत की गंभीरता को दर्शाता है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्टों के मुताबिक भारत में लगभग 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें से करीब 76 प्रतिशत स्मार्टफोन रखने वाले बच्चे किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार 9-13 वर्ष के लगभग 62 प्रतिशत और 13-17 वर्ष के 49 प्रतिशत बच्चे रोज़ाना कम से कम तीन घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 27 प्रतिशत किशोर सोशल मीडिया पर लगभग पूरी तरह निर्भर हो चुके हैं, जिससे उनमें बेचैनी और अलगाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।

हाल में जारी वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में भी चेतावनी दी गई है कि जो युवा ज़्यादा समय ऑनलाइन बिताते हैं, उनमें चिंता (anxiety), अवसाद (depression) और जीवन से असंतोष की समस्याएं तेज़ी से बढ़ रही हैं।

वैश्विक स्तर पर देखें तो 2025 के अनुमानों के मुताबिक दुनियाभर में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या 5.42 अरब को पार कर चुकी है, और औसत व्यक्ति रोज़ाना करीब दो घंटे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बिताता है। इतने बड़े पैमाने पर, इतने लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना स्वाभाविक रूप से हमारी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है।

एल्गोरिदम और “भावनाओं की अर्थव्यवस्था”

सोशल मीडिया कंपनियों का मूल कारोबार मॉडल विज्ञापन पर टिका है, और विज्ञापन की कमाई सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करती है कि उपयोगकर्ता ऐप पर कितनी देर रुकते हैं। इसीलिए एल्गोरिदम को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि वह सबसे ज़्यादा प्रतिक्रिया (लाइक, कमेंट, शेयर) पैदा करने वाला कंटेंट दिखाए।

शोध बताते हैं कि गुस्सा, डर और आक्रोश पैदा करने वाला कंटेंट शांत या सकारात्मक कंटेंट की तुलना में कहीं ज़्यादा तेज़ी से फैलता है। नतीजा यह होता है कि यूज़र की फीड धीरे-धीरे नाटकीय, चौंकाने वाले और कई बार हिंसक दृश्यों से भर जाती है।

इसमें एक “इनाम चक्र” (reward cycle) भी काम करता है। छोटे, तेज़ रफ़्तार वीडियो डोपामिन आधारित प्रणाली को सक्रिय करते हैं, कुछ हद तक वैसे ही जैसे जुए की मशीन में इनाम मिलने का पैटर्न काम करता है।

इस वजह से लोग ऐसा कंटेंट भी बार-बार देखते रहते हैं जिसे वे वास्तव में पसंद भी नहीं करते, क्योंकि दिमाग उस उत्तेजना का आदी हो चुका होता है। पहली बार कोई हिंसक या परेशान करने वाला वीडियो देखकर जो सदमा या दुख महसूस होता है, वही बार-बार एक्सपोज़र के बाद फीका पड़ने लगता है यही संवेदनहीनता की शुरुआत है।

एक उदाहरण से समझिए 

जैसे एक उदाहरण के तौर पर कुछ लोग फेमस होने के चक्कर में ऐसे कदम उठाते हैं, जिनका असलियत से कोई लेना देना नहीं। जैसे हाल ही में यूपी में तीन महिलाओं ने जो की सगी बहिनें हैं। फेमस होने के लिए एक नाटक रचा। नाटक में यह था की तीनों बहिनें एक दूसरे से अलग नहीं रहना चाहतीं।

माता-पिता तीनों की अलग-अलग शादी कारना चाहते हैं। जिससे उन्हें एक दूसरे से बिछड़ जाने का डर था इसलिए उन तीनों बहिनों ने एक ही लड़के से शादी रचा ली। जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर आया, लोगों ने प्रतिक्रिया देना चालू कर दिया।

यह नाटक लगभग एकहफ़्ते तक चला। लेकिन जब यह नाटक देश व्यापी हो चुका तो इस पर पुलिस ने संज्ञान लिया। जिसमें यह पाया गया की वे तीनों बहिनें फेमस होने के लिए नाटक कर रहीं थी। इसे सच्ची संवेदनाओं का अवमूल्यन कहते हैं। असल में जब लोगों को पता चलता है कि उनकी सहानुभूति का इस्तेमाल सिर्फ व्यूज और फॉलोअर्स पाने के लिए एक ढोंग के रूप में किया गया, तो वे ठगा हुआ महसूस करते हैं। इससे अगली बार किसी वास्तविक पीड़ित या जरूरतमंद की कहानी सामने आने पर भी लोग उस पर शक करने लगते हैं।

यह मात्र एक छोटा से उदाहरण था इस तरह की खबरें लाखों में रोजाना व्यूवर्स देखते हैं।

संवेदनहीनता के दुष्परिणाम

-जब हम स्क्रीन पर बार-बार दूसरों का दर्द देखते हैं मगर उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते, तो धीरे-धीरे दिमाग उस दर्द को सामान्य मान लेता है। इससे असली ज़िंदगी में भी सहानुभूति और सहायता की भावना कमज़ोर पड़ जाती है।

-शोध में पाया गया है कि हिंसा के प्रति संवेदनहीनता लोगों की हिंसा सहने की क्षमता बढ़ाती है और आक्रामक व्यवहार न करने की प्रेरणा को कमज़ोर कर देती है, जिससे भविष्य में हिंसक व्यवहार अपनाने की संभावना बढ़ जाती है।

-एल्गोरिदम अक्सर वही विचार दिखाते हैं जो उपयोगकर्ता की मौजूदा राय से मेल खाते हैं। इससे इको चैंबर बनता है, जहाँ व्यक्ति सिर्फ अपने जैसे विचारों के संपर्क में रहता है और दूसरे नज़रिए के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है।

-अत्यधिक उपयोग चिंता, अवसाद, चिड़चिड़ापन, अकेलापन और नींद की कमी जैसी समस्याओं से जुड़ा पाया गया है, खासकर किशोरों और युवाओं में।

भारत में हाल के आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों में भारी वृद्धि हुई है, जो बताता है कि संवेदनहीन होता डिजिटल माहौल असुरक्षा को भी बढ़ावा दे रहा है।

क्या इसका कोई समाधान है?

समस्या गंभीर है, लेकिन निराशाजनक नहीं। कुछ व्यावहारिक कदम मदद कर सकते हैं-

-कब, कितनी देर और क्या देखना है, इस पर सचेत रूप से नियंत्रण रखना संवेदनहीनता की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है।
-स्कूल-कॉलेज स्तर पर बच्चों और किशोरों को एल्गोरिदम की कार्यप्रणाली और उसके भावनात्मक असर के बारे में जागरूक करना ज़रूरी है।
-कई देशों में प्लेटफॉर्म्स के लिए उम्र-सीमा और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर सख्त नियम लाए जा रहे हैं ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया है, जो इसी दिशा में एक उदाहरण है।
-वास्तविक जीवन में रिश्तों, बातचीत और सामुदायिक गतिविधियों में समय बिताना भावनात्मक संवेदनशीलता बनाए रखने में मदद करता है।

सोशल मीडिया अपने आप में न तो पूरी तरह बुरा है, न ही यह पूरी तरह भावनाओं को खत्म कर सकता है। लेकिन जिस तरह इसका व्यापार-मॉडल भावनात्मक प्रतिक्रिया पर टिका है, उसने हर भावना को एक बिकाऊ वस्तु बना दिया है।

जब गुस्सा, दुख और सहानुभूति भी सिर्फ एंगेजमेंट का ज़रिया बनकर रह जाते हैं, तो असली संवेदनाएं धीरे-धीरे कुंद पड़ने लगती हैं। आंकड़े और शोध यही बताते हैं कि यह कोई काल्पनिक डर नहीं, बल्कि एक मापी जा सकने वाली सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है।

इससे निपटने की शुरुआत हर व्यक्ति के अपने डिजिटल व्यवहार पर सवाल उठाने से हो सकती है क्या हम वाकई महसूस कर रहे हैं, या सिर्फ स्क्रॉल कर रहे हैं?

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