Vande Mataram History and Bankim Chandra Chattopadhyay

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वंदे मातरम् का शब्दार्थ और रचना की कहानी से आज विवाद तक!

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वंदे मातरम् का अर्थ क्या है? बंकिमचंद्र ने इसे कब और क्यों लिखा, आनंदमठ में कैसे शामिल हुआ और आज पूरे गीत को लेकर क्यों विवाद है? जानिए पूरा इतिहास।

“वंदे मातरम्” संस्कृत के दो शब्दों से बना है “वंदे” यानी “मैं वंदना करता हूँ” या “मैं नमन करता हूँ”, और “मातरम्” यानी “माता को”। मिलाकर अर्थ हुआ “हे माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ” या “मैं तुझे नमन करता हूँ, हे मातृभूमि”।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे बांग्ला-संस्कृत मिश्रित भाषा में लिखा है, शब्दशः भावार्थ कुछ इस तरह है –

 

पहला स्तवन

वन्दे मातरम्।

सुजलां सुफलाम्, मलयजशीतलाम्,

शस्यश्यामलां मातरम्।।

अर्थ: हे माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ। तू स्वच्छ जल वाली (सुजलां), उत्तम फलों वाली (सुफलाम्), दक्षिण दिशा से आने वाली चंदन-सुगंधित शीतल वायु वाली (मलयजशीतलाम्), और फसलों से हरी-भरी (शस्यश्यामलां) है — ऐसी हे मातृभूमि, मैं तुझे नमन करता हूँ।

 

दूसरा स्तवन

शुभ्रज्योत्स्नां पुलकितयामिनीम्,

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्,

सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,

सुखदां वरदां मातरम्।।

अर्थ: चाँदनी रात में तू आनंद से पुलकित हो उठती है (शुभ्रज्योत्स्नां पुलकितयामिनीम्), खिले हुए फूलों और वृक्षों की पत्तियों से सुशोभित है, तेरी मंद हँसी है और वाणी मीठी है तू सुख देने वाली और वरदान देने वाली माँ है।

 

तीसरा स्तवन

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले,

कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,

के बॉले माँ तुमी अबले,

बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,

रिपुदलवारिणीं मातरम्।।

अर्थ: करोड़ों कंठों की गर्जना से भयंकर, करोड़ों भुजाओं में तेज तलवारें थामे – कौन कहता है कि तू अबला (शक्तिहीन) है, माँ? तू तो अपार बल धारण करने वाली है। हे तारने वाली, शत्रु-सेना को रोकने वाली माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ।
(इस पंक्ति में “के बॉले माँ तुमी अबले” बांग्ला भाषा में है – इसका अर्थ है “कौन कहता है, माँ, तू अबला है।”)

चौथा स्तवन

तुमि विद्या, तुमि धर्म,

तुमि हृदि, तुमि मर्म,

त्वं हि प्राणाः शरीरे।

बाहुते तुमि माँ शक्ति,

हृदये तुमि माँ भक्ति,

तोमारई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।।

अर्थ: तू ही विद्या है, तू ही धर्म है, तू ही हृदय है, तू ही मर्म (सार) है। तू ही शरीर में प्राण है। हमारी भुजाओं में तू शक्ति है, हमारे हृदय में तू भक्ति है – और तेरी ही प्रतिमा हम मंदिर-मंदिर में स्थापित करते हैं।

पाँचवा स्तवन

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,

कमला कमलदलविहारिणी,

वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,

नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,

सुजलां सुफलां मातरम्।।

अर्थ: तू ही दस भुजाओं में शस्त्र धारण करने वाली दुर्गा है, तू ही कमल पर विराजने वाली लक्ष्मी (कमला) है, तू ही विद्या देने वाली सरस्वती (वाणी) है – मैं तुझे नमन करता हूँ। मैं तुझे नमन करता हूँ, जो निर्मल (अमला) और अतुलनीय (अतुलाम्) कमला है – हे स्वच्छ जल और उत्तम फलों वाली मातृभूमि।

छठा स्तवन

वन्दे मातरम्।

श्यामलां सरलां,

सुस्मितां भूषिताम्,

धरणीं भरणीं मातरम्।।

वाली और पालन-पोषण करने वाली (भरणीं) माँ है। आगे की कड़ियों में मातृभूमि को शक्ति, बल, दुर्गा और लक्ष्मी के रूप में देखा गया है, जहाँ करोड़ों भुजाओं वाली, तलवार उठाए, दस-बीस करोड़ स्वरों वाली माँ की कल्पना की गई है – यानी माँ अब केवल भूमि नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों लोगों का सामूहिक स्वरूप बन जाती है।

पर भारत सरकार ने राष्ट्रगीत के रूप में केवल पहली दो कड़ियों को ही मान्यता दी है, क्योंकि आगे की कड़ियों में देवी दुर्गा और अन्य धार्मिक प्रतीकों का सीधा उल्लेख है, जिस पर बाद में विवाद भी हुआ। और आज भी विवादास्पद है!

आज की बात करें तो केंद्र सरकार ने वंदे मातरम के पूर्ण संस्करण को आधिकारिक सरकारी कार्यक्रमों के प्रोटोकॉल में प्रमुखता देने की दिशा में कदम उठाया है। और सरकार ने वंदे मातरम का अपमान करने पर नया कानून भी लागू कर दिया है।

वहीं पूरे गीत को गाने पर सरकार सख्ती की है, तो दूसरी तरफ विपक्ष ने पूरा ‘वंदे मातरम’ गाने सए साफ इनकार कर दिया है। जिसको लेकर नया विवाद छिड़ गया है।

रचना की कहानी

अब बात करते हैं इसके लिखे जाने की पृष्ठभूमि की, जो अपने आप में एक दिलचस्प इतिहास है।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल के एक प्रतिष्ठित सरकारी अधिकारी और साहित्यकार थे। वे उस दौर में जी रहे थे जब अंग्रेजी हुकूमत भारत पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी, और भारतीय समाज में राष्ट्रीयता की भावना अभी कोंपल की तरह ही फूट रही थी – 1857 के विद्रोह की असफलता के बाद निराशा का माहौल था, पर धीरे-धीरे शिक्षित वर्ग में स्वदेश-प्रेम की चिंगारी सुलग रही थी।

कहा जाता है कि बंकिमचंद्र ने यह गीत सन् 1875 के आसपास लिखा था, जब वे कांतल पाड़ा (आज के बांग्लादेश के नोआखाली या कहीं आसपास, इस पर इतिहासकारों में थोड़ा मतभेद है) या कहीं बंगाल के किसी क्षेत्र में तैनात थे।

एक प्रचलित किंवदंती यह है कि एक रात जब वे रेलगाड़ी या नाव से यात्रा कर रहे थे, तब खिड़की से बाहर बंगाल की हरी-भरी धरती, नदियाँ और चाँदनी देखकर उनके मन में यह भाव उमड़ा और पंक्तियाँ स्वतः फूट पड़ीं। यह प्रकृति-प्रेम और देश-प्रेम का मिश्रण था – मातृभूमि को साक्षात माँ के रूप में देखने की भारतीय परंपरा से प्रेरित।

शुरुआत में यह गीत स्वतंत्र रूप से लिखा गया था, संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण में, ताकि यह दोनों भाषाओं के पाठकों तक पहुँच सके। बाद में बंकिमचंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यास “आनंदमठ” में शामिल किया, जो सन् 1882 में प्रकाशित हुआ।

यह उपन्यास 1770 के दशक के बंगाल के अकाल और तथाकथित “संन्यासी विद्रोह” की पृष्ठभूमि पर आधारित था, जिसमें कुछ संन्यासी और विद्रोही अंग्रेजों तथा तत्कालीन शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हैं।

उपन्यास में यह गीत उन क्रांतिकारी संन्यासियों का मातृभूमि-वंदन गीत बनकर उभरता है, जो अपनी जन्मभूमि को साक्षात देवी मानकर उसकी रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते हैं।

आनंदमठ के प्रकाशन के बाद यह गीत तेज़ी से बंगाल और फिर पूरे भारत में फैलने लगा। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में, खासकर 1905 के बंगाल-विभाजन (बंग-भंग आंदोलन) के दौरान, यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख नारा और प्रेरणा-गीत बन गया।

रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया था, जिससे इसे और व्यापक पहचान मिली। इसके बाद स्वतंत्रता सेनानियों की सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में “वंदे मातरम्” का उद्घोष एक साझा पहचान और एकता का प्रतीक बन गया।

अंग्रेज़ सरकार इस गीत से इतनी भयभीत हो गई थी कि उसने कई मौकों पर इसे गाने पर प्रतिबंध तक लगा दिया, और इसे गाने वाले क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया जाता था। यही वजह है कि यह गीत केवल एक साहित्यिक रचना न रहकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम का प्राणस्वरूप बन गया।

स्वतंत्रता के बाद, 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ, तब संविधान सभा ने लंबी चर्चा के बाद “जन गण मन” को राष्ट्रगान (National Anthem) और “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगीत (National Song) का दर्जा दिया – दोनों को समान सम्मान देते हुए।

इस निर्णय के पीछे एक कारण यह भी था कि आनंदमठ की आगे की कड़ियों में देवी दुर्गा का स्पष्ट उल्लेख था, जिसे लेकर मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों और अन्य नेताओं ने आपत्ति जताई थी, इसीलिए केवल पहली दो, अपेक्षाकृत सर्वस्वीकार्य कड़ियों को ही औपचारिक मान्यता दी गई।

आज भी “वंदे मातरम्” भारत के हर बड़े राष्ट्रीय अवसर, स्कूली प्रार्थना-सभा और देशभक्ति के आयोजनों में गूँजता है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस दौर की याद दिलाता है जब मातृभूमि के प्रति प्रेम ने लाखों भारतीयों को एकजुट कर औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध खड़ा कर दिया था।

बंकिमचंद्र की कलम से निकले ये शब्द आज भी उसी जोश और भावना के साथ हर भारतीय के हृदय में गूंजते हैं

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