स्वतंत्रता से जुड़ी कुछ बेहद मार्मिक और ऐतिहासिक तस्वीरें!
गांधी जी अपने चरखे के साथ (1946)
फोटोग्राफर: मार्गरेट बर्क-व्हाइट। (Life पत्रिका के लिए)
यह तस्वीर गांधी जी की सबसे पहचानी जाने वाली छवि बन गई सादगी और स्वदेशी के प्रतीक चरखे के साथ बैठे बापू।
“द ग्रेट माइग्रेशन” — विभाजन के शरणार्थी (1947)
फोटोग्राफर: मार्गरेट बर्क-व्हाइट।
लाखों लोग पैदल, बैलगाड़ियों और ट्रेनों से सीमा पार कर रहे थे इतिहास का सबसे बड़ा जन-प्रवासन। एक तस्वीर में एक बुज़ुर्ग सिख अपनी बीमार पत्नी को कंधे पर उठाए सीमा की ओर बढ़ता दिख रहा है।
दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों के बाद (1947)
फोटोग्राफर: मार्गरेट बर्क-व्हाइट।
विभाजन की हिंसा के शिकार लोगों के शव सड़कों पर पड़े दिखाती यह तस्वीर उस दौर की सबसे विचलित करने वाली और साथ ही ऐतिहासिक दस्तावेज़ी तस्वीरों में गिनी जाती है।
नेहरू का “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” भाषण (14-15 अगस्त, आधी रात 1947)
फोटोग्राफर: अज्ञात।
आधी रात को जब घड़ी की सुइयां 12 बजा रही थीं, नेहरू संविधान सभा को संबोधित करते हुए भारत की आज़ादी की घोषणा करते हैं यह क्षण कैमरे में कैद हो गया।
गांधी जी की दांडी नमक यात्रा (1930)
फोटोग्राफर: अज्ञात।
अपने 78 अनुयायियों के साथ 241 मील की यात्रा कर गांधी जी ने दांडी में नमक बनाकर अंग्रेज़ी कानून को चुनौती दी, यह असहयोग आंदोलन की सबसे प्रतीकात्मक तस्वीर है।
भगत सिंह की मशहूर ‘हैट वाली’ तस्वीर (1929)
फोटोग्राफर: रामनाथ फोटोग्राफर्स। कश्मीरी गेट, दिल्ली
दिल्ली विधानसभा में बम फेंकने से पहले भगत सिंह ने जानबूझकर यह तस्वीर खिंचवाई थी ताकि यह क्रांति का प्रतीक बन सके। आज भी यह भारत में सबसे ज़्यादा पुनर्निर्मित तस्वीर है।
लाल किले पर पहला ध्वजारोहण
फोटोग्राफर: होमाई व्यारावाला।
भारत की पहली महिला फोटो-पत्रकार। दिलचस्प तथ्य यह है कि लाल किले पर पहला औपचारिक ध्वजारोहण 15 नहीं बल्कि 16 अगस्त 1947 को हुआ था। हज़ारों लोग गांव-देहात से बैलगाड़ियों और ऊंटगाड़ियों पर सवार होकर इस पल के गवाह बनने दिल्ली पहुंचे थे।
पुराना किला — दिल्ली में शरणार्थी शिविर
फोटोग्राफर: मार्गरेट बर्क-व्हाइट।
दिल्ली की ऐतिहासिक पुराना किला मस्जिद और परिसर बंटवारे के दौरान लाखों शरणार्थियों की शरणस्थली बन गया था। यह दृश्य दिखाता है कि कैसे मुगलकालीन इमारतें रातों-रात विस्थापन शिविरों में बदल गईं। गंदगी, बीमारी और भूख के बीच लोग जीवन बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे।
विभाजन के पक्ष में हाथ उठाकर हुआ मतदान
फोटोग्राफर: होमाई व्यारावाला।
जून 1947 में दिल्ली की एक बैठक में कांग्रेस कमेटी के सदस्यों ने “थर्ड जून प्लान” पर हाथ उठाकर मतदान किया, जिसने भारत के विभाजन की औपचारिक नींव रखी। यह तस्वीर उस निर्णायक, भारी-मन से लिए गए फैसले के गवाह के रूप में दर्ज है।
गांधीजी की चिता — फरवरी 1948
फोटोग्राफर: होमाई व्यारावाला।
हालांकि यह क्षण 1948 का है, पर यह आज़ादी की कहानी का ही मार्मिक अंतिम अध्याय है। गांधीजी की हत्या के बाद उनके तीसरे पुत्र रामदास ने राजघाट पर चिता को अग्नि दी। जिस व्यक्ति ने आज़ाद भारत का सपना दिखाया, वही उसकी पहली सांसों में मौजूद न रह सका।
शरणार्थी ट्रेनों में ठसाठस भरे लोग
फोटोग्राफर: कुलवंत रॉय (अज्ञात प्रेस फोटोग्राफर)
लोग जान बचाने के लिए ट्रेनों की छतों और डिब्बों में ठसाठस भरकर सीमा पार कर रहे थे। कई ट्रेनें “खूनी ट्रेनें” कहलाईं क्योंकि रास्ते में हमलों में सवार लोग मारे जाते थे। यह तस्वीरें आज़ादी के जश्न और बंटवारे की त्रासदी, दोनों को एक साथ दर्शाती हैं।
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