पैलेट गन पर जवाब मिले बगैर संसद सत्र खत्म!
संसद का मानसून सत्र खत्म हो गया, लेकिन इसके साथ ही खत्म हो गई देश के युवाओं और विपक्ष की वह उम्मीद जो लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर से जवाब मांग रही थी! सवाल एक दम सीधा और सटीक था की 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश आखिर किसने दिया था?
पूरा मानसून सत्र इसी एक सवाल के इर्द-गिर्द घूमता रहा, भारी हंगामा हुआ, सदन की कार्रवाई रोज ठप हुई, लेकिन नतीजा? नतीजा शून्य! सत्र के आखिरी दिन संसद महज 1 मिनट चली और फिर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई।
20 जुलाई की उस तस्वीर को याद कीजिए, जब ‘चलो संसद’ मार्च के तहत अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे छात्रों पर पुलिस की बर्बरता टूटी थी। जंतर-मंतर पर हुए उस प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया। क्या देश में अब अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले युवाओं पर पैलेट गन से वार किया जाएगा?
विपक्ष का सीधा आरोप है कि इस कार्रवाई में कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए किसी की आंख की रोशनी पर खतरा मंडरा रहा है, किसी के कान को गंभीर नुकसान पहुंचा, तो किसी के पैर छलनी हो गए। यह मामला संसद के गलियारों से लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजों तक पहुंच चुका है, मगर अफसोस कि जिस सदन में देश के मुद्दे सुलझने चाहिए थे, वहां इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका और संसद सत्र खत्म कर दिया गया।
सत्र के दौरान जब यह गतिरोध चरम पर था, तब गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विस्तृत चर्चा का प्रस्ताव रखा था। सरकार की ओर से कहा गया कि विपक्ष लिखित नोटिस दे। रणनीति यह बनाई गई कि विपक्ष दोपहर 2 बजे तक नोटिस दे, दोपहर 3 बजे चर्चा शुरू हो और अगले दिन गृह मंत्री खुद हर सवालों का विस्तृत जवाब दें। लेकिन विपक्ष को सरकार का यह प्रस्ताव कतई मंजूर नहीं था।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। राहुल गांधी का साफ कहना था कि विपक्ष को गृह मंत्री का लंबा-चौड़ा भाषण या लेक्चर सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। विपक्ष को गोल-मोल दावों की आड़ नहीं चाहिए, उन्हें सिर्फ एक सवाल का सीधा और सटीक जवाब चाहिए’छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया?’
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी सरकार को आड़े हाथों लिया और कड़े शब्दों में सवाल किए। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने संसद परिसर में ‘Amit Shah Missing’ लिखे पोस्टर लहराए और आरोप लगाया कि गृह मंत्री हफ्तों तक सदन से गायब रहे और जब जवाब देने का वक्त आया, तो शर्तों की आड़ ली जाने लगी।
दूसरी तरफ, गृह मंत्री अमित शाह का बार-बार यही तर्क रहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। सरकार नियमानुसार हर सवाल का जवाब देने को तैयार है, लेकिन विपक्ष चर्चा करने के बजाय सिर्फ हंगामा करके सदन को ठप रखना चाहता है। सरकार का दावा था कि वह पूरी पारदर्शिता के साथ अपनी बात रखना चाहती है, लेकिन विपक्ष ने नियमबद्ध चर्चा का मौका खुद गंवा दिया।
लेकिन असलियत क्या है? असलियत यह है कि 13 अगस्त को जब सत्र का अंतिम दिन आया, तो संसद में न कोई सार्थक बहस हुई और न ही किसी अधिकारी या मंत्री की जवाबदेही तय हुई। महज 1 मिनट के भीतर सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया और इसके साथ ही पूरा मानसून सत्र बिना किसी ठोस नतीजे के इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
इसका जवाब कौन देगा की क्या संसद केवल औपचारिकताओं के लिए चलेगी? अगर देश के भविष्य यानी छात्रों पर हुई कार्रवाई पर भी संसद में एक सीधा जवाब नहीं मिल सकता, तो फिर जनता अपनी गुहार लेकर कहां जाए? सरकार का दावा है कि वह चर्चा के लिए तैयार थी, और विपक्ष का आरोप है कि सरकार जवाबदेही से भाग रही है। लेकिन इन दोनों के राजनीतिक दांव-पेच के बीच वह सच दब गया जो पूरा देश जानना चाहता था।
