JPSC-JSSC Protest: 98% मांगें मानने के दावे के बावजूद क्यों जारी है छात्रों का आंदोलन?
झारखंड की राजधानी रांची में JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। बड़ी संख्या में अभ्यर्थी विधानसभा के आसपास और जयपाल सिंह स्टेडियम से लेकर अल्बर्ट एक्का चौक तक अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। प्रदर्शन के दौरान छात्रों को रोकने के लिए पुलिस की ओर से बल प्रयोग किए जाने की भी बात सामने आई है।
सरकार का दावा है कि छात्रों की करीब 98 फीसदी मांगें मान ली गई हैं। इसके बावजूद आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर छात्रों की ऐसी कौन-सी मांग है, जिसे लेकर वे अब भी सड़क पर डटे हुए हैं? क्या छात्रों ने सरकार से चांद-तारे मांग लिए हैं, या फिर मामला केवल कुछ मांगों को मान लेने से कहीं ज्यादा बड़ा है?
छात्रों का कहना है कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति के इस्तीफे या केवल किसी एक परीक्षा की जांच तक सीमित नहीं है। उनकी मुख्य मांग भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की है।
अभ्यर्थी लंबे समय से JPSC और JSSC की परीक्षाओं को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी होने के बाद वर्षों तक प्रक्रिया लंबित रहना, पेपर लीक के आरोप, परीक्षा परिणामों में कथित अनियमितताएं और भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठते सवालों ने छात्रों के बीच नाराजगी बढ़ाई है।
इसी बीच JPSC की 14वीं प्रारंभिक परीक्षा को लेकर विवाद ने आंदोलन को और तेज कर दिया।
JPSC की ओर से 19 अप्रैल को 14वीं प्रारंभिक परीक्षा यानी PT आयोजित की गई थी। परीक्षा के बाद कुछ अभ्यर्थियों ने कथित गड़बड़ी और OMR शीट में अनियमितता के आरोप लगाए।
परिणाम जारी होने के बाद मेरिट लिस्ट की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हुए। इसी दौरान सोशल मीडिया पर एक कथित OMR शीट वायरल हुई। दावा किया गया कि पेपर-1 में एक अभ्यर्थी ने 100 में से केवल 48 सवाल हल किए, इसके बावजूद उसे सफल घोषित कर दिया गया।
हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल किसी दस्तावेज को अपने आप में अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन इस दावे ने छात्रों के बीच पहले से मौजूद नाराजगी को और बढ़ा दिया।
विवाद बढ़ने के बाद राज्य सरकार ने मामले की CID जांच की घोषणा की। इसके बाद JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते के इस्तीफे की बात सामने आई। विवाद गहराने के बाद आयोग ने संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा समेत कई अन्य भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया।
JPSC के साथ-साथ झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी JSSC की भर्ती परीक्षाएं भी लंबे समय से सवालों के घेरे में रही हैं।
JSSC-CGL परीक्षा को लेकर पेपर लीक और दूसरी अनियमितताओं के आरोप सामने आए। इसके अलावा 2026 की फील्ड वर्कर भर्ती परीक्षा को लेकर भी अभ्यर्थियों की ओर से शिकायतें उठाई गईं।
छात्रों का तर्क है कि समस्या किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि जब बार-बार भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो केवल एक-दो परीक्षाओं को रद्द करना या जांच का ऐलान करना पर्याप्त नहीं है।
आंदोलन के बीच झारखंड सरकार की ओर से दावा किया गया है कि छात्रों की लगभग 98 फीसदी मांगों को स्वीकार किया जा चुका है।
सरकार ने 14वीं JPSC PT और ACF परीक्षा को रद्द करने, TDPL एजेंसी से जुड़ी परीक्षाओं की जांच कराने और परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने पर सहमति जताई है।
वहीं JSSC-CGL से जुड़े मामले की जांच के लिए रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में समिति गठित करने की बात भी कही गई है।
इसके बावजूद छात्रों की सबसे बड़ी मांग पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
प्रदर्शनकारी छात्र पूरे मामले की जांच CBI से कराने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब भर्ती प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और कई परीक्षाओं को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं, तो जांच ऐसी एजेंसी से होनी चाहिए जिस पर उन्हें भरोसा हो।
यही वह बिंदु है जहां सरकार के 98 फीसदी मांगें मानने के दावे और छात्रों के आंदोलन के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है।
सरकार का कहना है कि उसने कई मांगें स्वीकार कर ली हैं, जबकि छात्रों का तर्क है कि जब तक उन्हें पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच का भरोसा नहीं मिलता, तब तक आंदोलन खत्म करना मुश्किल है।
झारखंड में इंडिया गठबंधन की सरकार है। ऐसे में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की ओर से छात्रों के आंदोलन को समर्थन दिए जाने से सियासी बहस तेज हो गई है। दूसरी तरफ सरकार और कांग्रेस की ओर से बीजेपी पर आंदोलन को राजनीतिक रूप से हवा देने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
यानी एक तरफ छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़क पर हैं, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दल भी इस आंदोलन के जरिए एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
यह स्थिति उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है जब देश में पहले भी छात्र आंदोलनों ने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों के बाद विपक्षी दलों को सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का मौका मिला था। अब झारखंड में चल रहा यह आंदोलन भी धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेता दिखाई दे रहा है।
अगर आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका राजनीतिक फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है। बीजेपी और उसके सहयोगी सरकार को भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर सकते हैं।
वहीं सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की ओर से छात्रों को राजनीतिक रूप से भड़काने की कोशिश के तौर पर पेश कर सकता है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल राजनीति से अलग है क्या झारखंड के युवाओं को भर्ती परीक्षाओं की ऐसी व्यवस्था मिलेगी, जिस पर वे भरोसा कर सकें?
क्योंकि छात्रों का आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं रह गया है। यह भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता, परीक्षा व्यवस्था में विश्वास और युवाओं के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
सरकार के सामने चुनौती सिर्फ आंदोलन खत्म कराने की नहीं है, बल्कि ऐसा भरोसा कायम करने की है कि आने वाली भर्ती परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका न रहे।
