धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों हुआ? आखिर क्यों झुकी मोदी सरकार? कहां लिखी गई इस्तीफे की स्क्रिप्ट और इसका क्या बिहार कनेक्शन?
वैसे कहा जा रहा है कि अगर सवाल राष्ट्रीय अध्यक्ष की इज्जत का नहीं होता, तो और डंडे चलते और आंदोलन भी लंबा खिंचता।
बिहार में हुए आंदोलन सत्ता को हिला देते हैं, सत्ता बदल देते हैं। पटना में हुआ जेपी आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
इस बार भी कॉकरोच आंदोलन रफ्तार पकड़ रहा था, लेकिन इसी बीच उपचुनाव आ गया। जी हां, क्या आपको पता है कि बिहार के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव चल रहे हैं? यह वही सीट है, जिसके विधायक नितिन नवीन को नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया।
नितिन नवीन के राज्यसभा में जाने के बाद यह सीट खाली हो गई। भाजपा ने पहले यहां से एक उम्मीदवार उतारा, लेकिन नामांकन के बाद उम्मीदवार बदल दिया।
अब भाजपा ने वहां से एक ‘डिलीवरी बॉय’ को मैदान में उतारा है।
इधर, पिछले विधानसभा चुनाव में बुरी तरह फ्लॉप रही जनसुराज के प्रशांत किशोर भाजपा को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
भाजपा उम्मीदवार की हालत काफी कमजोर बताई जा रही है। जंतर-मंतर पर कॉकरोचों के आंदोलन का असर बिहार में भी दिखाई देने लगा था और वहां भी कॉकरोच सड़कों पर उतर आए थे।
यह तो सब जानते हैं कि जब बिहार का युवा जागता है, तो जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति जैसी लहर पैदा होती है। इसी आंदोलन ने कभी इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर नेता की कुर्सी तक हिला दी थी।
जैसे-जैसे दिल्ली में आंदोलन आगे बढ़ रहा था, वैसे-वैसे बिहार के बांकीपुर में भाजपा के वोटों की संख्या लगातार घटने की चर्चा होने लगी।
अगर दिल्ली में और डंडा चलता, तो जाहिर है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नाक कट सकती थी, क्योंकि सबसे बड़ा खतरा बांकीपुर की सीट पर था।
कहा जा रहा है कि भाजपा ने पूरा गुणा-गणित लगाया। चुनाव आयोग, SIR, ED और CBI समेत हर पहलू पर नजर डाली गई, लेकिन हार का खतरा साफ दिखाई देने लगा।
एक बात और, भले ही आज प्रशांत किशोर उतने सफल नहीं माने जाते, लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह यह अच्छी तरह जानते हैं कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रशांत किशोर, यानी पीके, ने उनके लिए क्या भूमिका निभाई थी।
इसी वजह से ताबड़तोड़ कॉकरोचों पर डंडा चलाना रोका गया और शायद पहली बार विरोध कर रहे लोगों को एसी कमरे में बैठाकर बातचीत भी की गई।
इसके बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की शर्त भी मान ली गई।
जिस सरकार के बारे में कहा जाता था कि वहां इस्तीफे नहीं होते, वहां भी इस्तीफा हो गया, क्योंकि बात पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की साख की थी।
सरकार शायद इतनी बड़ी राजनीतिक बेइज्जती का जोखिम नहीं लेना चाहती थी। इसलिए ट्रिपल इंजन सरकार ने किसी तरह अपनी लाज बचाने की कोशिश की।
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