बिहार- बांकीपुर उपचुनाव……एक अवलोकन

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बिहार ..बांकीपुर उपचुनाव-एक अवलोकन

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बांकीपुर उपचुनाव में दो मुख्य प्रत्याशियों, जन सुराज के प्रशांत किशोर और भाजपा के नीरज भारती, का नामांकन हुआ। राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता का नामांकन पहले हो चुका है। अब यह लगभग तय है कि मुकाबला इन्हीं तीनों के बीच है। तीनों प्रचार में भी जुटे हुए हैं।

इन तीनों में से दो, प्रशांत किशोर और नीरज भारती, का यह पहला चुनाव है। रेखा गुप्ता पिछले चुनाव में भी मुकाबला कर चुकी हैं और उन्हें ठीक-ठाक वोट आए थे। इस लिहाज से वे इन दोनों से अनुभवी हैं। मगर मौजूदा स्थिति में यह माना जा रहा है कि बहुत मुमकिन है कि आखिर में मुख्य मुकाबला प्रशांत किशोर और नीरज के बीच हो।

नीरज के लिए प्लस प्वाइंट यह है कि वे एक बड़ी और चुनाव लड़ने में सिद्धहस्त पार्टी भाजपा के उम्मीदवार हैं। यह सीट पिछले 31 साल से भाजपा के पास है। एनडीए इस समय बिहार में काफी मजबूत है और वह नीरज को जिताने में पूरी ताकत झोंकने वाला है। मगर नीरज के कुछ माइनस प्वाइंट भी हैं।

पहला माइनस प्वाइंट यह है कि उनकी पार्टी के बीच चुनाव में उम्मीदवार बदलने की वजह से विपक्षी दलों को भाजपा पर मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल हो गई है और खास तौर पर जन सुराज ने इस बढ़त का लाभ उठाया है। पार्टी के पास इसका कोई ढंग का उत्तर नहीं है।

दूसरी बात, वे खुद चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। पार्टी ने जबरन उन्हें उम्मीदवार बना दिया है। वे न ढंग से अपनी बात रख पाते हैं, न उनमें एक उम्मीदवार के रूप में जनता के बीच खुद को पेश करने का कौशल है। भाजपा कहती है कि वह कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाती है। यह अच्छी बात है। मगर ऐसे कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाए जो उस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार हों। मगर नीरज बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उन्हें पार्टी पत्रकारों के सवालों से बचाने में जुटी है। एक जूनियर कार्यकर्ता होने की अति-विनम्रता उन पर ऐसी हावी है कि वे हर जगह खुद ही दबे-कुचले नजर आते हैं।

खैर, उनकी पार्टी इसका कोई न कोई हल निकालेगी।

जहां तक प्रशांत किशोर की बात है, कद और लोकप्रियता में वे इन दोनों उम्मीदवारों पर भारी हैं। बांकीपुर उपचुनाव में अगर पूरे देश की रुचि है, तो इसलिए भी कि यहां से प्रशांत किशोर चुनाव लड़ रहे हैं। वे राष्ट्रीय मीडिया और पॉडकास्टरों के प्रिय हैं। उनके पास प्रोफेशनलों की मजबूत टीम है, जो हर चीज का बेहतर प्रबंधन करती है। उनके पास तीन साल की पदयात्रा, पूरे बिहार में चुनाव लड़ने का अनुभव और अपनी बात बेहतर तरीके से कहने की शैली है।

मगर पिछले चुनाव की बुरी हार बताती है कि उन्हें अभी राजनीति में बहुत कुछ सीखना है। सबसे अधिक विनम्रता और दूसरों को सुनने तथा साथ लेकर चलने का कौशल। तीन साल तक हर तरह के संसाधन झोंक देने के बावजूद वे पिछले चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाए। ज्यादातर बड़े नाम उनकी पार्टी छोड़कर चले गए। मगर उनके स्वभाव की एरोगेंसी घटने का नाम नहीं लेती।

कल भी एक पत्रकार को वे उसके सवाल पर भला-बुरा कह रहे थे। कह रहे थे कि बिहार के पत्रकारों में इतनी समझदारी नहीं है कि वे समझें कि जाति पर चुनाव कहां नहीं होता। पत्रकार ने सिर्फ इतना पूछा था कि बिहार में जाति के आधार पर चुनाव होते हैं, आप इसका समाधान कैसे निकालेंगे। पत्रकारों के साथ बुरा बर्ताव करना, उन्हें बाइट नहीं देना, झल्लाना—यह सब सार्वजनिक होता है। कई पत्रकारों ने शिकायत की है कि प्रचार अभियान के दौरान माइक लगाने पर भी वे जवाब नहीं देते। दिल्ली के पत्रकारों को घंटे भर का इंटरव्यू देने वाले पीके, बिहार के पत्रकारों को एक बाइट देना भी अपनी तौहीन मानते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि यह उनके लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है।

खैर, यह उनका मसला है। मुमकिन है कि बांकीपुर की जनता इस बार उन्हें अपना बेहतर विकल्प मानकर जिता दे और अगर ऐसा होता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा।

अब बात तीसरे उम्मीदवार रेखा गुप्ता की। उन्हें पार्टी और उनके गठबंधन ने अकेला छोड़ दिया है। वे मीडिया डिबेट से भी बाहर हैं। मगर ऐसा दिखता है कि वे सरलता से अपने इलाके में घूम रही हैं। बातें कर रही हैं। उनकी बातों में एक सहजता और सौम्यता दिखती है। वे अपनी बातें तर्कपूर्ण तरीके से रखती हैं। आप उनसे मिलें तो आपका मन खुश होगा। वे अनुभवी भी हैं।

मगर जिस तरह राजद के नेता उनके चुनाव अभियान से दूरी बनाकर चल रहे हैं, ऐसा लग रहा है कि उन्होंने पीके के लिए वॉकओवर दे रखा है। ऐसे महत्वपूर्ण चुनाव में तेजस्वी का भी बाहर होना अजीब लगता है। इन सबका नुकसान तो जाहिर है रेखा गुप्ता को होगा। मगर फिर भी सकारात्मक भाव से उनका अपना अभियान चलाते रहना अच्छा लगता है

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