पार्टी हित सर्वोपरि: जनसरोकार के मुद्दों पर विपक्ष की चुनिंदा राजनीति
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका जनता की आवाज़ बनने और सत्ता पक्ष को उसकी जवाबदेही याद दिलाने की होती है। लेकिन जब देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा कोई गंभीर मुद्दा राजनीतिक नफ़े-नुकसान की भेंट चढ़ जाए, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाज़मी है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक में हुई धांधली और पेपर लीक का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है।
जब यह मुद्दा शुरुआती दौर में था, तब विपक्षी खेमे के तमाम बड़े चेहरों और पार्टियों ने फाइलें लहराकर, सुर में सुर मिलाते हुए और कड़े बयान देकर इसे जोर-शोर से उठाया था। उस वक्त ऐसा लगा मानो वे युवाओं के हक के लिए अंतिम सांस तक लड़ जाएंगे।
लेकिन, राजनीति की बिसात पर मोहरे बदलते ही मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता कैसे गायब हो जाती है, यह तब साफ हुआ जब सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) ने इस आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले ली। जंतर-मंतर पर पिछले करीब दो सप्ताह से अधिक समय से विख्यात शिक्षाविद व इनोवेटर सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी इस गड़बड़ी के खिलाफ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस आंदोलन में सोनम वांगचुक खुद हंगर स्ट्राइक (भूख हड़ताल) पर बैठकर अपना अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं।
इस दौरान देश के अन्य हिस्सों से भी परीक्षाओं में धांधली की खबरें आईं। भोपाल के राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) से पेपर चोरी होने का मामला सामने आया, तो वहीं महाराष्ट्र में पात्रता परीक्षाओं (TET) के प्रश्नपत्र लीक होने की बात उजागर हुई। एक के बाद एक आती इन खबरों ने देश की शिक्षा व्यवस्था की जर्जर हो चुकी साख को तार-तार कर दिया।
हैरानी की बात यह है कि जैसे ही इस आंदोलन का नेतृत्व सीजेपी (CJP) के हाथों में गया, वैसे ही संसद से सड़क तक हंगामा करने वाली बाकी तमाम विपक्षी पार्टियों ने इस पूरे मुद्दे से पूरी तरह किनारा कर लिया। जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन में उनकी अनुपस्थिति यह साफ बयां करती है कि उनके लिए छात्रों का भविष्य या शिक्षा व्यवस्था में सुधार कोई वास्तविक चिंता नहीं, बल्कि सिर्फ एक राजनीतिक हथियार था।
चूंकि इस मुद्दे को अब कोई दूसरा संगठन लीड कर रहा है, इसलिए क्रेडिट न मिलने के डर से बाकी दलों ने शिक्षा के इस इतने बड़े और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे को बीच राह में ही छोड़ दिया।
इससे विपक्षी दलों की यह सच्चाई खुलकर सामने आती है कि हमारे देश के राजनीतिक दलों के लिए जनहित या देश की बेहतरी से कहीं अधिक ‘पार्टी हित सर्वोपरि’ है। मुद्दे तभी तक जीवंत रखे जाते हैं, जब तक उनसे खुद की राजनीति चमकती रहे।
यह रवैया साफ तौर पर यह साबित करता है कि विपक्ष में बैठे दल राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं को लेकर वास्तव में संवेदनशील नहीं हैं। युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले इस गंभीर मुद्दे पर दिखाई गई यह राजनीतिक उदासीनता बेहद निराशाजनक है।
जब तक पार्टियां अपने संकुचित राजनैतिक दायरे से ऊपर उठकर देशहित में एकजुट होना नहीं सीखेंगी, तब तक जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों का इसी तरह राजनीतिकरण होता रहेगा और देश का युवा खुद को ठगा सा महसूस करता रहेगा।
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