भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; केंद्र और एमपी सरकार को नोटिस, नमाज के लिए अलग जगह देने का निर्देश
मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील भोजशाला परिसर को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने दिया एक बहुत बड़ा फैसला।
सुप्रीम कोर्ट ने आज इस मामले पर सुनवाई करते हुए बहुत ही संतुलित फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ लफ्जों में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों से धैर्य रखने की अपील की है और कहा है कि चूंकि यह बेहद संवेदनशील मामला है, इसलिए कोर्ट इस पर रोजाना सुनवाई करने के लिए भी तैयार है।
दरअसल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में धार जिले के इस विवादित 11वीं सदी के भोजशाला-कमल मौला परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर माना था। हाई कोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने अब केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब कर लिया है।
नमाज के लिए अलग खुली जगह देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए एक अंतरिम (ad-hoc) व्यवस्था बनाने की कोशिश की है। अदालत ने निर्देश दिया है कि दोनों पक्षों के अधिकारों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, एक बीच का रास्ता निकाला जाए। इसके तहत मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन दोपहर 1:00 बजे से 3:00 बजे के बीच नमाज पढ़ने के लिए भोजशाला कॉम्प्लेक्स के ही पास में एक अलग और खुली जगह दी जा सकती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी कड़े निर्देश दिए हैं कि वह शीर्ष अदालत की मर्जी के बिना भोजशाला के मूल ढांचे में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं करेगा।
हर शब्द का इस्तेमाल बेहद सावधानी से हो – सीजेआई
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तल्ख टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि अदालत के भीतर या बाहर इस्तेमाल किए जाने वाले हर एक शब्द को लेकर बहुत सावधानी बरतनी होगी। ये आस्था और भावनाओं से जुड़े मामले हैं, जहाँ कोर्ट में कही गई किसी भी बात से बेवजह का नया विवाद पैदा हो सकता है या समाज में गलत संदेश जा सकता है। सीजेआई ने मौखिक रूप से कहा कि अभी जो भी अंतरिम व्यवस्था बनाई जा रही है, उसके साथ इस मामले को अगले 10 से 15 दिनों के भीतर अंतिम सुनवाई के लिए एक उचित बेंच के सामने लगा दिया जाएगा।
कोर्ट रूम में वकीलों की दलीलें और 1997 का समझौता
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की तरफ से देश के दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी और हुजैफा अहमदी ने पैरवी की। हुजैफा अहमदी ने 1997 के एक पुराने समझौते और कलेक्टर के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सालों से यह व्यवस्था रही है कि मंगलवार को हिंदू पक्ष वहां पूजा-अर्चना करता था और शुक्रवार को मुस्लिम समाज नमाज पढ़ता था। लेकिन नए आदेशों के बाद मुस्लिम समुदाय को वहां से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है।
इस पर सीजेआई ने कहा कि हम किसी के अधिकारों को चोट पहुंचाए बिना नमाज के लिए पास में ही एक एरिया तय करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल भी प्रशासन की तरफ से नमाज के लिए अलग खुली जगह देने की इस व्यवस्था पर राजी हो गए हैं। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने इतिहास का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि मूल रूप से वहां वाग्देवी (मां सरस्वती) की एक मूर्ति स्थापित थी, जो फिलहाल लंदन में है और अभी वहां तस्वीर रखकर नियमित पूजा की जा रही है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े दखल के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में रोजाना होने वाली सुनवाई से क्या अंतिम रास्ता निकलता है।
हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे-
1. परिसर को ‘सरस्वती मंदिर’ घोषित किया कोर्ट ने एएसआई (ASI) की सर्वे रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह माना कि धार का यह विवादित परिसर मूल रूप से देवी वाग्देवी का मंदिर और राजा भोज के काल का एक बड़ा संस्कृत शिक्षण केंद्र था। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस स्थान का धार्मिक चरित्र ‘माता सरस्वती के मंदिर’ का ही है।
2. साल 2003 की व्यवस्था और नमाज की अनुमति को किया रद्द इससे पहले साल 2003 में पुरातत्व विभाग (ASI) ने एक व्यवस्था लागू की थी, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुस्लिमों को शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस 2003 के आदेश को पूरी तरह खारिज (रद्द) कर दिया और परिसर के भीतर नमाज पढ़ने पर पूरी तरह से रोक लगा दी।
3. हिंदुओं को निर्बाध पूजा का अधिकार हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि चूंकि यह स्थान मूल रूप से एक मंदिर है और सदियों से यहाँ हिंदुओं की पूजा का सिलसिला कभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है, इसलिए यहाँ हिंदुओं को नियमित और बिना रोक-टोक पूजा-अर्चना करने का अधिकार है।
4. मुस्लिमों के लिए वैकल्पिक जमीन का सुझाव हाई कोर्ट ने अपने फैसले में राज्य सरकार को यह सुझाव भी दिया कि मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए, प्रशासन उन्हें धार जिले में ही मस्जिद या नमाज अदा करने के लिए कोई दूसरी उपयुक्त और स्थायी जमीन आवंटित करने पर विचार कर सकता है।
5. एएसआई की भूमिका पर सख्त टिप्पणी हाई कोर्ट ने केंद्रीय एजेंसी एएसआई (ASI) को भी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि एएसआई ने इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख और प्रबंधन में लापरवाही बरती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसआई को निर्देश दिया था कि वे इस मंदिर परिसर के बेहतर प्रशासन और संस्कृत गतिविधियों के सुचारू संचालन के लिए नई नियमावली और प्रबंधन व्यवस्था तैयार करें।
इसी फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जिसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतिम फैसला आने तक शुक्रवार की नमाज के लिए परिसर के बिल्कुल पास में एक खुली जगह अस्थाई रूप से देने का निर्देश दिया है।
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