मातम का पर्व मोहर्रम मनाने का सही तरीका क्या है?

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उज्जैन+रतलाम+ और जगहों के अखाड़ों के वीडियो लगाकर स्टिंग…

क्या ऐसे?.. क्रेन से हवा में कबाड़ कार को लटका कर उसमें ब्लास्ट करके, इतने ऊंचे ताजिए बनाकर कि वो हाईटेंशन लाइन से टकरा जाएं..
हाथों में तलवारें, डंडे, फर्से लहराकर दूसरों को दहशत में डालकर…

या फिर रोजा रखकर, घरों में इबादत कर, दुआएं मांगकर…
विषय विवादित हो सकता है, हो सकता है देखने वालों को नागवार गुजरे, शायद इसीलिए इस पर कोई बात नहीं करना चाहता, लेकिन हम बात करेंगे भी और कोशिश करेंगे कि समझें कि
मोहर्रम का जश्न मनाया जाए या मातम..

क्योंकि धर्म तभी बचता है जब उसमें फैली कुरितियों का विरोध उसके मानने वाले करें।
मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है जिसे बेहद पवित्र माना जाता है। यह त्योहार खुशी के बजाय इमाम हुसैन की शहादत की याद में गम और मातम के रूप में मनाया जाता है।

मातम इसलिए क्योंकि 680 ईस्वी में कर्बला की जंग में पैगंबर मुहम्मद के नवासे, हज़रत इमाम हुसैन अपने परिवार और अनुयायियों के साथ शहीद हो गए थे।
खासतौर से शिया मुस्लिम समुदाय इसे मातम मनाता है। हम खासतौर से लखनऊ, दिल्ली, कश्मीर में काले कपड़े पहने शिया समुदाय के लोगों को मातम के वीडियो देख सकते हैं…

वहीं इस लोग रोजा रखकर इबादत करते हैं। सुन्नी इस्लामिक जानकार कहते हैं जुलूस निकालना, अखाड़ा निकालना, ताजिए निकालना, जानवरों की शक्ल बनाकर डांस करना शरियत यानी इस्लामी कानून का हिस्सा नहीं है।
लेकिन मध्यप्रदेश में क्या हो रहा है… खास तौर से इस बार ऐसे वीडियो सामने आए जो सोचने पर मजबूर करते हैं कि मोहर्रम मातम का पर्व से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन का पर्व बन गया है।

उज्जैन के बड़नगर में अखाड़े के दौरान कबाड़ा कार को हवा में लटकाकर विस्फोट किया गया, आखिर क्यों? ये क्या तमाशा है, इससे आप क्या साबित करना चाहते हो,
और कोई मौलाना इनके खिलाफ फतवा क्यों जारी नहीं करता।

रतलाम में इतना ऊंचा ताजिया बनाया वो हाईटेँशन लाइन से टकरा गया, आम तौर पर बांस का इस्तेमाल होता था, लेकिन भाई लोगों ने लोहे की रॉड लगा दीं इस बार ताजिए में..
तार से टकराते ही आग लग गई, करंट फैल गया और तीन लोगों की मौत हो गई

नमाज इस्लाम की बुनियादी शर्त है… लेकिन शायद लोगों ने आज अखाड़े, जुलूस, हुजूम को ही इबादत मान लिया है।
कर्बला के मैदान में जब इमाम हुसैन और यज़ीद की सेना के बीच जंग अपने चरम पर थी और चारों तरफ तीर-तलवारें चल रही थीं, तब भी हज़रत इमाम हुसैन ने जान की परवाह न करते हुए आखिरी वक्त तक अपनी नमाज़ नहीं छोड़ी थी, लेकिन आज क्या हो

रहा है, इस बार शुक्रवार के दिन मोहर्रम थे, और भाई लोगों ने जुमे की नमाज छोड़कर जुलूस में शामिल थे…
मुस्लिम समुदाय को खुद तय करना होगा कि मुहर्रम की 10 तारीख मातम का दिन है, वो खुद तय करें कि इस दिन को कैसे मनाए,

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