OBC आरक्षण पर, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस
अगर मां-बाप IAS अधिकारी हों… शानदार सैलरी हो… बड़ा घर हो… समाज में सम्मान हो… तो क्या उनके बच्चों को भी आरक्षण मिलना चाहिए?”
सुप्रीम कोर्ट में यही सवाल उठा… और अब पूरे देश में इस पर बहस छिड़ चुकी है।
कुछ लोग कह रहे हैं कि अब आरक्षण सच में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना चाहिए… तो कुछ लोगों का कहना है कि सिर्फ पैसा आने से सामाजिक भेदभाव खत्म नहीं हो जाता। आखिर कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? पूरा मामला क्या है? और क्या आने वाले समय में आरक्षण के नियम बदल सकते हैं? आज इस वीडियो में हम आपको आसान भाषा में पूरा मामला समझाएंगे।
दरअसल यह मामला कर्नाटक के कुरुबा समुदाय से जुड़े एक उम्मीदवार का है। यह समुदाय वहां OBC यानी अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है। उम्मीदवार ने आरक्षण का लाभ लेने के लिए जाति प्रमाण पत्र मांगा था… लेकिन जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया। कारण बताया गया कि उम्मीदवार का परिवार ‘क्रीमीलेयर’ में आता है। परिवार की सालाना आय करीब 19 लाख 48 हजार रुपये बताई गई… और माता-पिता सरकारी कर्मचारी थे।
इसके बाद मामला पहुंच गया सुप्रीम कोर्ट। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने बड़ा सवाल उठाया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा… अगर माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं… उन्होंने आरक्षण का लाभ लेकर अच्छी शिक्षा और ऊंचा पद हासिल कर लिया… तो फिर उनके बच्चों को भी लगातार आरक्षण क्यों मिलना चाहिए?
कोर्ट ने कहा कि जब परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हो चुका है… तो उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर आ जाना चाहिए। जज ने यह भी कहा कि अगर हर पीढ़ी लगातार आरक्षण लेती रहेगी… तो फिर यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा।
लेकिन यहां सबसे जरूरी बात समझिए… सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई नया नियम या फैसला नहीं दिया है। यह सिर्फ सुनवाई के दौरान जज की मौखिक टिप्पणी यानी ओरल ऑब्जर्वेशन था। मतलब फिलहाल आरक्षण के नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
अब सवाल उठता है कि आखिर ये ‘क्रीमीलेयर’ होता क्या है? सरल भाषा में समझें तो OBC वर्ग के ऐसे परिवार… जो आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी मजबूत हो चुके हैं… उन्हें क्रीमीलेयर कहा जाता है। ऐसे परिवारों के बच्चों को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
सुनवाई के दौरान उम्मीदवार के वकील शशांक रत्नू ने कोर्ट में दलील दी कि सिर्फ वेतन के आधार पर किसी को क्रीमीलेयर नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होगा… तो ड्राइवर, क्लर्क, चपरासी जैसे निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी भी आरक्षण से बाहर हो जाएंगे। और यह सही नहीं होगा।
अब इस मामले पर देशभर में दो अलग-अलग राय बन चुकी हैं। पहली राय ये है कि अगर परिवार पहले ही मजबूत हो चुका है… अच्छी नौकरी, पैसा और सामाजिक सम्मान मिल चुका है… तो आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जो अब भी पीछे हैं।
लोगों का कहना है कि आरक्षण का मकसद बराबरी लाना है… न कि एक ही परिवार को पीढ़ियों तक फायदा देना।
वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सिर्फ पैसा आने से समाज में भेदभाव खत्म नहीं हो जाता। भले ही कोई IAS अधिकारी बन जाए… लेकिन जातिगत भेदभाव आज भी कई जगह मौजूद है। इसलिए आरक्षण खत्म करना सही नहीं होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है… क्या आरक्षण आर्थिक स्थिति देखकर मिलना चाहिए… या सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर? और अगर माता-पिता ऊंचे पद पर पहुंच जाएं… तो क्या उनके बच्चों को भी वही सुविधा मिलती रहनी चाहिए?
यही बहस अब देशभर में तेज होती जा रही है। आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? क्या IAS अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण मिलना चाहिए… या फिर आरक्षण का लाभ सिर्फ उन लोगों को मिलना चाहिए जो आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
यह भी पढ़ें- एक्स’ पर ‘द कॉकरोच इज़ बैक’, इंस्टाग्राम पर 1.45 करोड़ फॉलोअर्स हुए, बीजेपी को पछाड़ा
You may also like
-
बांग्लादेश का दुर्लभ सफेद भैंसा ‘डोनाल्ड ट्रंप’ … ईद पर देखने उमड़ रही भीड़
-
एक्स’ पर ‘द कॉकरोच इज़ बैक’, इंस्टाग्राम पर 1.45 करोड़ फॉलोअर्स हुए, बीजेपी को पछाड़ा
-
सोने की चमक… मोदी को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन
-
दुनिया के कारखाने-कारोबार फौजी सामान बनाने में जुटे..
-
हिंदुस्तानियों के हित में प्रणाम! उदंत मार्त्तण्ड…
