पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध जैसे हालात के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार संसद में स्पष्ट रुख रखते हुए कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी भारत के लिए स्वीकार्य नहीं है और मौजूदा संकट का समाधान केवल संवाद और कूटनीति से ही संभव है।
लोकसभा में दिए गए अपने विस्तृत बयान में प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम कराने के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने साफ कहा कि वाणिज्यिक जहाजों पर हमले और समुद्री मार्गों में रुकावट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं, जिन्हें किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल, यह बयान ऐसे समय आया है जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर है और तेल-गैस आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यह जलमार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल और गैस का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
हाल के दिनों में इस क्षेत्र में जहाजों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिससे आवागमन प्रभावित हुआ है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
आशंका जताई जा रही है कि हालात और बिगड़े तो कीमतें 200 डॉलर तक जा सकती हैं, जिसका असर सीधे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बयान में देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भरोसा दिलाने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि भारत ने पिछले एक दशक में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत किया है और वर्तमान में 53 लाख मीट्रिक टन से अधिक का रिजर्व उपलब्ध है, जिसे बढ़ाकर 65 लाख मीट्रिक टन करने की योजना पर काम चल रहा है। इसके साथ ही भारत ने तेल आयात के स्रोतों को भी व्यापक किया है
जहां पहले 27 देशों से आयात होता था, अब यह संख्या बढ़कर 41 हो गई है। इसका उद्देश्य किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करना और आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता बनाए रखने के लिए विभिन्न देशों और सप्लायर्स के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत यह सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय है कि तेल, गैस और उर्वरक से जुड़े जहाज सुरक्षित रूप से भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचते रहें।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश में रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाई गई है और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया गया है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में व्यवधान को कम किया जा सके।
हालांकि प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि यह संकट भारत के लिए कई स्तरों पर चुनौती लेकर आया है। आर्थिक, रणनीतिक और मानवीय पहलुओं पर इसका असर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया भारत के लिए न केवल ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है, बल्कि वहां बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी रहते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल है।
इसके बावजूद उन्होंने भरोसा दिलाया कि देश में एलपीजी और अन्य ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार लगातार स्थिति की निगरानी कर रही है।
प्रधानमंत्री ने कोविड-19 महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत पहले भी वैश्विक संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर चुका है और इस बार भी तैयारियों के साथ स्थिति को संभालने में सक्षम है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि अफवाहों और डर फैलाने वाली बातों से दूर रहें और सरकार के प्रयासों पर भरोसा बनाए रखें। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत की कूटनीतिक नीति स्पष्ट है तनाव को कम करना, सभी पक्षों से संवाद बनाए रखना और शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में काम करना।
इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री का यह बयान न केवल घरेलू स्तर पर भरोसा पैदा करने का प्रयास है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी एक संदेश देता है कि भारत स्थिरता, संवाद और सहयोग के पक्ष में खड़ा है। मौजूदा संकट भले ही वैश्विक हो, लेकिन भारत अपनी रणनीति और तैयारियों के जरिए इसके प्रभाव को सीमित रखने की दिशा में सक्रिय है।
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