कांग्रेस धीरे-धीरे सभी राज्यों में सिमटती जा रही है! और अपने पतन के निकट है, न तो इसको बचा पाने में शीर्ष नेतृत्व सक्रिय नजर आ रहा है न ही जमीनी संगठन….
आज ऑपोज़िशन की पोज़िशन कहाँ है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। दरअसल, साल 2014 के लोकसभा चुनावों में 44 और 2019 के लोकसभा चुनावों में 52 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस को इस बार के लोकसभा चुनावों में 99 सीटों पर जीत मिली, तो कई राजनीतिक विश्लेषकों और विशेषज्ञों ने इसे कांग्रेस की वापसी माना।
लेकिन राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शिकस्त बेहद चिंताजनक है। एक-एक कर मानो कांग्रेस ऑल आउट होने के करीब पहुँचती जा रही है।
दरअसल, कांग्रेस अपनी हार की शताब्दी के निकट है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक जैसे पारंपरिक गढ़ भी ढह गए, उत्तर-पूर्व जहाँ कांग्रेस कभी सबसे मज़बूत थी लगभग पूरी तरह छिन चुका है। मध्य भारत, जिनमें एमपी और छत्तीसगढ़ जैसी जगहें शामिल हैं, वहाँ भी कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। इसके बाद बिहार में 2025 की हार ने पूरे ग्राफ को ज़मीन पर ला पटका।
ये सब तो ठीक है, अभी-अभी राज्यसभा के चुनाव हुए। आप सभी जानते हैं कि इन चुनावों में, खासकर बिहार, ओडिशा और हरियाणा में, खुद कांग्रेस के विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की। अब सवाल यह बनता है कि कमी कहाँ नज़र आ रही है? क्या शीर्ष नेतृत्व अपना काम सही से नहीं कर पा रहा है, या फिर जमीनी संगठन उतना प्रभावी नहीं रहा जितना इस समय कांग्रेस को भाजपा के सामने खड़े रहने के लिए आवश्यक है?
धीरे-धीरे कांग्रेस के हाथ से सभी राज्य निकलते जा रहे हैं। अभी एक और नया मामला असम का है। हाल ही में असम चुनावों की तारीखें आई हैं। वोटिंग 9 अप्रैल को होनी है और नतीजे 4 मई को आएँगे। लेकिन इससे ठीक पहले ही कांग्रेस को एक बड़ा झटका लगा। कांग्रेस के मौजूदा सांसद और दिग्गज नेता प्रद्युत बोरदोलोई ने कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है।
आँकड़ों और राजनीतिक समझ के आधार पर देखा जाए तो कांग्रेस के लगातार चुनाव हारने के पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि कई गहरी और जुड़ी हुई कमजोरियाँ हैं, जो समय के साथ बढ़ती गई हैं। सबसे बड़ी समस्या संगठनात्मक कमजोरी की है, क्योंकि पार्टी का जमीनी ढांचा कई राज्यों में कमजोर पड़ चुका है और बूथ स्तर तक मज़बूत कार्यकर्ता नेटवर्क की कमी साफ-साफ दिखाई दे रही है।
जबकि भाजपा इस मामले में काफी आगे है। इसके साथ ही नेतृत्व को लेकर भी अस्पष्टता बनी रहती है, जिससे कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों में भरोसे की कमी होती है। कांग्रेस के पास एक स्पष्ट और लगातार दोहराया जाने वाला नैरेटिव भी नहीं दिखता, जबकि भाजपा राष्ट्रवाद, विकास और वैचारिक मुद्दों पर लगातार एक मज़बूत पकड़ बनाए हुए है।
कई राज्यों में कांग्रेस अपनी ताकत बढ़ाने के बजाय क्षेत्रीय दलों पर निर्भर हो गई है, जिससे उसकी स्वतंत्र पहचान कमजोर पड़ती है। चुनावी रणनीति के मामले में भी कांग्रेस डिजिटल कैंपेन, डेटा और संसाधनों के प्रभावी उपयोग में पीछे रह गई है। इसके अलावा, पार्टी अक्सर स्थानीय मज़बूत चेहरों को उभारने में असफल रहती है और केंद्रीय नेतृत्व पर अधिक निर्भर दिखती है, जिससे स्थानीय जुड़ाव कम होता है।
आंतरिक गुटबाजी भी कई राज्यों में बड़ा नुकसान पहुँचाती रही है। कांग्रेस महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठाती ज़रूर है, लेकिन उन्हें जन-आंदोलन में बदलने में उतनी प्रभावी नहीं हो पाती। लगातार हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिरा है, जिसका असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ता है। साथ ही, भाजपा की मज़बूत संगठनात्मक क्षमता, संसाधन और रणनीति भी कांग्रेस की हार को और गहरा करती है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस की गिरती स्थिति उसकी अपनी कमजोरियों और विपक्ष की मज़बूती दोनों का संयुक्त परिणाम है, और वापसी के लिए उसे संगठन, नेतृत्व और स्पष्ट विज़न पर एक साथ गंभीरता से काम करना होगा।
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