इंग्लैंड की फ्रेंचाइजी क्रिकेट लीग द हंड्रेड के 2026 ऑक्शन में एक ऐसा फैसला सामने आया जिसने खेल जगत के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी चर्चा पैदा कर दी। पाकिस्तान के स्पिन गेंदबाज अबरार अहमद को सनराइजर्स लीड्स ने लगभग 1.90 लाख पाउंड यानी करीब 2.34 करोड़ रुपये में अपनी टीम में शामिल किया।
यह फ्रेंचाइजी सन ग्रुप के स्वामित्व में है, जिसका संचालन उद्योगपति कलानिधि मारन के परिवार द्वारा किया जाता है और टीम के प्रबंधन में काव्या मारन की अहम भूमिका है। ऑक्शन के दौरान टीम के मुख्य कोच डेनियल विटोरी भी मौजूद थे और यह प्रक्रिया लंदन के पिकैडिली लाइट्स में आयोजित की गई थी।
इस फैसले की चर्चा इसलिए भी ज्यादा हो रही है क्योंकि लंबे समय से भारतीय क्रिकेट से जुड़ी फ्रेंचाइजियों द्वारा पाकिस्तानी खिलाड़ियों को टीम में शामिल करने से बचा जाता रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव के कारण 2008 के बाद से पाकिस्तानी खिलाड़ियों को इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने का मौका नहीं मिला। इसके बाद आईपीएल मालिकों की अन्य विदेशी लीगों में भी अक्सर यह देखा गया कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को प्राथमिकता नहीं दी जाती। यही वजह है कि जब सनराइजर्स लीड्स ने अबरार अहमद को खरीदा तो इसे कई लोगों ने एक बड़ी परंपरा के टूटने के रूप में देखा।
दरअसल, ऑक्शन से पहले मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि आईपीएल से जुड़े चार फ्रेंचाइजी मालिकों की टीमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नहीं खरीदेंगी। लेकिन इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने साफ संकेत दिया कि खिलाड़ियों का चयन केवल खेल प्रतिभा के आधार पर होना चाहिए। ब्रिटेन में भेदभाव विरोधी कानून काफी कड़े हैं और किसी भी खिलाड़ी को राष्ट्रीयता के आधार पर बाहर रखना विवाद का कारण बन सकता है। माना जा रहा है कि इसी कानूनी और नैतिक दबाव के बाद फ्रेंचाइजी ने मेरिट के आधार पर निर्णय लिया।
अबरार अहमद का चयन पूरी तरह क्रिकेट प्रदर्शन से भी जुड़ा माना जा सकता है। उन्होंने 2022 में पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था और जल्द ही अपनी रहस्यमयी स्पिन गेंदबाजी से पहचान बना ली। शुरुआत में उन्हें टेस्ट क्रिकेट का विशेषज्ञ माना जाता था, लेकिन 2024 के बाद से टी20 क्रिकेट में भी उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। अब तक वे टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में पचास से अधिक विकेट ले चुके हैं और उनकी इकॉनमी दर भी काफ़ी नियंत्रित रही है। हाल ही में टी20 विश्व कप में भी उन्होंने प्रभावी गेंदबाजी की थी, जिससे उनकी मांग बढ़ी।
इसी ऑक्शन में पाकिस्तान के एक अन्य स्पिनर उस्मान तारिक को भी बर्मिंघम फोनिक्स ने खरीदा। हालांकि तेज गेंदबाज हारिस रऊफ और बल्लेबाज सैम अयूब पहले दौर में अनसोल्ड रहे। पाकिस्तान के कप्तान शाहीन शाह आफरीदी ने ऑक्शन से पहले ही अपना नाम वापस ले लिया था, जिससे संभावित विवादों की संभावना भी कम हो गई।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने भारत में एक पुरानी बहस को भी फिर से सामने ला दिया है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाया कि जब अतीत में किसी फ्रेंचाइजी द्वारा दूसरे पड़ोसी देशों के खिलाड़ियों को लिया गया था तो उस पर तीखी आलोचना हुई थी। उदाहरण के तौर पर कुछ साल पहले जब एक फ्रेंचाइजी मालिक ने बांग्लादेशी खिलाड़ी को अपनी टीम में शामिल किया था तो सोशल मीडिया पर उन्हें कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा था और कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रवाद के चश्मे से देखने की कोशिश की थी।
अब काव्या मारन की टीम द्वारा पाकिस्तानी खिलाड़ी को खरीदने पर अपेक्षाकृत कम प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इस अंतर को लेकर भी बहस चल रही है कि क्या खेल के फैसलों को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए या नहीं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की बात करें तो कई नेताओं और विश्लेषकों ने इस मामले को खेल और राजनीति के अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में देखने की सलाह दी है। कुछ नेताओं का मानना है कि विदेशी लीगों में खिलाड़ियों का चयन पूरी तरह पेशेवर आधार पर होता है और इसे राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि जब लीग किसी दूसरे देश में आयोजित हो रही हो और उसके नियम अलग हों, तो वहां के आयोजकों और फ्रेंचाइजी को खिलाड़ियों के चयन की स्वतंत्रता होती है।
वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणीकारों ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा संबंधों को देखते हुए ऐसे फैसले संवेदनशील हो सकते हैं। उनका मानना है कि खेल भले ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग का माध्यम हो, लेकिन जनता की भावनाओं को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि अधिकांश नेताओं ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देने से बचते हुए इसे खेल से जुड़ा व्यावसायिक निर्णय बताया है।
विश्लेषकों के अनुसार वैश्विक फ्रेंचाइजी क्रिकेट के दौर में यह स्वाभाविक है कि टीमें केवल प्रदर्शन और बाज़ार की जरूरतों को ध्यान में रखकर खिलाड़ी चुनें। द हंड्रेड, बिग बैश, पीएसएल या अन्य टी20 लीगों में अक्सर अलग-अलग देशों के खिलाड़ी एक साथ खेलते हैं और इससे क्रिकेट का दायरा भी बढ़ता है। ऐसे में किसी खिलाड़ी का चयन केवल उसकी राष्ट्रीयता के आधार पर रोकना कई बार खेल की भावना के खिलाफ भी माना जाता है।
काव्या मारन की टीम द्वारा अबरार अहमद को खरीदने का फैसला केवल एक ऑक्शन का परिणाम नहीं बल्कि आधुनिक फ्रेंचाइजी क्रिकेट की जटिलताओं को भी दिखाता है। इसमें खेल, व्यवसाय, कानून और राजनीति सभी तत्व किसी न किसी रूप में जुड़े रहते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का मैदान पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या इससे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट लीगों में खिलाड़ियों की भागीदारी को लेकर नई सोच विकसित होती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह घटना क्रिकेट के साथ-साथ सार्वजनिक विमर्श का भी हिस्सा बन चुकी है।
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