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खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी पर सवाल: सोनिया गांधी ने विदेश नीति की दिशा पर उठाए कई मुद्दे
ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की लक्षित सैन्य कार्रवाई में मौत के बाद भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष Sonia Gandhi ने एक लेख के जरिए केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब किसी संप्रभु देश के शीर्ष नेतृत्व की हत्या कूटनीतिक बातचीत के दौरान होती है, तो यह केवल क्षेत्रीय घटना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है। ऐसे में भारत जैसे बड़े लोकतंत्र की स्पष्ट प्रतिक्रिया अपेक्षित थी।
‘चुप्पी तटस्थता नहीं’
सोनिया गांधी ने तर्क दिया कि सरकार की चुप्पी को तटस्थ रुख नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उनके अनुसार संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। यदि भारत इस पर खुलकर आपत्ति दर्ज नहीं करता, तो इससे उसकी विदेश नीति की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
अनुच्छेद 51 और भारत की परंपरा
कांग्रेस ने अपने बयान में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 का हवाला दिया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय शांति और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने की बात कही गई है। सोनिया गांधी ने लिखा कि भारत ने लंबे समय तक संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और कूटनीतिक समाधान की नीति अपनाई है। उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा परिस्थिति में इन सिद्धांतों पर खुलकर बोलना भारत की नैतिक जिम्मेदारी थी। उनका मानना है कि भारत यदि स्वयं को ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बताता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर स्पष्ट रुख दिखाना चाहिए।
भारत-ईरान संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक और रणनीतिक दोनों रहे हैं। 1990 के दशक में इस्लामिक सहयोग संगठन में कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव को रोकने में तेहरान की भूमिका का उल्लेख भी किया गया। इसके अलावा ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास जहेदान में भारत की कूटनीतिक मौजूदगी को सहयोग दिया, जो क्षेत्रीय रणनीति में अहम माना जाता है। सोनिया गांधी ने याद दिलाया कि 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee ने तेहरान यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती दी थी। उनके अनुसार वर्तमान सरकार को भी उस ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखना चाहिए।
रणनीतिक संतुलन और भविष्य की चुनौती
लेख में यह भी मेंशन किया गया कि भारत के इज़रायल के साथ रक्षा, कृषि और तकनीकी सहयोग मजबूत हुए हैं। ऐसे में नई दिल्ली के पास तेहरान और तेल अवीव दोनों से संवाद की क्षमता है। सोनिया गांधी का कहना है कि भारत शांति और संयम की अपील करने की स्थिति में है, लेकिन यह तभी संभव है जब उसकी छवि निष्पक्ष और सिद्धांत-आधारित बनी रहे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और संकट के समय भारत की संतुलित विदेश नीति ही उनके हितों की रक्षा कर पाई है।
अंत में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत की पारंपरिक गुटनिरपेक्ष और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति कमजोर पड़ रही है। उनके अनुसार यदि शक्तिशाली देशों की एकतरफा कार्रवाई पर भारत मौन रहता है, तो इसे उसके मूल सिद्धांतों से विचलन के रूप में देखा जा सकता है। संसद में इस मुद्दे पर खुली चर्चा की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से भी जुड़ा मामला है।
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