संपादक और पत्रकार से कहीं ज्यादा, मुह बोले बड़े भाई सौरभ द्विवेदी का योगदान।
प्रशांत सिंह
कई दिन गुज़र गए हैं पाँच जनवरी को गुजरे, पर अभी तक ये बात समझ नही आ रही है कि मैं ये कैसे दर्ज करूँ कि मेरे हिस्से ये नई चुनौती रख के आगे बढ़ गए हो। ये निजी कहानी का हिस्सा है कि एक इंसान जीवन में रोशनी लिए साथ साथ चल रहा है। हर रोज़ एक नया मुकाम हासिल करता है और छोड़ जाता है मेरे लिए एक नई दुनिया कि यहाँ भी पहुँचा जा सकता है। बचपन तो यही समझते हुए गुज़रा था कि दुनिया में जो सबसे शानदार पद और उपलब्धियाँ है उसे पाने वाले मेरे जैसे नहीं होते। मुख्य धारा की जरूरतें और अपने कौशल की विपन्नता जब सामने से रोज़ ये समझा जाती थी कि रुक जाओ नहीं बने हो आजाद होने के लिए, आजाद होना, खुल के जिंदगी जीना सब के हिस्से नही आता, तब तुम मिले थे।तुम ही हो जिसने हिम्मत दी कि साइंस की फील्ड छोड़ी जा सकती है।
मैं शायद उतना सक्षम व्यक्ति नही हूँ जितने तुम थे, मैं JNU नहीं जा सका। इस बात का संतोष है कि लड़ना सीखा था तो BHU पहुँचा। ये बात अब समझने जैसी नहीं है पर उस वक्त तुम एक ढाल के जैसे थे जब सब गड़बड़ था। रोज़ बैठ के यही हिसाब लगाता था कि इनकी भी इंग्लिश अच्छी नही है, इन्होंने ने भी कोई आईआईटी नही निकाला है, इनकी भी पृष्ठभूमि मेरे जैसी ही है, इनकी गर्लफ्रेंड भी IIMC से हैं, तो मेरा भी रास्ता JNU से होते हुए IIMC ही जाएगा।
उस्ताद, तुम्हारी वजह से जिंदगी में जादू हुआ है, मैंने बहुत ख़ुशी महसूस की है, तितलियों कि तरह महसूस किया है, ख़ुशबू कि तरह महसूस किया है, हवा की तरह महसूस किया है, इसलिए हक़ है तुमको ये जानने का कि तुम्हारे काम कि वजह से एक ज़िन्दगी कई बार आबाद हुई है।
सौरभ इस फ्रेम में ‘तो तुम लेखक बनना चाहते हो’ (रूस के चार्ल्स बुकोस्की कि कविता वरुण ग्रोवर द्वारा हिंदी में अनुदित ) सुना रहे है। ये आँखे देखिए, लगता है स्वामी विवेकानंद होते तो मोहित हो जाते इतनी चमक देख के, आजादी चाहने वालों को बगावत इन आँखो से उधार ले लेनी चाहिए।
सौरभ का उपदेश- ज़मीन पर बरगद बहुत जरूरी है, उसकी छाँव बहुत जरूरी है बस आपको ये याद रखना है कि बरगद के नीचे कुछ नहीं पनफ़ता तो आपको बुजुर्गों से, इर्द गिर्द के लोगो से संवाद खूब करना है सम्मान के साथ करना है उन्होंने आपसे ज़्यादा दुनिया देखी है लेकिन उनकी सलाहों का दबाव महसूस नहीं करना है।
ये बात कहने के लिए समझ और जीने के लिए कलेजा चाहिए। पत्रकारिता के गुण और उससे जुड़े हुए कीर्तिमान तो दर्ज करने कि सीमा में नहीं आते। एक व्यक्ति कैसे पूरा संस्थान अपने कंधे पे ले के चलता है इसके सबके उत्कृष्ट उदाहरणों में सौरभ का नाम आना तय है।
किताबों से थोड़ा बहुत याराना तो बचपन में भी था पर सच में सौरभ ने किताबें बरतना सिखाया। किताबवाला सिर्फ़ एक प्रोग्राम भर नहीं बल्कि पूरा सचित्र उदाहरण है कि बिना किसी झिझक के अपने विचारों को लेखक से साझा किया जा सकता है और अपने दर्शकों का ध्यान रखते हुए किसी सामान्य सी बात को भी सामने वाले गेस्ट को रोकते हुए समझाया जाना, ताकि आप जो किसी सामाजिक आर्थिक या पारंपरिक रूढ़ि कि वजह से उस सामान्य सी दिखने वाली जानकारी से अनभिज्ञ हैं आपको अपने हिस्से का ज्ञान और न्याय दोनों मिलता चले।
सौरभ का उपदेश – पढ़ना बड़ा अकेले का काम है और लिखना भी, वहाँ कोई फ़िल्टर काम नहीं आता। पढ़ रहे हो सन्नाटा है और पढ़ते पढ़ते तुम जो हो उन पन्नो में दिखने लगते हो, तुम्हें अपने भीतर की सारी कमज़ोरियां क्रूरताएँ और कमीनापन दिखने लगता है – पढ़ना शुरू कर दो, पढ़ोगे तो अपने भीतर के सन्नाटे से दो चार होगे, पढ़ोगे तो समझ आयेगा कि दुनिया किसी IT सेल का चलाया हुआ ट्विटर ट्रेंड भर नही है फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी भर नही है, एक वीडियो भर नहीं है। पढ़ोगे तो अपने डर से दो चार होगे तो फिर डर कम लगने लगेगा, डर कम लगेगा तो किसी बूढ़े बुजुर्ग या बच्चे का मजाक नहीं उड़ाओगे, माफ करना सीख जाओगे दूसरों को भी और ख़ुद को भी।
उस्ताद, मेरी तमन्ना है कि एक दिन मेरी लाइब्रेरी (मेरे जीवन काल में मेरी सुविधा के लिए, सदा पढ़ने वालों के लिए ) हो जहाँ मैं आपको बुला सकूँ, और किताबों पर बात करने लायक रहूँ।
तुम्हारी उपलब्धियों में ये भी दर्ज करना जरूरी हैं कि स्पष्ट रूप से तुमसे ही देखा और सीखा कि किसी भी व्यक्ति को जो सवाल पूछने के लिए उठे उसे इतना कॉन्फ़िडेंस देना कि तुमको कोई जबान नहीं आती तो तुम्हारा प्रश्न निराधार नही हो जाता। किसी नेता के सामने उसे बिना पराजित किए या इस मनसा का प्रदर्शन किए उनसे उनके उत्तरदायित्व का प्रश्न पूछना। किसी छोटी सी बातचीत में भी जेंडर, सोशल सेंसिटिव मुद्दे का ध्यान रखना, मजाक में भी किसी ऐसे मजाक को जगह ना देना जो सिर्फ पारंपरिक रूप से मजाक की श्रेणी में आते हैं और आधी आबादी को कहीं का नही छोड़ते।
अपनी बनाई पहचान और चयन को लेकर दृढ़ इस व्यक्ति ने कितने ही ट्रेंड सेट किए हैं। ‘मुझे नहीं पता’ जैसे घोर असुरक्षित वाक्य को इतनी आसानी से स्वीकार्य बनाया कि अब डर नही लगता कहने में कि नही जानता। मैं याद रखूँगा की अपनी पहचान को गमछे की तरह और अपने संस्थान को JNU की तरह कैसे ओढ़ के चलना है।
मेरे लिए लल्लनटॉप के संपादक सौरभ ,एक शानदार पत्रकार सौरभ, लोकल खाने, मिठाई ,चाय को फेमस करने वाले सौरभ से ज़्यादा प्यारा है ‘प्रेम’ का वकील सौरभ। सौरभ ने हर मंच से प्रेम को प्रेम की ही तरह रखा है। किसी सांसारिक, नैतिक या पारम्परिक परिभाषा को कभी भी प्रेम के रास्ते में रोड़ा नहीं बताया। सार्वजनिक मंचों से जोर से ठहराव के साथ कहना ‘प्रेम करिए’, ‘राम करें तुमको प्रेम हो जाय’ एहसान है हमारी पीढ़ी पर ।
सीखने लायक़ है अपनी प्रेमिका और पत्नी की व्याख्या, सात्विक ईर्ष्या के साथ कहता हूँ कि जीवन में एक दिन आए जब मैं भी कह सकूँ कि जीवन में उसके साथ रहना चाहिए जिसके साथ सो के उठने पे आपके चेहरे पे मुस्कान आए, मैं भी इतनी सुरक्षा में रहूँ कि कह सकूँ – मेरी दोस्त जो मेरी पत्नी भी हैं, ने मुझे आज टोका और कहा की सारे दावे सही नहीं थे, आज तुमने फिर से प्रीपोज़िशन में गड़बड़ की थी।
बीच इंटरव्यू में माँ का नाम पूछना और फिर नाम से ही संबोधित करना, पिता को उनकी सारी कठोरताओं में छिपे डर और प्रेम को कृतज्ञता के साथ स्थान देते देखना आज भी मुझे जीवन बरतने की तमीज़ सिखा रहा है।
शिव को पार्वती के साथ याद करना, कृष्ण को लीलाओं के साथ याद करना, हमेशा अपने सामने बैठे व्यक्ति को इतना स्पेस देना कि वो अपने बहुत पर्सनल इंसिडेंट को भी भीगी आँखों के साथ बता दे, पत्रकारिता की जिम्मेदारियों से आगे की चीज है। फ़ेहरिस्त लंबी है पर गीत चतुर्वेदी कि किताब का परिचय देते हुए उनकी कविता ‘प्रेम में डूबी हुई स्त्री का चेहरा बुद्ध जैसा दिखता है’ को अपनी आत्मीयता से मेरी स्मृति में अमर करने वाले का एक आखिरी उपदेश और दर्ज कर रहा हूँ।
सौरभ का उपदेश – यदि प्रेम तुम्हें जरूरी किस्म का बाग़ी नहीं बनाता है तो मुझे उसके होने पे संशय है। अगर प्रेम, तुम्हें अपने वैल्यूज़ को बेटर करना नही सिखाता, तुम्हें जो जैसा मिला उससे आगे तुम इस सभ्यता को नहीं ले जा रहे हो तो कुछ गड़बड़ है। माता पिता से प्रेम करो, अकुंठ प्रेम करो, उनकी जिम्मेदारियाँ निभाने का मौका मिले तो उत्साह के साथ निभाओ लेकिन माता हों, पिता हों, गुरु हों, मित्र हों, साथी हों, उनकी बात ज्यों का त्यों नहीं मान लो। संशय रखो, गलत को गलत कहने की हिम्मत रखो, और यदि खुद कभी गलत हो जाओ तो सत्य के स्वीकार्य की सार्वजनिक हिम्मत रखो,YES I WAS WRONG, I ACCEPT IT ……l
मैं अपने हिस्से का संकल्प (सत्य के लिए किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं- हजारी प्रसाद द्विवेदी) तुम्हारे नाम करता हूँ उस्ताद।
यूँ ही आबाद रहे दुनियाँ, तुम न रहो तो , कोई तुम सा रहे।
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