जब डॉलर के मुक़ाबले रुपया 60 पर था तब हाय-हाय, अब 94 के करीब तो भाड़ में जाए!
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरावट एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है। हालिया समय में रुपया 94 के करीब पहुंच गया है, जबकि सोमवार को यह लगभग 93.95 के आसपास बना रहा। यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, वैश्विक परिस्थितियों और राजनीतिक विमर्श के बदलते स्वरूप को भी दर्शाती है।
दिलचस्प बात यह है कि जब 2013 में रुपया 60 के स्तर को पार कर गया था, तब इसे आर्थिक संकट का प्रतीक बताया जा रहा था, जबकि आज कहीं अधिक गिरावट के बावजूद राजनीतिक मौन से दिल में एक टीस सी भारती महसूस होती है.
2013 के दौर में, जब देश में यूपीए सरकार थी, रुपये के 60 पार जाने को लेकर व्यापक राजनीतिक और मीडिया बहस देखने को मिली थी। उस समय विपक्ष के नेताओं ने इसे सरकार की नीतिगत विफलता बताया था। नरेंद्र मोदी, जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने रुपये की गिरावट को लेकर तीखे बयान दिए थे। उन्होंने इसे “आईसीयू में पड़ा रुपया” और “टर्मिनल स्टेज” तक बताया था।
निर्मला सीतारमण ने भी उस समय प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि रुपये की गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोर स्थिति को दर्शाती है। योग गुरु बाबा रामदेव और अन्य सार्वजनिक हस्तियों ने भी इसे लेकर सरकार की आलोचना की थी। मीडिया में भी इसे प्रमुखता से उठाया गया, जहां रुपये की गिरावट को देश की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा गया।
आज की स्थिति कुछ अलग नजर आती है। रुपया 94 के स्तर तक कमजोर होने के बावजूद सरकार और उसके समर्थक इसे वैश्विक कारणों से जोड़कर देख रहे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहले भी यह कहा था कि “रुपया कमजोर नहीं हो रहा, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है।
सरकार का तर्क है कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक रुपये को प्रभावित कर रहे हैं। खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता पैदा की है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की गिरावट के पीछे कई ठोस कारण हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, और जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है।
इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी से निवेशकों का रुझान अमेरिका की ओर बढ़ता है, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी का बहिर्गमन होता है। भारत में भी विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव और व्यापार घाटा रुपये की कमजोरी को बढ़ाते हैं। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर रखने की कोशिश करता है।
राजनीतिक दृष्टि से यह मुद्दा दोहरे मापदंडों की बहस को जन्म देता है। विपक्ष का आरोप है कि जो नेता पहले रुपये की मामूली गिरावट पर सरकार को घेरते थे, वे अब बड़े स्तर की गिरावट पर चुप हैं या उसे सामान्य ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, सरकार और उसके समर्थकों का कहना है कि 2013 और वर्तमान परिस्थितियों में बड़ा अंतर है।
उनका तर्क है कि उस समय भारत की अर्थव्यवस्था कई आंतरिक समस्याओं से जूझ रही थी, जबकि आज की गिरावट मुख्यतः वैश्विक कारणों से प्रेरित है और भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है।
इस पूरे मुद्दे का एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। 2013 में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म आज की तुलना में सीमित थे, जबकि आज सूचना का प्रवाह अधिक नियंत्रित और विविध है। इसके चलते जन प्रतिक्रिया और विमर्श का स्वरूप भी बदल गया है।
हालांकि, यह भी सच है कि रुपये की गिरावट का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है महंगाई बढ़ती है, आयातित वस्तुएं महंगी होती हैं और विदेश में पढ़ाई या यात्रा करने वालों की लागत बढ़ जाती है।
रुपये का 60 से 94 तक पहुंचना केवल आर्थिक घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का भी हिस्सा है। जहां एक ओर वैश्विक कारणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, वहीं यह भी जरूरी है कि आर्थिक नीतियों और उनके प्रभावों पर समान मानकों से चर्चा हो।
रुपये की स्थिरता केवल सरकार या विपक्ष की बहस का विषय नहीं, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती और आम नागरिक के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
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