इस वजह से नहीं हरा सकता…. अमेरिका ईरान को….!

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ईरान की मजबूती का कारण सिर्फ सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि ऊर्जा नियंत्रण, असममित युद्ध रणनीति, मजबूत शासन ढांचा और समाज की उच्च सहनशीलता है, जो उसे टिकाए हुए है।

ईरान-इज़रायल और अमेरिका के साथ जारी टकराव अब चौथे हफ्ते में पहुंच चुका है, लेकिन तमाम आशंकाओं के विपरीत ईरान अब तक न तो पराजित हुआ है और न ही आत्मसमर्पण के संकेत दे रहा है।

शुरुआती दौर में यह माना जा रहा था कि उन्नत सैन्य तकनीक और हवाई ताकत के दम पर अमेरिका और इसरायल जल्दी बढ़त बना लेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कहीं अधिक जटिल साबित हो रही है। ईरान ने भले निर्णायक जीत हासिल नहीं की हो,

लेकिन उसकी प्रतिरोध क्षमता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संघर्ष छोटा या एकतरफा नहीं रहने वाला। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की मजबूती के पीछे केवल हथियार नहीं, बल्कि आर्थिक, रणनीतिक और सामाजिक कारकों का गहरा योगदान है।

सबसे बड़ा कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में ईरान की स्थिति है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसकी पकड़ उसे असाधारण रणनीतिक ताकत देती है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस का व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। भारत जैसे देशों के लिए तो यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है, जहां बड़ी मात्रा में एलएनजी और एलपीजी आयात इसी रास्ते से होता है।

ऐसे में यदि संघर्ष बढ़ता है और इस मार्ग पर खतरा मंडराता है, तो तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासकर पश्चिमी देशों की घरेलू राजनीति पर पड़ता है। यही वजह है कि अमेरिका जैसे देश भी इस संघर्ष को अनियंत्रित रूप से बढ़ने देने से बचना चाहते हैं।

दूसरा बड़ा कारण आधुनिक युद्ध में ड्रोन तकनीक की भूमिका है, जिसने ताकत के पारंपरिक समीकरण को बदल दिया है। अपेक्षाकृत सस्ते और आसानी से बनाए जा सकने वाले ड्रोन, महंगी मिसाइल प्रणालियों को चुनौती दे रहे हैं। ईरान ने इसी रणनीति का उपयोग करते हुए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा है।

“कमजोरों के हथियार” कहे जाने वाले ये ड्रोन बड़े सैन्य ढांचे के सामने एक असममित चुनौती पेश करते हैं। कम लागत में बड़े नुकसान की क्षमता रखने वाले इन हथियारों ने यह साबित किया है कि युद्ध केवल संसाधनों की मात्रा से नहीं, बल्कि रणनीति और तकनीकी अनुकूलन से भी जीता या रोका जा सकता है।

तीसरा महत्वपूर्ण पहलू ईरान की आंतरिक राजनीतिक-संगठनात्मक संरचना है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बना तंत्र केवल शासन नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों पर भी मजबूत पकड़ बनाए हुए है। Islamic Revolutionary Guard Corps जैसे संस्थान सीधे सर्वोच्च नेतृत्व के प्रति जवाबदेह हैं और देशभर में फैले हुए हैं।

इनके साथ ही अर्धसैनिक बल और वैचारिक नेटवर्क यह सुनिश्चित करते हैं कि नेतृत्व में बदलाव या बाहरी हमलों के बावजूद व्यवस्था बनी रहे। इस तरह की संरचना किसी भी बाहरी दबाव के बावजूद शासन के टूटने की संभावना को काफी कम कर देती है, जिससे “रजीम चेंज” जैसे प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं।

चौथा और शायद सबसे गहरा कारण ईरान की सांस्कृतिक-धार्मिक पृष्ठभूमि है, विशेषकर शिया परंपरा में निहित शहादत की भावना। कर्बला की ऐतिहासिक घटना और उससे जुड़ी स्मृतियां आज भी समाज में गहराई से मौजूद हैं, जो संघर्ष और बलिदान को एक नैतिक शक्ति के रूप में स्थापित करती हैं। यह मानसिकता कठिन परिस्थितियों में भी लंबे समय तक संघर्ष करने की क्षमता देती है।

ऐसे में केवल सैन्य हमलों या नेतृत्व को निशाना बनाने से निर्णायक परिणाम हासिल करना मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर, ईरान की यह बहुआयामी ताकत ऊर्जा नियंत्रण, नई युद्ध तकनीक, मजबूत आंतरिक ढांचा और सांस्कृतिक धैर्य उसे अब तक इस संघर्ष में टिके रहने की क्षमता प्रदान कर रही है, और यही कारण है कि यह युद्ध अपेक्षा से अधिक लंबा और जटिल होता जा रहा है

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