विश्वगुरु का भ्रम, ‘मेरा बनाम तुम्हारा’ दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बिगाड़ रहा है!
भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर देश के भीतर एक दिलचस्प लेकिन भ्रामक बहस चल रही है। एक पक्ष मानता है कि आज का भारत अपनी क्षमता से कहीं अधिक प्रभावशाली तरीके से दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
वहीं दूसरा पक्ष यह तर्क देता है कि वर्तमान नेतृत्व ने भारत की पारंपरिक ताकत, उसकी नैतिक प्रतिष्ठा और रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर कर दिया है, जिसके कारण देश अपनी वास्तविक क्षमता से कमतर प्रदर्शन कर रहा है।
लेकिन इन दोनों धारणाओं में एक समानता है दोनों ही वास्तविकता से दूर हैं। सच्चाई यह है कि भारत हमेशा अपनी क्षमता के अनुरूप ही व्यवहार करता आया है, न उससे बहुत ऊपर, न बहुत नीचे।
मध्य पूर्व की मौजूदा जटिल परिस्थितियों को देखें तो भारत की विदेश नीति की कठिनाइयाँ साफ दिखाई देती हैं। इस क्षेत्र में भारत के संबंध कई परस्पर विरोधी देशों के साथ हैं अरब राष्ट्र, इज़राइल और ईरान।
ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना भारत के लिए आसान नहीं है। उसकी ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है, वहीं लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। दूसरी ओर, इज़राइल के साथ भारत के रक्षा और तकनीकी संबंध मजबूत हैं, जबकि ईरान के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक संपर्क बना हुआ है।
पिछले कुछ समय में वैश्विक घटनाओं ने भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक दृष्टिकोण को और व्यावहारिक बनाने के लिए प्रेरित किया है। एक समय था जब भारत मुक्त व्यापार समझौतों से दूरी बनाकर चलता था, लेकिन अब वह इन्हें अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने और आर्थिक सुधारों पर जोर देने की प्रवृत्ति भी इसी बदलाव का हिस्सा है। हालांकि, यह कहना कि इन परिवर्तनों के पीछे केवल बाहरी दबाव या किसी एक देश की भूमिका है, वास्तविकता को सरल बना देना होगा।
यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत को उन देशों के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए, जो युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं। युद्ध किसी के लिए लाभकारी नहीं होता, खासकर तब जब उसका असर भारत के आसपास के क्षेत्र पर पड़े।
खाड़ी देशों में लाखों भारतीयों की उपस्थिति, वहाँ किए गए निवेश और दशकों से बने संबंध इस बात को और गंभीर बना देते हैं। ऐसे में युद्ध को अवसर के रूप में देखने के बजाय एक चुनौती के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
देश के भीतर इस विषय पर राजनीतिक मतभेद भी स्पष्ट हैं। सरकार के समर्थक मानते हैं कि भारत ने इस संकट में असाधारण कूटनीतिक संतुलन दिखाया है। उनका कहना है कि भारत ने अरब देशों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं, ईरान के साथ संवाद बनाए रखा है और अमेरिका व इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी को भी जारी रखा है।
यह दृष्टिकोण भारत को एक उभरती हुई शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जो जटिल वैश्विक परिस्थितियों में भी अपने हितों की रक्षा कर रही है।
इसके विपरीत आलोचकों का मत है कि भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता खो दी है। उनका आरोप है कि भारत ने ईरान पर हमलों की खुलकर आलोचना नहीं की और वह अमेरिका तथा इज़राइल के प्रभाव में आ गया है।
कुछ आलोचक इसे घरेलू राजनीति से भी जोड़ते हैं, लेकिन यह दृष्टिकोण पूरी तरह संतुलित नहीं माना जा सकता। कारण यह है कि कई मुस्लिम देश स्वयं ईरान के विरोध में खड़े हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संघर्ष केवल धार्मिक आधार पर नहीं देखा जा सकता।
अगर इस पूरी बहस को सरल शब्दों में समझा जाए तो दो अतिवादी धारणाएँ सामने आती हैं पहली, कि भारत अपनी क्षमता से कहीं अधिक प्रभावशाली हो गया है; दूसरी, कि वह अपनी ताकत से बहुत नीचे गिर गया है। लेकिन इतिहास बताता है कि भारत हमेशा अपनी वास्तविक क्षमता के अनुरूप ही आगे बढ़ता रहा है।
स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में भी भारत ने खुद को एक नैतिक और वैचारिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। उस समय आर्थिक स्थिति कमजोर थी, सैन्य क्षमता सीमित थी और देश कई मामलों में बाहरी सहायता पर निर्भर था। इसके बावजूद भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी आवाज उठाई, लेकिन जब जरूरत पड़ी, तो उसने अपनी सीमाओं को भी समझा। सोवियत संघ के साथ उसके संबंधों ने उसे कुछ मुद्दों पर चुप रहने के लिए भी मजबूर किया।
आज की स्थिति अलग जरूर है, लेकिन पूरी तरह बदली नहीं है। भारत अब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय अभी भी कम है। इसके बावजूद उसने अमेरिका, रूस, यूरोप, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। यह संतुलन उसकी कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है, लेकिन साथ ही उसकी सीमाओं को भी उजागर करता है।
भारत की विदेश नीति पर उसकी विभिन्न निर्भरताओं का गहरा प्रभाव है। रक्षा उपकरणों के लिए वह अमेरिका, रूस, इज़राइल और फ्रांस पर निर्भर है। ऊर्जा के लिए उसे रूस और खाड़ी देशों की जरूरत है।
तकनीकी और औद्योगिक आपूर्ति के लिए चीन के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इन सभी कारकों के चलते भारत किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर पूरी तरह स्वतंत्र रुख अपनाने में सक्षम नहीं होता।
यही कारण है कि भारत कई बार वैश्विक विवादों पर संतुलित और सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया देता है। चाहे वह यूक्रेन युद्ध हो, मध्य पूर्व का संकट हो या चीन के साथ सीमा विवाद—भारत हर मामले में अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है और उसी के अनुसार निर्णय लेता है।
अंततः यह समझना जरूरी है कि किसी भी देश की शक्ति केवल उसके दावों या उसकी छवि से नहीं तय होती, बल्कि उसकी वास्तविक आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक क्षमता से निर्धारित होती है। भारत भी इसी सिद्धांत के तहत काम करता है।
इसलिए यह कहना कि भारत अपनी क्षमता से बहुत ऊपर उठ गया है या बहुत नीचे गिर गया है, दोनों ही गलत हैं। वास्तविकता यह है कि भारत अपने हितों, संसाधनों और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार संतुलित तरीके से आगे बढ़ रहा है।
यदि वर्तमान वैश्विक संकट भारत को रक्षा उत्पादन बढ़ाने, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने और आर्थिक सुधारों को गति देने के लिए प्रेरित करता है, तो यह देश के लिए एक सकारात्मक अवसर साबित हो सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो चुनौतियाँ ही भविष्य की संभावनाओं का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।
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