राजनीति की अधूरी कहानी
भोपाल। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सांस्कृतिक सलाहकार श्रीराम तिवारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं।कांग्रेस का दावा है कि उज्जैन में स्थित एक महत्वपूर्ण सरकारी परिसर को “वीर भारत न्यास” के पक्ष में मात्र ₹1 की टोकन लीज पर देकर सरकारी संपत्ति का अनुचित लाभ पहुंचाया गया।दूसरी ओर, राज्य सरकार और भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक बताते हुए खारिज कर रही है। सरकार का तर्क है कि ट्रस्ट सरकारी है, इसलिए इसे लीज पर जमीन दी गई।
सबसे पहले जानते हैं वीर भारत न्यास है क्या?
वीर भारत न्यास की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक यह ट्रस्ट मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग का एक प्रमुख सांस्कृतिक और बौद्धिक अधिष्ठान है। यह मुख्य रूप से भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने और युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए कार्य करता है। इसके न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी हैं जो कि मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार भी हैं। यानी, यदि किसी निजी कंपनी या निजी व्यक्ति को सरकारी भूमि रियायती दर पर दी जाती है, तो मामला अलग होगा।
लेकिन यदि लाभार्थी एक सार्वजनिक उद्देश्य वाला ट्रस्ट हो, जो सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधियों के लिए कार्य कर रहा हो, तो उसका प्रशासनिक मूल्यांकन अलग तरीके से किया जाता है।सरकार का तर्क यही है कि क्योंकि वीर भारत न्यास का उद्देश्य सिंहस्थ, भारतीय संस्कृति, विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है।
लिहाजा सरकारी ट्रस्ट को सरकारी जमीन देने में कांग्रेस को क्या आपत्ति है?कांग्रेस के इन गंभीर आरोपों पर मध्य प्रदेश के एमएसएमई मंत्री चेतन्य कश्यप ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वीर भारत न्यास कोई निजी ट्रस्ट नहीं बल्कि पूरी तरह से एक सरकारी ट्रस्ट है।इसी तरह उज्जैन का कोठी पैलेस, विक्रम कीर्ति मंदिर एवं महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ भवन शासकीय संपत्तियां हैं, जिन्हें विधिवत रूप से संस्कृति विभाग को हस्तांतरित किया गया है।
वीर भारत न्यास और महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ भी शासकीय संस्थाएं हैं। लिहाजा संस्कृति विभाग को ही ट्रांसफर की गई हैं। क्योंकि श्रीराम तिवारी वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव हैं इसलिए एक रुपये के टोकन अमाउंट पर लीज पर भूमि दी गई। सरकारी ट्रस्ट को सरकारी जमीन देना घोटाला कैसे हो सकता है?यह तर्क तब बनता जब कोई निजी व्यक्ति या व्यावसायिक संस्था लाभार्थी होती। यहाँ तो जमीन सरकार की, ट्रस्ट भी सरकार का।अब मूल प्रश्न पर वापस आते हैं.. एक रुपये में 500 करोड़ की जमीन का सवाल, तो यह भारत में सांस्कृतिक, धार्मिक और जनहित संस्थाओं को दी जाने वाली एक सामान्य और स्थापित प्रशासनिक परंपरा है। देशभर में अनेक सरकारी ट्रस्ट, सांस्कृतिक संस्थाएँ, धार्मिक न्यास और एनजीओ इसी टोकन राशि पर सरकारी परिसर उपयोग करते हैं।कांग्रेस शासनकाल में भी यही हुआ — तब इसे ‘सांस्कृतिक सहयोग’ कहा जाता था। आज वही ‘₹1 में लूट’ कहा जा रहा है!?
श्रीराम तिवारी कौन हैं?
मध्यप्रदेश सरकार में संस्कृति विभाग के निदेशक, स्वराज संस्थान निदेशालय के निदेशक, वन्या के प्रबंध निदेशक, उद्यम विकास संस्थान के चेयरमैन-कम-एमडी जैसे अनेक महत्वपूर्ण पदों पर दशकों तक कार्य किया है। इसके अलावा उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार में भी संस्कृति, पुरातत्व और पर्यटन सलाहकार के रूप में काम किया।
उन्होंने साहित्य, कला, सिनेमा, भारतीय इंडोलॉजी और स्वराज पर 100 से अधिक पुस्तकों का संपादन और प्रकाशन किया है। वे कलाकारों और युवा प्रतिभाओं के मार्गदर्शक रहे हैं।उनका पद कोई राजनीतिक ‘रिवॉर्ड पोस्टिंग’ नहीं बल्कि दशकों की सांस्कृतिक साधना का सम्मान है।
श्रीराम तिवारी महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के संस्थापक निदेशक हैं। यह शोधपीठ 2010 में स्थापित हुई और विक्रम संवत, प्राचीन भारतीय कालगणना, संस्कृति और खगोलशास्त्र पर गंभीर शोध को समर्पित है।इस संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि विक्रमादित्य वैदिक घड़ी परियोजना है, जो प्राचीन भारतीय कालगणना पद्धति को आधुनिक डिजिटल प्रारूप में प्रस्तुत करती है और हजारों साल पीछे तथा 2,000 साल आगे तक समय की गणना कर सकती है।
वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पिछले दिनों वैदिक घड़ी का उद्घाटन किया था
।मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार के तौर पर श्रीराम तिवारी की नियुक्ति नियमों के तहत हुई।
मध्यप्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश द्वारा श्रीराम तिवारी को मुख्यमंत्री का सांस्कृतिक सलाहकार नियुक्त किया गया — और यह उनके पहले से जारी कार्यों के साथ अतिरिक्त प्रभार के रूप में था।यानी कोई नया पद नहीं बनाया, कोई नया भत्ता नहीं जोड़ा — बस एक अनुभवी सांस्कृतिक व्यक्तित्व को उनकी विशेषज्ञता के लिए एक जिम्मेदारी दी गई।कुल मिलाकर जीतू पटवारी के श्रीराम तिवारी पर लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से कमजोर हैं क्योंकि वे एक सरकारी ट्रस्ट का हिस्सा हैं, उनकी नियुक्ति पारदर्शी है, और टोकन लीज कोई नई बात नहीं।