कर्ज के सहारे विकास या बढ़ता बोझ? मध्यप्रदेश सरकार फिर ले रही 4100 करोड़ का ऋण
भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार एक बार फिर कर्ज लेने जा रही है। वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए राज्य सरकार 4100 करोड़ रुपये का नया ऋण उठाने की तैयारी में है। यह कर्ज दो अलग-अलग हिस्सों में लिया जाएगा, जिसमें 2100 करोड़ और 2000 करोड़ रुपये शामिल हैं। इस ऋण की ब्याज राशि क्रमशः 9 साल और 15 साल की अवधि में चुकानी होगी। खास बात यह है कि मार्च महीने में यह तीसरी बार है जब सरकार बाजार से उधारी ले रही है।
वित्त विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह राशि सरकार को बुधवार को प्राप्त होगी। इससे पहले भी मार्च माह में सरकार दो बार बड़े स्तर पर कर्ज ले चुकी है। 3 मार्च को राज्य ने चार अलग-अलग माध्यमों से कुल 6300 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। इसके बाद 10 मार्च को 5800 करोड़ रुपये का कर्ज उठाया गया, जिसमें अलग-अलग अवधि—10 साल, 14 साल और 21 साल—के लिए ऋण शामिल था। अब तीसरी बार 4100 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेकर सरकार अपने वित्तीय प्रबंधन को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।
इस लगातार बढ़ते कर्ज के चलते प्रदेश पर कुल देनदारी अब करीब 5 लाख 8 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। चालू वित्तीय वर्ष में ही सरकार लगभग 89 हजार करोड़ रुपये का कर्ज ले चुकी है, जिसमें से केवल मार्च महीने में ही 16,200 करोड़ रुपये का कर्ज शामिल है। यह आंकड़े राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर रहे हैं।
सरकार का तर्क है कि यह कर्ज विकास कार्यों, अधोसंरचना निर्माण, सामाजिक योजनाओं और राजकोषीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों के लिए कर्ज लेना असामान्य नहीं है, लेकिन इसकी सीमा और उपयोगिता महत्वपूर्ण होती है। यदि कर्ज का उपयोग उत्पादक क्षेत्रों में किया जाए तो यह आर्थिक विकास को गति दे सकता है, लेकिन यदि इसका बोझ लगातार बढ़ता रहा तो भविष्य में वित्तीय दबाव भी बढ़ सकता है।
वहीं, विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साध रहा है। विपक्ष का कहना है कि सरकार कर्ज लेकर केवल खर्च बढ़ा रही है, जबकि आय बढ़ाने के स्थायी उपायों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनका आरोप है कि बढ़ते कर्ज का सीधा असर आने वाले समय में आम जनता पर पड़ सकता है, क्योंकि ब्याज भुगतान के लिए सरकार को राजस्व बढ़ाने या खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है।
आर्थिक जानकारों का यह भी कहना है कि कर्ज का स्तर तभी चिंताजनक होता है जब राज्य की आय और विकास दर उसके अनुरूप न बढ़े। यदि राज्य की जीडीपी, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तो कर्ज का बोझ नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि राजस्व वृद्धि धीमी रहती है, तो यह स्थिति लंबे समय में वित्तीय असंतुलन पैदा कर सकती है।
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश सरकार का यह नया कर्ज एक तरफ विकास योजनाओं को गति देने का प्रयास है, तो दूसरी ओर बढ़ते ऋण का दबाव भी साफ नजर आता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस कर्ज का उपयोग किस तरह करती है और क्या यह राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में मददगार साबित होता है या नहीं।
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