सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार, कहा- लाठी चार्ज के वीडियो देखने का समय नहीं है!
सुप्रीम कोर्ट ने “कॉकरोच जनता पार्टी” के समर्थकों पर कथित लाठीचार्ज के मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। बुधवार को एक वकील ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख करते हुए प्रदर्शनकारियों के साथ कथित मारपीट के वीडियो देखने का अनुरोध किया।
इस पर अदालत ने कहा कि उनके पास वीडियो देखने का समय नहीं है और मामले को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया। दोबारा आग्रह किए जाने पर पीठ ने टिप्पणी की कि अदालत और न्यायालय का समय व्यर्थ न किया जाए।
यह मामला उस विवाद के बाद सामने आया है, जब कुछ महीने पहले मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी चर्चा का विषय बनी थी। उसी के बाद अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से अभियान शुरू किया, जो बाद में एक बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया।
20 जुलाई को संगठन ने संसद मार्च का आह्वान किया था। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी दिल्ली पहुंचे, जहां पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। इस दौरान कथित लाठीचार्ज और झड़प की घटनाएं सामने आईं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इस घटना में 100 से अधिक लोग, जिनमें पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी दोनों शामिल हैं, घायल हुए। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।
इसी बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े कथित मारपीट के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें जांच और न्यायिक प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जा सके।
उधर, गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह को पत्र लिखकर आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने की अपील की है। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि सरकार भरोसा देती है, तो वे अपना अनशन समाप्त करने पर विचार कर सकते हैं।
वहीं आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि वे सरकार के बुलावे पर किसी मंत्री या अधिकारी के आवास पर बातचीत के लिए नहीं जाएंगे। उनका कहना है कि यदि सरकार बातचीत चाहती है, तो उसे जंतर-मंतर आकर प्रदर्शनकारियों से संवाद करना चाहिए।
फिलहाल आंदोलन लगातार जारी है। दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और एहतियात के तौर पर कई मेट्रो स्टेशनों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। ऐसे में यह मामला अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार-प्रदर्शनकारी संवाद को लेकर भी नई बहस का विषय बन गया है।
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