यह वाकई चौंकाने वाली बात है कि खुद को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहने वाले नरेंद्र मोदी ने मणिकर्णिका घाट के आसपास सैकड़ों उन मंदिरों को तोड़ने का आदेश दे दिया, जो हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित थे. मणिकर्णिका घाट वाराणसी में पौराणिक रूप से बेहद अहम स्थान है.
यह सब वाराणसी कॉरिडोर बनाने के लिए किया गया, जिसका मकसद कथित तौर पर उनके पूंजीपति समर्थकों और दोस्तों के बिजनेस हितों को फायदा पहुंचाना है. इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि हिंदू धर्म के तथाकथित ठेकेदार, और खासकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, जिन्होंने मोदी को तैयार किया, इस पर चुप्पी साधे बैठे हैं.
कोई भी सच्चा हिंदू इन घिनौनी हरकतों पर शर्म से अपना सिर झुका लेगा, क्योंकि ये हरकतें हिंदू मोक्ष के दुनिया के सबसे पवित्र स्थलों में से एक को मिटाने का खतरा पैदा कर रही हैं. बनारस के पवित्र परिदृश्य को नष्ट करने के पीछे दो मुख्य वजहें बताई जा रही हैं.
पहली, यह शहर पारंपरिक हिंदू धर्म का प्रतीक है—एक ऐसी चीज जिससे आरएसएस और बीजेपी नेतृत्व असहज महसूस करता है, क्योंकि यह उनके ‘हिंदुत्व’ के राजनीतिक प्रोजेक्ट के खिलाफ जाता है. दूसरी वजह यह है कि बनारस पौराणिक रूप से भगवान शिव से जुड़ा है. भले ही भगवान राम ने खुद कहा हो कि राम और शिव में कोई भेद नहीं है, लेकिन आरएसएस-बीजेपी प्रतिष्ठान ने शैव परंपराओं के प्रति एक स्पष्ट नापसंदगी दिखाई है. शायद यही वजह है कि राहुल गांधी अक्सर अपने भाषणों में भगवान शिव का जिक्र करते हैं, ताकि वे भगवा नेतृत्व पर तंज कस सकें.
मोदी की ये हरकतें उनके ‘परम भक्त’ और ‘हिंदू हृदय सम्राट’ होने के दावे पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं. अगर उन्हें हिंदू धर्म की रत्ती भर भी समझ होती, तो वे उन सैकड़ों छोटे मंदिरों को तोड़ने की इजाजत कभी नहीं देते जो वहां दशकों से खड़े थे. ये मंदिर हिंदुओं के आध्यात्मिक जीवन में गहरे रचे-बसे हैं. उनके एक वरिष्ठ सहयोगी का यह कहना कि “कमरे में मूर्ति रख देने से वह मंदिर नहीं बन जाता,” यह साफ दिखाता है कि मोदी के सलाहकारों को बनारस की धार्मिक आत्मा की कितनी कम समझ है.
आरएसएस के नेता अक्सर सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं—वह शाश्वत परंपरा जो वेदों में निहित है. लेकिन उनका आचरण, खास तौर पर पवित्र मंदिरों और 18वीं सदी की मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी विरासतों पर बुलडोजर चलाना, उनके दावों को खोखला साबित करता है. 17 जनवरी 2026 को प्रयागराज में जो हुआ, वह उनके ‘हिंदू धर्म रक्षक’ होने के ढोंग को और उजागर करता है.
उस दिन, मौनी अमावस्या के स्नान से पहले, प्रयागराज माघ मेले में एक गंभीर घटना घटी. ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपनी पारंपरिक पालकी में अनुयायियों के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने भीड़ नियंत्रण और अनुमति न होने का हवाला देकर उन्हें रोक दिया. बात बढ़कर धक्का-मुक्की तक पहुंच गई.
उनके अनुयायियों ने लाठीचार्ज और बदसलूकी का आरोप लगाया, और शंकराचार्य ने दावा किया कि उनकी पालकी की छतरी क्षतिग्रस्त हो गई और उन्हें संगम से लगभग एक किलोमीटर पहले ही वापस लौटने पर मजबूर कर दिया गया. विरोध में वे धरने पर बैठ गए और उन्होंने पवित्र स्नान करने से इनकार कर दिया.
इस घटना ने एक राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया. शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगाया कि यह अपमान जानबूझकर कराया गया है, क्योंकि उन्होंने 2025 के महाकुंभ भगदड़ (जिसमें कम से कम 30 तीर्थयात्री मारे गए थे) को लेकर सरकार की आलोचना की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने शुरू में मौतों को छिपाया और खुले तौर पर मुख्यमंत्री को झूठा बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग की.
अगर हम काशी में पवित्र संरचनाओं के विध्वंस और प्रयागराज में शंकराचार्य के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार को एक साथ देखें, तो यह बीजेपी-आरएसएस गठबंधन के ‘हिंदू धर्म के रक्षक’ होने के दावे की कलई खोल देता है. इसके बजाय, ऐसा लगता है कि वे व्यवस्थित रूप से हिंदू नैतिकता, परंपराओं और बहुलवाद को खत्म कर रहे हैं. एक सहिष्णु दार्शनिक परंपरा के रूप में ‘हिंदू धर्म’ और एक कठोर राजनीतिक विचारधारा के रूप में ‘हिंदुत्व’ के बीच का बढ़ता तनाव अब साफ दिखाई दे रहा है.
हिंदुत्व के समर्थकों का तर्क है कि वाराणसी कॉरिडोर एक विकास परियोजना है जिसे शहर को आधुनिक बनाने और काशी विश्वनाथ मंदिर को सीधे गंगा से जोड़कर तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बनाया गया है. हालांकि, इसे लागू करने में शहर के प्राचीन आध्यात्मिक चरित्र को संरक्षित करने की बहुत कम कोशिश की गई है.
भारत का आध्यात्मिक हृदय और भगवान शिव का निवास स्थान वाराणसी अब एक शॉपिंग और मनोरंजन केंद्र में बदला जा रहा है. भले ही यह पर्यटकों को आकर्षित करे, लेकिन यह शहर के धार्मिक सार को नष्ट करने का खतरा पैदा करता है.
सदियों से लोग काशी घूमने-फिरने नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए आते रहे हैं. मोदी का विजन तीर्थयात्रियों की जगह पर्यटकों को लाने का है, जिससे शहर की पहचान मिट रही है. जो विनाश चल रहा है, उसने हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. हिंदू धर्म बहुलवाद और सहिष्णुता पर जोर देता है, जबकि हिंदुत्व एक पत्थर की तरह कठोर बहुसंख्यक पहचान को बढ़ावा देता है.
मणिकर्णिका घाट का हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में अद्वितीय महत्व है. माना जाता है कि यहां अंतिम संस्कार से तत्काल मोक्ष मिलता है. किंवदंतियां कहती हैं कि भगवान शिव खुद मरते हुए व्यक्ति के कान में तारक मंत्र कहते हैं. हिंदुओं के लिए, मणिकर्णिका केवल एक घाट नहीं बल्कि मुक्ति का द्वार है.
यह बात बेहद परेशान करने वाली है कि ये मान्यताएं मोदी और आरएसएस के विचारकों के लिए कोई मायने नहीं रखतीं. मणिकर्णिका घाट पर बुलडोजर चलने पर आरएसएस की चुप्पी उसके पाखंड को उजागर करती है. अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी मूर्तियों और सदियों पुरानी कलाकृतियों को कथित तौर पर क्षतिग्रस्त या फेंक दिया गया है, जिसके खिलाफ सोशल मीडिया पर #SaveManikarnika जैसे अभियान चले हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार का रवैया टालमटोल वाला रहा है. वीडियो सबूत होने के बावजूद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस पर “एआई-जनित” वीडियो फैलाने का आरोप लगाया. इस तरह का इनकार नैतिक कायरता को दर्शाता है. प्रशासन का दावा है कि क्षतिग्रस्त पत्थर केवल वास्तुशिल्प के टुकड़े थे और होलकर की प्रतिमा सुरक्षित है. हालांकि, वायरल वीडियो में मूर्ति मलबे के बीच पड़ी दिखाई दे रही है, जो सरकारी बयानों का खंडन करती है.
विडंबना यह है कि 55,000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजना सीवेज सिस्टम और भीतरी सड़कों जैसी बुनियादी नागरिक जरूरतों के बजाय लक्जरी होटलों और पर्यटन बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देती है. वाराणसी की मार्केटिंग एक ग्लोबल टूरिज्म हब के रूप में की जा रही है, लेकिन इसके लिए आस्था, इतिहास और जीवित संस्कृति की बलि दी जा रही है.
लोग वाराणसी इसकी आध्यात्मिकता, जीवन-मृत्यु के अनुष्ठानों और प्राचीन मंदिरों के लिए आते हैं—न कि लक्जरी होटलों के लिए. विदेशी पर्यटक यहां फाइव-स्टार सुविधाओं में रहने नहीं, बल्कि शहर की कच्ची, पवित्र आत्मा को महसूस करने आते हैं. इसकी प्राचीनताओं और परंपराओं को नष्ट करने से केवल इसकी वैश्विक अपील कम होगी.
जैसा कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने अपने 16 जनवरी के ज्ञापन में सही कहा है, आज वाराणसी में विकास का मतलब आस्था, इतिहास और संस्कृति का व्यवस्थित विनाश है. वाराणसी केवल एक शहर नहीं है—यह करोड़ों सनातन विश्वासियों की एक जीवित सभ्यता है. दुख की बात है कि विकास के नाम पर इस विरासत को एक सुनियोजित तरीके से खत्म किया जा रहा है.
(अरुण श्रीवास्तव का यह विश्लेषण काउंटर करंट्स में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है. उसके ख़ास अंश)
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