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निर्वाचन आयोग में सदस्यों का चयन, अपवाद जारी।

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निर्वाचन आयोग में सदस्यों का चयन, अपवाद जारी।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 324(2) कहता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त CEC और निर्वाचन आयुक्तों EC की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे, संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन।

लेकिन आज़ादी के बाद सात दशकों तक संसद ने इस बारे में कोई कानून नहीं बनाया, जिसके चलते नियुक्तियाँ पूरी तरह कार्यपालिका यानी केंद्र सरकार की सिफारिश पर ही होती रहीं हैं, और सात दशकों बाद भी संसद में इसके लिए कोई कानून नहीं बन पाया था।

इस स्थिति में बदलाव मार्च 2023 में आया, जब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती,

तब तक CEC और EC की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI की एक तीन-सदस्यीय समिति की सिफारिश पर की जाएगी, ताकि इन नियुक्तियों की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके।

इस फैसले का मकसद साफ था नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका का एक निष्पक्ष प्रतिनिधि शामिल करके कार्यपालिका के एकतरफा नियंत्रण को रोकना।

लेकिन दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने संसद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 पारित करवाया, जिसे राष्ट्रपति ने 29 दिसंबर 2023 को मंजूरी दी।

इस नए कानून के तहत चयन समिति में तीन सदस्य हैं प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, और तीसरे सदस्य के तौर पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री। यानी CJI की जगह अब एक केंद्रीय मंत्री ने ले ली, जिसे प्रधानमंत्री खुद नामित करते हैं।

इस समिति द्वारा अनुशंसित नाम पर राष्ट्रपति औपचारिक मुहर लगाते हैं। नियुक्ति से पहले कानून मंत्री की अध्यक्षता वाली एक खोज समिति पाँच नामों का पैनल तैयार करती है, जिस पर चयन समिति विचार करती है।

अब सीधा सवाल क्या इसमें केंद्र का हस्तक्षेप है? इसका जवाब है। संरचनात्मक रूप से, हाँ, काफी हद तक। तीन सदस्यीय समिति में दो सदस्य प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री सत्तारूढ़ दल के हैं, जबकि सिर्फ एक सदस्य विपक्ष का नेता स्वतंत्र आवाज़ है।

व्यवहार में यह बहुमत की संरचना सत्तापक्ष के पास ही रहती है, क्योंकि निर्णय बहुमत से होता है और विपक्ष के नेता की असहमति को दरकिनार किया जा सकता है। इसी वजह से आलोचकों का कहना है कि चयन प्रक्रिया में सरकार का प्रभुत्व हो सकता है, जो आयोग की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

यही वजह है कि इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाओं के ज़रिए चुनौती दी गई है। मुख्य याचिकाकर्ता एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ADR है, जिसकी ओर से वकील प्रशांत भूषण पैरवी कर रहे हैं। उनकी दलील है कि नया कानून प्रभावी रूप से कार्यकारी वर्चस्व को आयोग पर बहाल करता है,

क्योंकि CJI को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया, जो संविधान पीठ के 2023 के फैसले की भावना के विपरीत है। जनवरी 2024 में एक याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान भी यही तर्क दोहराया गया कि CJI का शामिल होना केवल कानूनी खाली स्थान भरने के लिए नहीं था, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका के प्रभाव से बचाने के लिए ज़रूरी था।

फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन मामले को आगे सुनवाई के लिए लंबित रखा। जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी करते हुए मामले को अप्रैल में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

इसी बीच मार्च 2024 में इसी कानून के तहत ज्ञानेश कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया, जिस पर विपक्ष ने तीखी आपत्ति जताई थी, और याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र संविधान पीठ के फैसले का मज़ाक बना रहा है।

मामला 2025 में भी कई बार सुनवाई के लिए टलता रहा मई और अप्रैल में तारीखें तय हुईं, और वकील प्रशांत भूषण लगातार अदालत से इसे प्राथमिकता से सुनने का अनुरोध करते रहे। हाल ही में, सितंबर 2026 में भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, जहाँ अदालत को तय करना है कि क्या इसे बड़ी पीठ के पास भेजा जाए।

गड़बड़ियों की आशंका के मुख्य बिंदु इस प्रकार समझे जा सकते हैं पहला, चयन समिति में बहुमत सत्तापक्ष के पास होने से निष्पक्ष उम्मीदवार के बजाय सुविधाजनक उम्मीदवार चुने जाने का जोखिम रहता है।

दूसरा, सर्च कमेटी भी कानून मंत्री यानी कार्यपालिका के अधीन है, जिससे शुरुआती पैनल तैयार करने में भी सरकार का ही नियंत्रण रहता है। तीसरा, न्यायिक निगरानी CJI की मौजूदगी हटने से शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के उल्लंघन की बात भी उठाई गई है

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