सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् न गाने पर आपराधिक कार्रवाई के सवाल पर केंद्र से जवाब मांगा। कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े पुराने फैसले का भी जिक्र किया।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 22 सितंबर को वंदे मातरम् से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़े कारणों के चलते राष्ट्रगीत नहीं गाता है,
तो सिर्फ इस आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अदालत ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब भी मांगा है। यह सुनवाई कर्नाटक संगीत के गायक टीएम कृष्णा की याचिका पर हुई, जिसमें वंदे मातरम् से जुड़े नए कानूनी प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में खास तौर पर आपराधिक सजा के पहलू पर विचार करने की बात कही। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए या उसके कितने छंद आधिकारिक रूप से गाए जाएं,
यह तय करना अदालत का काम नहीं है। हालांकि, किसी नागरिक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं, इस कानूनी सवाल की जांच अदालत करेगी।
कृष्णा की याचिका का संबंध केंद्र की ओर से वंदे मातरम् के गायन को लेकर जारी निर्देशों और 2026 में किए गए कानूनी बदलाव से है। संसद ने जुलाई में ‘Prevention of Insults to National Honour Act, 1971’ में संशोधन को मंजूरी दी थी।
राज्यसभा ने इसे 29 जुलाई और लोकसभा ने 30 जुलाई को पारित किया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह संशोधन कानून बन गया। उपलब्ध सरकारी जानकारी के मुताबिक, इसका उद्देश्य वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान वैधानिक संरक्षण देना है।
संशोधित कानून के तहत वंदे मातरम् के गायन को जानबूझकर रोकना या इसे गा रही सभा में व्यवधान पैदा करना अपराध माना गया है। ऐसे मामले में तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
कानून का केंद्र बिंदु जानबूझकर गायन रोकने या सभा में बाधा डालने जैसी गतिविधियां हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल भी है कि केवल धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के कारण गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति पर इस कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।
सुनवाई के दौरान 1986 के ‘बिजो एमैनुअल बनाम केरल सरकार’ मामले का संदर्भ भी सामने आया। उस मामले में तीन छात्रों ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द कर दिया था। इसी फैसले में धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संतुलन से जुड़े सिद्धांत सामने आए थे। मौजूदा मामले में इसी पुराने फैसले की प्रासंगिकता पर भी चर्चा हुई।
वंदे मातरम् को लेकर केंद्र ने इस साल कई नए निर्देश भी जारी किए हैं। 9 जुलाई को गृह मंत्रालय ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान के गायन से जुड़े प्रोटोकॉल भेजे थे।
निर्देशों के मुताबिक, जब दोनों का गायन या वादन एक ही कार्यक्रम में हो, तो पहले वंदे मातरम् और उसके बाद जन गण मन होगा। 15 अगस्त 2026 को लाल किले में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार वंदे मातरम् के सभी छह छंद प्रस्तुत किए गए और उसके बाद राष्ट्रगान हुआ।
अब इस मामले में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना जवाब दाखिल करना है। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि नए कानून के आपराधिक प्रावधानों की संवैधानिक और कानूनी सीमा किस तरह लागू होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केवल मामले के आपराधिक पहलू की जांच के लिए केंद्र से जवाब मांगा है; अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
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