अफसरों के तबादले पर विवाद: टीएमसी हाई कोर्ट पहुँची, ममता ने कहा-अघोषित इमरजेंसी…
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद चुनाव आयोग द्वारा किए गए बड़े पैमाने पर प्रशासनिक तबादलों को लेकर विवाद अब न्यायालय तक पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस ने इन तबादलों को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी के सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने इस संबंध में याचिका दायर की है, जिसमें चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी पक्षकार बनाया गया है।
यह मामला 15 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के तुरंत बाद सामने आया, जब चुनाव आयोग ने राज्य के कई वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया। इन तबादलों में मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकारियों को हटाया गया। पिछले कुछ दिनों में 50 से अधिक आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को या तो स्थानांतरित किया गया या उनके पदों में बदलाव किया गया। इस कदम ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है।
टीएमसी की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग ने इन तबादलों से पहले राज्य सरकार से कोई परामर्श नहीं किया, जो कि नियमों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से इस मामले में जल्द सुनवाई की मांग की है। कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया गया और संभावना है कि इस पर सुनवाई अगले सप्ताह की शुरुआत में हो सकती है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इन तबादलों को ‘अघोषित इमरजेंसी’ करार दिया है। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीतिक बदले की भावना से लिया गया है और यह ‘अघोषित राष्ट्रपति शासन’ जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हस्तक्षेप कर रहा है और संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है।
ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही 50 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों को हटा दिया गया, जिनमें मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, एडीजी, आईजी, डीआईजी, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक शामिल हैं। उनके अनुसार यह प्रशासनिक स्थिरता को प्रभावित करने वाला कदम है। उन्होंने इसे उच्च स्तर का राजनीतिक हस्तक्षेप बताते हुए कहा कि यह शासन नहीं बल्कि अराजकता का संकेत है।
इससे पहले भी ममता बनर्जी चुनाव आयोग पर तीखा हमला कर चुकी हैं। उन्होंने एक बयान में कहा था कि अगर चुनाव आयोग इस तरह काम कर रहा है, तो उसे खुलकर किसी राजनीतिक दल के लिए प्रचार करना शुरू कर देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ महीनों से राज्य प्रशासन पर बाहरी दबाव बनाया जा रहा है और एक निर्वाचित सरकार की शक्तियों को कमजोर किया जा रहा है।
वहीं, टीएमसी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की आलोचना की है। पार्टी सांसद शताब्दी रॉय ने कहा कि चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों के तबादले का उद्देश्य प्रशासनिक नियंत्रण हासिल करना है। पार्टी का कहना है कि इस तरह के कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
चुनाव आयोग की ओर से इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया है कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाए गए हैं। आयोग का मानना है कि चुनाव के दौरान प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखना आवश्यक है, और इसी उद्देश्य से अधिकारियों के तबादले किए गए हैं।
इस बीच, कुछ अधिकारियों के तबादलों में बदलाव भी किया गया है। जानकारी के अनुसार, जिन आईपीएस अधिकारियों को अन्य राज्यों—जैसे तमिलनाडु और केरल—में भेजा गया था, उनमें से पांच के तबादले बाद में वापस ले लिए गए। इनमें बिधाननगर के पुलिस कमिश्नर मुरलीधर शर्मा और सिलीगुड़ी के पुलिस कमिश्नर वकार राजा के नाम शामिल हैं। साथ ही, राज्य सरकार ने हटाए गए 13 जिलाधिकारियों को वैकल्पिक पद भी सौंपे हैं।
पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव दो चरणों में होंगे। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को निर्धारित है, जबकि मतगणना 4 मई को होगी। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले हुए इन तबादलों ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है।
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