मध्य प्रदेश के आईएएस अधिकारियों की संपत्ति का खुलासा-किसके पास कितनी प्रॉपर्टी, सामने आए दिलचस्प आंकड़े
मध्य प्रदेश कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा IAS अधिकारियों ने वर्ष 2025 की अपनी अचल संपत्तियों का ब्योरा केंद्र सरकार को सौंप दिया है। हर साल की तरह इस बार भी अधिकारियों ने 1 जनवरी 2026 की स्थिति के अनुसार अपनी संपत्तियों की जानकारी दी है। इस विवरण में कृषि भूमि, आवासीय मकान, फ्लैट, भूखंड और व्यावसायिक संपत्तियों का पूरा ब्यौरा शामिल किया गया है।
सामने आए आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि प्रदेश के कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के पास करोड़ों रुपये की संपत्ति है, जबकि कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने नाम पर कोई अचल संपत्ति घोषित नहीं की है। इन आंकड़ों ने प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर संपत्ति के स्वरूप और उसके वितरण को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है।
अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों में अशोक बर्णवाल की संपत्ति सबसे अधिक बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके और उनकी पत्नी के नाम कुल मिलाकर लगभग साढ़े छह करोड़ रुपये की अचल संपत्ति दर्ज है। इन संपत्तियों में कृषि भूमि, आवासीय फ्लैट और व्यावसायिक संपत्ति शामिल है। इन संपत्तियों के माध्यम से उन्हें हर साल लगभग तेईस लाख से अधिक की आय भी होती है। भोपाल के बिशनखेड़ी गांव में उनके नाम दो कृषि भूखंड दर्ज हैं जिनकी कीमत लगभग पचहत्तर-पचहत्तर लाख रुपये बताई गई है।
इसके अलावा बावड़ियां कला क्षेत्र में स्थित रॉयल विला में उनका एक फ्लैट है जिसकी कीमत करीब अस्सी लाख रुपये बताई गई है और उससे प्रतिवर्ष लगभग दो लाख रुपये के आसपास आय होती है। इसी क्षेत्र के इंद्रधनुष टॉवर में उनका एक और फ्लैट है जिसकी कीमत लगभग डेढ़ करोड़ रुपये बताई गई है। वहीं इसी इमारत में उनके नाम एक व्यावसायिक स्पेस भी दर्ज है जिसकी अनुमानित कीमत करीब तीन करोड़ रुपये है और इससे उन्हें हर साल लगभग उन्नीस लाख रुपये की आय प्राप्त होती है।
इसी तरह अपर मुख्य सचिव संजय दुबे और उनकी पत्नी के नाम भी करोड़ों रुपये की संपत्ति दर्ज की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके पास लगभग चार करोड़ सड़सठ लाख रुपये की अचल संपत्ति है। इनमें कृषि भूमि के साथ-साथ आवासीय भवन और अन्य संपत्तियां भी शामिल हैं। टीकमगढ़ जिले में उनके नाम लगभग दस हेक्टेयर कृषि भूमि दर्ज है, जिससे उन्हें हर वर्ष आय भी प्राप्त होती है।
भोपाल के न्यू मार्केट क्षेत्र में उनका एक आवासीय फ्लैट है जिसकी कीमत लगभग पचास लाख रुपये बताई गई है और इससे सालाना करीब ढाई लाख रुपये की आय होती है। इसके अलावा भोपाल के बर्रई इलाके में उनके नाम कृषि भूमि दर्ज है और शाहपुरा क्षेत्र में लगभग एक करोड़ रुपये का एक मकान भी बताया गया है जिससे उन्हें अच्छी खासी वार्षिक आय प्राप्त होती है। इसके अलावा भोपाल में ही करीब ढाई से तीन करोड़ रुपये मूल्य का एक अन्य आवासीय भवन भी उनकी संपत्ति में शामिल है।
अपर मुख्य सचिव राजेश राजौरा की संपत्ति का स्वरूप भी सामने आया है। उन्होंने अपनी कुल संपत्ति करीब एक करोड़ तिहत्तर लाख रुपये के आसपास घोषित की है। उनकी संपत्ति का बड़ा हिस्सा कृषि भूमि के रूप में दर्ज है।
भोपाल के डरी गांव में उनके नाम लगभग चार एकड़ कृषि भूमि है। इसके अलावा सेमरी गांव में भी उनके नाम कई भूखंड दर्ज हैं। वहीं गुजरात के अहमदाबाद में लगभग पचास लाख रुपये का एक कार्यालय स्पेस भी उनकी संपत्ति में शामिल है। यह दर्शाता है कि कई प्रशासनिक अधिकारी अपने निवेश को केवल एक शहर तक सीमित न रखकर अलग-अलग क्षेत्रों में भी करते हैं।
वहीं दूसरी ओर कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने नाम पर कोई अचल संपत्ति घोषित नहीं की है। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी ने अपने नाम पर कोई संपत्ति नहीं बताई है। हालांकि उनकी पत्नी दीपाली रस्तोगी के नाम रायसेन जिले के गौहरगंज क्षेत्र में कृषि भूमि दर्ज है जिसकी अनुमानित कीमत करीब अट्ठाइस लाख रुपये के आसपास बताई गई है। यह भी एक रोचक पहलू है कि कई बार संपत्तियां अधिकारियों के बजाय उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम दर्ज होती हैं।
मैदानी प्रशासन में कार्यरत कलेक्टरों ने भी अपनी संपत्तियों का विवरण सरकार को सौंपा है। इंदौर के कलेक्टर शिवम वर्मा ने अपने नाम पर कोई संपत्ति घोषित नहीं की है। वहीं जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह के नाम उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में लगभग उनतीस लाख रुपये की कृषि भूमि दर्ज है, जो उनके भाई के साथ संयुक्त रूप से है।
इसी क्षेत्र में उनकी मां के नाम भी एक भूखंड दर्ज है जिसकी कीमत लगभग अड़तीस लाख रुपये बताई गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि कई अधिकारियों की संपत्ति पारिवारिक रूप से साझा स्वामित्व में भी होती है।
भोपाल कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने अपने नाम पर कोई संपत्ति घोषित नहीं की है, लेकिन उनकी पत्नी के नाम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये कीमत का एक प्लॉट दर्ज है।
इसी तरह ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान और उनके पति के नाम कुल मिलाकर करीब अड़सठ लाख रुपये की संपत्ति दर्ज की गई है। उनके पति के नाम गाजियाबाद में एक फ्लैट है जिसकी कीमत लगभग सैंतीस लाख रुपये बताई गई है और इससे सालाना आय भी होती है। वहीं रुचिका चौहान के नाम इंदौर के हातोद क्षेत्र में लगभग इकतीस लाख रुपये मूल्य का एक भूखंड दर्ज है।
उज्जैन कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने भी अपनी संपत्ति का ब्यौरा प्रस्तुत किया है। उनके नाम लखनऊ में लगभग पच्चीस लाख रुपये कीमत का एक भूखंड दर्ज है। इसके अलावा गौतम नगर क्षेत्र में उनकी मां और उनके संयुक्त नाम पर एक फ्लैट भी दर्ज है जिसकी कीमत लगभग पचपन लाख रुपये बताई गई है। इन सभी आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्तियां अलग-अलग शहरों और क्षेत्रों में फैली हुई हैं।
दरअसल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए हर साल अपनी अचल संपत्तियों का विवरण देना अनिवार्य होता है। यह जानकारी केंद्र सरकार को भेजी जाती है ताकि पारदर्शिता बनी रहे और यह स्पष्ट हो सके कि किसी अधिकारी के पास कितनी संपत्ति है और वह कब तथा कैसे अर्जित की गई है।
इस प्रक्रिया में यह भी बताया जाता है कि संपत्ति कब खरीदी गई, उसकी अनुमानित कीमत क्या है और उससे कितनी आय प्राप्त होती है। सामान्य प्रशासन विभाग के अनुसार वर्ष 2025 के लिए अधिकांश अधिकारियों ने समय पर अपना विवरण प्रस्तुत कर दिया है।
इन आंकड़ों से एक व्यापक तस्वीर यह भी सामने आती है कि प्रदेश के कई वरिष्ठ अधिकारियों के पास कृषि भूमि भी है जिससे उन्हें हर वर्ष आय प्राप्त होती है। साथ ही शहरी क्षेत्रों में फ्लैट, प्लॉट और व्यावसायिक संपत्तियों में निवेश भी देखने को मिलता है। कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने नाम पर कोई संपत्ति घोषित नहीं की है, जो प्रशासनिक सेवा में संपत्ति के विविध स्वरूप को दर्शाता है।
कुल मिलाकर यह वार्षिक संपत्ति विवरण प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से यह जानकारी सार्वजनिक होती है कि सरकारी सेवा में कार्यरत वरिष्ठ अधिकारियों की अचल संपत्तियों का स्वरूप और मूल्य क्या है।
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