राम रहस्यमय तरीकों से काम करते हैं; लेकिन उनके हिसाब-किताब रखने वाले शायद नहीं

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राम रहस्यमय तरीकों से काम करते हैं; लेकिन उनके हिसाब-किताब रखने वाले नहीं

ईश्वर का ‘बहीखाता’ बिगाड़ा
वीवीपी शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार )

राम ने चौदह साल का वनवास झेला. रावण का सामना किया. पारिवारिक संघर्षों से गुज़रे. पुरातत्वविदों, टीवी एंकरों, पीढ़ियों तक चले मुकदमों और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक की लंबी यात्रा देखी. शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी अगली सबसे बड़ी चुनौती हिसाब-किताब रखने वालों से आएगी. राम की संपत्ति पर नज़र डालने कोई महमूद गजनवी नहीं आया. न कोई ईसाई मिशनरी, न कोई इस्लामी कट्टरपंथी, न कोई ज़ायनिस्ट साज़िश, और न ही वे परिचित खलनायक, जिन्हें भारतीय राजनीति हर बार किसी बाहरी दुश्मन की ज़रूरत पड़ने पर मंच पर ले आती है. विडंबना, अगर विडंबना अब भारत की सबसे प्रमुख साहित्यिक विधा नहीं बन चुकी है, तो इस बार कहीं अधिक नज़दीक थी.

लाखों श्रद्धालु अयोध्या पहुंचे और राम के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित की. किसी ने दानपात्र में बीस रुपये डाले. किसी ने परिवार के गहने चढ़ा दिए. उद्योगपतियों ने करोड़ों रुपये के चेक सौंपे. उनकी अपेक्षा बहुत साधारण थी. जो कुछ राम को अर्पित किया जाए, वह राम के पास ही रहे.  लेकिन ईश्वर ने शायद अपना बही-खाता किसी और के हवाले कर दिया है. चमत्कार रोटियां और मछलियां बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे कभी हिसाब की किताबें संतुलित नहीं करते. सोना अब भी तौला जाना पड़ता है. चांदी अब भी गिनी जाती है. नकदी अब भी बांधी जाती है. रसीदों का मिलान करना पड़ता है और तिजोरियों पर ताले लगाने पड़ते हैं. देवताओं ने सदियों में अनेक चमत्कार किए हैं, लेकिन बही-खाते मिलाना उनमें कभी शामिल नहीं रहा. उसके लिए मंदिरों को आज भी साधारण मनुष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है. और यह हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है. जब से यहूदा ने तीस चांदी के सिक्के स्वीकार किए, तब से संरक्षक और मालिक के बीच का अंतर कई बार धुंधला पड़ता रहा है.

इसीलिए राम मंदिर में दान के प्रबंधन को लेकर उठा विवाद केवल उस आपराधिक जांच तक सीमित नहीं है, जो इस समय चल रही है. एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित हुआ. एफआईआर दर्ज हुई. गिरफ्तारियां हुईं. अंततः जिम्मेदारी किसकी है, इसका फैसला अदालत करेगी. अदालतें इसी लिए होती हैं कि आरोप और दोषसिद्धि एक ही बात नहीं होते. लेकिन केवल जांच शुरू हो जाने भर से ऐसी विडंबना सामने आ गई है, जिसे शायद सबसे बड़ा व्यंग्यकार भी लिखने से पहले झिझकता.

दशकों तक देश को बताया गया कि राम को मंदिर के बाहर मौजूद लोगों से बचाने की ज़रूरत है. अब लगता है कि अधिक कठिन सवाल उन्हीं दीवारों के भीतर से उठ रहे हैं, जिन्हें उनकी भेंटों की रक्षा का दायित्व सौंपा गया था. कोई सोच सकता था कि कम-से-कम एक बात पर तो सबकी सहमति होगी. यदि करोड़ों श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा और विश्वास से दान दिया है, तो हर रुपये, हर आभूषण और हर चढ़ावे का पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए. आधुनिक भारत में इससे आसान सहमति शायद कोई और नहीं हो सकती थी. लेकिन हुआ इसका उलटा.

जवाबदेही की मांग को कुछ लोगों ने ऐसे पेश किया, मानो वह आस्था पर हमला हो. ऑडिट की मांग अचानक ईशनिंदा जैसी लगने लगी. श्रद्धा और राजनीति के बीच कहीं आलोचना को पाप का दर्जा मिल गया. उससे भी विचित्र यह प्रयास रहा कि पूरे मामले को सार्वजनिक जवाबदेही के बजाय घर के अंदर का निजी मामला बताया जाए, मानो यह तय करना कि कोई घटना आपराधिक है या केवल घरेलू, इस बात पर निर्भर करता हो कि घर किसका है. ध्रुवीकरण का यह भी एक अनोखा रास्ता है.  शायद इसमें किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. धर्म और राजनीति हमेशा से ऐसे साझेदार रहे हैं, जो एक-दूसरे से लगातार उलझते भी हैं और एक-दूसरे का इस्तेमाल भी करते हैं. दोनों को लगता है कि वही नृत्य का नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि दूसरा चुपचाप संगीत बदल रहा होता है.

राम भारतीय राजनीति में कल नहीं आए. उन्हें आए लगभग चार दशक हो चुके हैं. उनके नाम पर खड़े हुए आंदोलन ने देश की चुनावी राजनीति की तस्वीर बदल दी. बहुत कम धार्मिक प्रतीकों ने भारत के चुनावी नक्शे को उतना बदला है, जितना राम ने. 1984 में दो सांसदों से शुरू हुई यात्रा बारह साल बाद 161 सांसदों तक पहुंच गई. अयोध्या ने वह कर दिखाया, जो कोई चुनावी घोषणा-पत्र नहीं कर सका. नेता चुनावी नारा खोजने में करोड़ों खर्च करते हैं. यहां तो विजयी नारा पहले से ही मौजूद था.

लेकिन इतिहास केवल लाभ नहीं देता, जिम्मेदारियां भी देता है. मंदिर आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन जिस राजनीतिक आंदोलन ने इस मंदिर में अपना इतना निवेश किया हो, वह जनता से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि लोग देवता की पवित्रता और संस्था की जवाबदेही को अलग-अलग करके देखेंगे. प्रतीक जितना बड़ा होगा, जांच भी उतनी ही बड़ी होगी. भव्य मंदिर स्वाभाविक रूप से भव्य अपेक्षाएं भी पैदा करता है.

कोई करोड़ों रुपये केवल स्थापत्य कला की प्रशंसा करने के लिए दान नहीं देता. ट्रस्ट को उदार दान देने वाला उद्योगपति और रोज़ कमाने-खाने वाला वह मजदूर, जिसने चुपचाप सौ रुपये का नोट राम के चरणों में रख दिया, दोनों को बराबर अधिकार है यह पूछने का कि उनकी भेंट का क्या हुआ. आस्था अमीर और गरीब में भेद नहीं करती. जवाबदेही को भी नहीं करना चाहिए. विधानसभा चुनावों की एक अजीब आदत होती है. वे ऊंची-ऊंची राजनीतिक बातों को खींचकर गांव की चौपाल तक ले आते हैं. लोकसभा चुनावों में भाषण आसमान छूते हैं. भारत ग्लोबल साउथ का नेता है. भारत इज़रायल का मित्र है. भारत दुनिया को सभ्यता सिखा रहा है.

लेकिन विधानसभा चुनाव कहीं अधिक निर्मम होते हैं. वे आखिरकार गांव के चबूतरे पर पहुंच जाते हैं, जहां कोई केवट, दुसाध, यादव, कोयरी या बस अड्डे के बाहर पान बेचने वाला व्यक्ति भू-राजनीति में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं लेता. उसका सवाल बहुत साधारण होता है. “ठीक है, लेकिन राम का पैसा संभाल कौन रहा था?”

इस बीच भारत ने एक अद्भुत क्षमता विकसित कर ली है. यहां घोटाले अब बदहजमी नहीं करते. एक और जांच. एक और खंडन. एक और टीवी बहस, जिसमें बारह लोग ऐसे बैठे होते हैं जिन्हें कुछ नहीं पता, और एक एंकर होता है जिसे पूरा विश्वास होता है कि उसे सब पता है. फिर सब आगे बढ़ जाते हैं. सार्वजनिक स्मृति भारतीय लोकतंत्र की सबसे छोटी अवधि बन चुकी है.कौन-सा आरोप अदालत में टिकेगा और कौन नहीं, इसका फैसला न्यायपालिका करेगी. लेकिन जनता के भरोसे पर पड़ने वाले असर के लिए किसी अदालती फैसले की ज़रूरत नहीं होती. धीरे-धीरे नागरिक यह मानने लगते हैं कि भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं, बल्कि शासन का स्थायी विभाग है.

फिर भी इस मामले का असर कुछ अलग है. सरकारों का पैसा वर्षों से गायब होता रहा है. बैंकों ने अरबों रुपये डूबते देखे हैं. ठेकेदारों ने गणित के नए-नए चमत्कार दिखाए हैं. लाइसेंस और ठेकों ने दशकों तक सुर्खियां बनाई हैं. लेकिन इनमें से कोई भी घटना दानपात्र के सामने घटित हुई घटना जैसी नहीं लगती.देवता के सामने चढ़ाया गया धन अलग तरह की संपत्ति होता है. उसमें लाभ की कोई अपेक्षा नहीं होती. ब्याज का कोई वादा नहीं होता. भावना के मुकाबले टैक्स में मिलने वाली छूट का भी कोई महत्व नहीं होता. एक बुजुर्ग महिला अपनी शादी के समय से पहने हुए कंगन उतारकर राम को इसलिए दे देती है कि उसे लगता है, इस निजी संवाद में सबसे भरोसेमंद संरक्षक वही हैं. एक उद्योगपति भी करोड़ों रुपये इसी विश्वास से देता है, बस उसके हाथ में फाउंटेन पेन थोड़ा बेहतर होता है. दोनों में से कोई यह नहीं सोचता कि उसका दान किसी वित्तीय लेन-देन का हिस्सा बन गया है. वे मानते हैं कि वह बाज़ार से बाहर निकल चुका है.

हर धर्म ने प्रायश्चित की व्यवस्था इसलिए बनाई, क्योंकि किसी ने यह खोज लिया था कि “माफ़ कीजिए” कहना अपनी आदतें बदलने से सस्ता पड़ता है. राजनीति ने इसमें भी सुधार कर लिया. उसने प्रायश्चित छोड़ दिया, लेकिन क्षमा की उम्मीद बनाए रखी. न अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. राम का नाम फिर लिया जाएगा. आधुनिक भारतीय राजनीति में शायद सबसे अधिक मेहनत करने वाले चुनाव प्रचारक स्वयं राम हैं. उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा. कभी टिकट नहीं मांगा. कभी मंत्री पद न मिलने पर नाराज़ नहीं हुए. कभी कोई रैली नहीं की. फिर भी शायद ही किसी ने उनसे अधिक वोट दिलाए हों. लगता है, देवताओं के लिए सेवानिवृत्ति जैसी कोई व्यवस्था नहीं होती.

लेकिन असली सवाल बेहद सरल है. मंदिर श्रद्धालुओं से विश्वास मांगते हैं. श्रद्धालुओं को मंदिरों से ईमानदारी मांगने का अधिकार है. यह ईशनिंदा नहीं है. अपने ढंग से यह भी पूजा का ही एक रूप है.राम ने वनवास झेला. राक्षसों का सामना किया. राजनीति को भी झेला. संभव है कि वे हिसाब-किताब रखने वालों से भी पार पा लें. लेकिन राजनीति उन हिसाब-किताब रखने वालों से बच पाएगी या नहीं, यह बिल्कुल अलग सवाल है.

(वीवीपी शर्मा भारत और विदेश में तीन दशकों से अधिक का अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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