मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के खिलाफ खुली बगावत करते हुए पार्टी से 30 साल से जुड़े एक बड़े नेता ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है।
और सिर्फ इस्तीफा ही नहीं दिया है बल्कि जीतू पटवारी को कटघरे में खड़ा किया है, उनके फैसले पर सवाल उठाए हैं…
तीन दिन तक मीडिया के बायकॉट का फैसले पर सवाल है।
सिर्फ इस्तीफा नहीं दिया। ये भी कहा कि जीतू बड़े नेताओं की पंसद हो सकते हैं लेकिन कार्यकर्ताओं की पसंद नहीं हैं…
ऐसे में जब अपनी ही पार्टी के नेता सवाल उठाने लगें तो संदेश साफ है…
जीतू पटवारी को राजनीतिक विरोधियों से नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी की बगावत ने परेशान कर दिया है।
जीतू सरकार को घेरने के चक्कर में घर को ही नहीं संभाल पा रहे…
दिग्विजय सिंह जीतू पटवारी को दलाल बोल रहे हैं तो जीतू समर्थक दिग्गी को बीजेपी का स्लीपर सेल…
समझ नहीं आ रहा कि कांग्रेस में चल क्या रहा है।
अब जीतू भले ही सफाई दें, लेकिन यहां मशहूर शेर जीतू पटवारी पर फिट बैठता है।
तू इधर, उधर की बात न कर मुझे बस इतना बता कि काफिला लुटा कैसे…
मुझे राहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है
कांग्रेस से 30 साल से जुड़े… दरी-फर्श उठाने वाले… पर्चे चिपकाने वाले… कांग्रेस की आवाज बुलंद करने वाले प्रदेश कांग्रेस के पूर्व महासचिव और प्रवक्ता राकेश यादव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
उन्होंने अपना इस्तीफा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी को भेजा। इस्तीफे में राकेश सिंह यादव ने प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि संगठन में समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है, फैसले एकतरफा लिए जा रहे हैं और पार्टी की कार्यशैली से वे लंबे समय से असंतुष्ट थे। उन्होंने मीडिया डिबेट के बहिष्कार जैसे निर्णयों पर भी नाराजगी जताई।
राकेश यादव के सार्वजनिक बयान के बाद भाजपा ने इसे कांग्रेस के भीतर बढ़ती असंतुष्टि का प्रमाण बताया है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी दल में जब वरिष्ठ पदाधिकारी सार्वजनिक रूप से असहमति व्यक्त करते हैं, तो उसका असर संगठन की छवि और कार्यकर्ताओं के मनोबल दोनों पर पड़ता है।
अब सवाल ये है कि क्या यह सिर्फ एक बयान है या बड़ा संकेत?
दरअसल लोकतांत्रिक दलों में मतभेद असामान्य नहीं होते। लेकिन जब मतभेद बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक मंच पर आ जाएँ, तब वह केवल व्यक्तिगत असंतोष नहीं रह जाता, बल्कि संगठनात्मक स्थिति पर भी प्रश्न खड़े करता है। यही वजह है कि राकेश यादव के बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है—
क्या मध्यप्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन के बीच संवाद कमजोर पड़ रहा है?
मध्यप्रदेश कांग्रेस लंबे समय से विभिन्न प्रभावशाली नेताओं के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के लिए जानी जाती रही है। समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन हुए, लेकिन गुटीय राजनीति की चर्चा समाप्त नहीं हुई। पार्टी में अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव वाले समूहों की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है।
ऐसे में जब कोई पदाधिकारी सार्वजनिक रूप से असंतोष जताता है, तो यह चर्चा स्वाभाविक रूप से तेज हो जाती है कि क्या संगठनात्मक समन्वय अपेक्षित स्तर पर नहीं है।
राकेश यादव ने बड़ा सवाल उठाया कि जीतू बड़े नेताओं की पंसद हैं, उन्होंने कहा कि वे सोचते थे कि जीतू सीख जाएंगे लेकिन वे नहीं सीखे…और पार्टी लगातार गर्त में जाती गई
– लोकसभा चुनाव में क्लीन स्वीप जीतू के अध्यक्ष रहते हुई।
– विजयपुर को छोड़कर उप चुनावों में पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है।
– ऐसे में कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना बड़ी चुनौती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष में रहते हुए सबसे बड़ी ताकत संगठन होता है। यदि संगठन के भीतर ही सार्वजनिक मतभेद बढ़ने लगें, तो विपक्ष की राजनीतिक धार भी कमजोर पड़ सकती है।
जिस तरह से सार्वजनिक मंच पर पिछले दिनों दिग्विजय के साथ जीतू पटवारी ने व्यवहार किया था वो भी कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतरा, उसके बाद दिग्विजय सिंह ने भी खुलकर उज्जैन ट्रस्ट जमीन मामले में जीतू पर सवाल उठाए थे।
ऐसे में कहा जाए कि जीतू पटवारी अब पूरी तरह से घिर गए हैं तो गलत नहीं होगा, क्योंकि संघठन उन से संभल नहीं रहा और सरकार को घेरने के चक्कर में भी वे ऊल जुलूल आरोप लगा रहे हैं।
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