ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के बीच चलती बस में नाबालिग से दरिंदगी के मामले ने काले शीशों, पर्दों और पुलिस निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर दौड़ने वाले ऐसे वाहन, जिनकी खिड़कियों पर काले शीशे या पर्दे लगे हों, महज यातायात नियमों का उल्लंघन नहीं हैं। कई बार यही बंद खिड़कियां अपराधियों के लिए ऐसी आड़ बन जाती हैं, जिसके पीछे होने वाली गतिविधियों का बाहर से अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।
ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के बीच करीब 47 किलोमीटर के सफर में 16 वर्षीय नाबालिग के साथ चलती स्लीपर बस में कथित तौर पर दरिंदगी की घटना ने एक बार फिर पुलिस निगरानी, परिवहन व्यवस्था और वाहनों की जांच को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस बस में यह वारदात हुई, वह रास्ते में कई इलाकों और सीमाओं से गुजरती रही, लेकिन कहीं भी उसकी प्रभावी जांच क्यों नहीं हुई।
इस घटना ने वाहनों में लगाए जाने वाले काले शीशों और पर्दों को लेकर भी बहस तेज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही वाहनों में अत्यधिक काले शीशों के इस्तेमाल पर रोक लगा चुका है। इसके बावजूद दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई हिस्सों में ऐसे वाहन आसानी से सड़कों पर नजर आते हैं।
खासतौर पर स्लीपर बसों में पर्दों के कारण अंदर की गतिविधियां बाहर से दिखाई नहीं देतीं। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर नियमों का उद्देश्य यात्रियों की सुरक्षा और सड़क पर निगरानी सुनिश्चित करना है, तो उनका पालन आखिर कितनी गंभीरता से कराया जा रहा है।
दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर रोजाना बड़ी संख्या में बसें और दूसरे व्यावसायिक वाहन चलते हैं। परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर कार्रवाई की जाती है।
चालान भी किए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जुर्माना लगाने से समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है। अगर किसी वाहन में प्रतिबंधित काले शीशे या पर्दे पाए जाते हैं, तो उसकी दोबारा सड़क पर वापसी रोकने के लिए ज्यादा प्रभावी कार्रवाई की जरूरत महसूस होती है।
पुलिस के अनुसार, पीड़ित किशोरी उत्तर प्रदेश के मैनपुरी की रहने वाली है। परिवार में विवाद के बाद वह बिना बताए नोएडा में रहने वाले अपने रिश्तेदार के घर जाने के लिए बस से निकली थी। भारी बारिश और अंधेरे के बीच वह परी चौक पर उतर गई और इसके बाद नोएडा जाने के लिए वाहन का इंतजार कर रही थी।
इसी दौरान एक खाली स्लीपर बस वहां से गुजरी। पुलिस के मुताबिक, ड्राइवर और कंडक्टर ने उसे बस में बैठाया और बताया कि बस नोएडा सेक्टर-63 की ओर जा रही है।
आरोप है कि बस आगे बढ़ने के बाद कंडक्टर ने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया। विरोध करने पर उसे धमकी दी गई। मामले की जानकारी सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, इस घटना ने कई बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस वाहन में इतनी गंभीर वारदात हुई, उसकी निगरानी रास्ते में क्यों नहीं हो सकी? क्या बस के अंदर सुरक्षा व्यवस्था की कोई जांच नहीं होती? क्या काले पर्दों और बंद खिड़कियों वाले वाहनों की नियमित जांच केवल कागजों तक सीमित है?
यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि सड़क सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
व्यावसायिक वाहनों में नियमों का उल्लंघन मिलने पर केवल चालान काटने के बजाय परिस्थितियों के अनुसार वाहन को जब्त करने और परमिट संबंधी कार्रवाई पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। खासकर उन वाहनों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है, जिनमें यात्रियों की सुरक्षा से समझौता करते हुए प्रतिबंधित पर्दे या शीशे लगाए गए हों।
साथ ही, ऐसे मामलों में वाहन मालिक, चालक और परिचालक की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। यदि कोई बस नियमों का उल्लंघन करते हुए लगातार सड़कों पर चल रही है, तो परिवहन विभाग के रिकॉर्ड और उसकी पूर्व कार्रवाई की भी जांच होनी चाहिए। 47 किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर जिस तरह बस आगे बढ़ती रही, उसने पुलिस पिकेट, परिवहन जांच और स्थानीय निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
काले शीशे और पर्दे केवल वाहन की बनावट या निजी सुविधा का विषय नहीं हैं। जब इनके पीछे यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा कोई अपराध छिप जाता है, तब यह सीधे तौर पर सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा बन जाता है। ऐसे वाहनों की पहचान, नियमित जांच और नियम तोड़ने वालों पर कठोर कार्रवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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