पूर्व CJI रंजन गोगोई का राज्यसभा कार्यकाल खत्म, 6 साल में 53% हाजिरी, न एक सवाल, सिर्फ एक बहस में हिस्सा लिया, जिस पर आज खड़े हो रहे हैं कई सवाल!
भारत में सांसदों को वेतन, भत्ते और कई सुविधाएं दी जाती हैं, ताकि वे अपने दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सकें। वैसे वर्तमान नियमों के अनुसार, एक सांसद को लगभग 1 लाख रुपये प्रतिमाह मूल वेतन मिलता है। इसके अलावा 70,000 रुपये निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और 60,000 रुपये कार्यालय खर्च भत्ता दिया जाता है। इस तरह कुल मासिक नकद भुगतान लगभग 2.3 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
सांसदों को दैनिक भत्ता (डेली अलाउंस) भी मिलता है, जो संसद सत्र या समिति बैठकों में भाग लेने पर लगभग 2,000 रुपये प्रतिदिन होता है। इसके अलावा यात्रा के लिए भी विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। सांसद और उनके परिवार के लिए साल में निश्चित संख्या में हवाई यात्रा मुफ्त होती है, साथ ही रेल यात्रा पूरी तरह नि:शुल्क होती है।
आवास की सुविधा भी महत्वपूर्ण है। सांसदों को दिल्ली में सरकारी आवास दिया जाता है, जिसमें बिजली, पानी और टेलीफोन जैसी सुविधाएं सब्सिडी या मुफ्त होती हैं। इसके अलावा उन्हें एक निश्चित सीमा तक मुफ्त बिजली और पानी मिलता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के तहत सांसद और उनके परिवार को केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (CGHS) के तहत इलाज की सुविधा मिलती है। साथ ही, कार्यकाल पूरा होने के बाद सांसदों को पेंशन भी दी जाती है, जो उनकी सेवा अवधि के अनुसार बढ़ती है।
इन सभी वेतन और सुविधाओं का उद्देश्य सांसदों को आर्थिक चिंता से मुक्त रखकर देश की सेवा के लिए सक्षम बनाना है। लेकिन वही पूर्व CJI रंजन गोगोई के कार्यकाल को देखा जाए, तो मामला कुछ विवादास्पद नजर आता है।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्यसभा में मनोनीत सदस्य के रूप में छह साल का कार्यकाल 16 मार्च 2026 को समाप्त हो गया। उनके कार्यकाल के समापन के साथ ही एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि न्यायपालिका से सीधे राजनीति या विधायिका में आने वाले व्यक्तियों की भूमिका कितनी सक्रिय और प्रभावी रहनी चाहिए।
उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने विदाई संबोधन में गोगोई के कानूनी अनुभव, संवैधानिक समझ और गरिमापूर्ण व्यवहार की सराहना की, लेकिन आंकड़ों पर नजर डालें तो उनका संसदीय कार्यकाल अपेक्षाओं के अनुरूप सक्रिय नहीं रहा।
डिजिटल संसद के आंकड़ों के अनुसार, रंजन गोगोई की राज्यसभा में उपस्थिति मात्र 53 प्रतिशत रही, जो कि सांसदों के औसत 80 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है। खासतौर पर उनके कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में उपस्थिति बेहद सीमित रही, जो लगभग 10 प्रतिशत तक सिमट गई थी। यह आंकड़ा न केवल उनकी सक्रियता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि उन्होंने सदन की नियमित कार्यवाही में अपेक्षाकृत कम भागीदारी निभाई।
संसदीय प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी को देखें तो स्थिति और भी दिलचस्प हो जाती है। पूरे छह वर्षों में उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछा और न ही कोई प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। आमतौर पर संसद में सवाल पूछना और निजी विधेयक लाना सांसदों के लिए सरकार को जवाबदेह बनाने और नीतिगत मुद्दों को उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है। ऐसे में गोगोई का यह रिकॉर्ड उनकी भूमिका को लेकर आलोचना को जन्म देता है।
बहसों में उनकी भागीदारी भी बेहद सीमित रही। उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में केवल एक बार सदन में बोलते हुए हिस्सा लिया, जो कि 2023 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक पर हुई बहस थी। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार के रुख का समर्थन किया और संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ सिद्धांत को “विवादास्पद न्यायशास्त्रीय आधार” बताया। उनके इस बयान ने कानूनी और राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया, क्योंकि यह सिद्धांत भारतीय संविधान की मूल संरचना की रक्षा का आधार माना जाता है।
हालांकि, संसदीय समितियों में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत स्थिर रही। वे अपने पूरे कार्यकाल के दौरान ‘कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय’ से संबंधित संसदीय समिति के सदस्य रहे। यह समिति प्रशासनिक सुधारों और न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़े अहम मुद्दों पर काम करती है, जहां उनके अनुभव का उपयोग होने की संभावना थी, हालांकि इसकी सार्वजनिक चर्चा अपेक्षाकृत कम रही।
रंजन गोगोई की राज्यसभा में नियुक्ति शुरू से ही विवादों में रही थी। मार्च 2020 में, जब उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया, तब यह सवाल उठे थे कि क्या किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश का इतनी जल्दी विधायिका में प्रवेश न्यायपालिका की स्वतंत्रता की धारणा को प्रभावित करता है। आलोचकों ने इसे “रिवॉल्विंग डोर” की तरह देखा, जबकि गोगोई ने खुद इसे न्यायपालिका और विधायिका के बीच एक “मिलन बिंदु” करार दिया था।
अपने कार्यकाल के दौरान कम सक्रियता को लेकर उन्होंने कई बार सफाई भी दी। उनका कहना था कि राज्यसभा में अक्सर होने वाले हंगामे और व्यवधान के कारण सार्थक चर्चा संभव नहीं हो पाती, जिससे वे बोलने से बचते थे। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि वे एक “पेशेवर राजनेता” नहीं हैं, जिन्हें राजनीतिक करियर बनाने के लिए बार-बार सवाल पूछने या बहस में हिस्सा लेने की जरूरत हो।
इसके बावजूद, उनके कार्यकाल का मूल्यांकन करते समय यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक मनोनीत सदस्य से अपेक्षित भूमिका केवल विशेषज्ञता तक सीमित होनी चाहिए या उसे सक्रिय संसदीय भागीदारी में भी दिखना चाहिए। गोगोई के समर्थक मानते हैं कि उनकी उपस्थिति और अनुभव ही पर्याप्त थे, जबकि आलोचकों का कहना है कि संसद में निष्क्रियता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है।
कुल मिलाकर, रंजन गोगोई का राज्यसभा कार्यकाल एक विरोधाभास की तरह सामने आता है—एक तरफ उनका विशाल न्यायिक अनुभव और संवैधानिक समझ, दूसरी ओर संसदीय गतिविधियों में सीमित भागीदारी। उनकी ‘खामोश’ मौजूदगी यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या विशेषज्ञता और सक्रियता के बीच संतुलन बनाना भारतीय लोकतंत्र के लिए अब भी एक चुनौती बना हुआ है।
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