केरल से केरलम तक, अब दिल्ली पर सियासी बहस: ‘इंद्रप्रस्थ’ नाम की मांग क्यों उठी?

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केरल से केरलम तक, अब दिल्ली पर सियासी बहस: ‘इंद्रप्रस्थ’ नाम की मांग क्यों उठी?

1. केरल के बाद दिल्ली पर नाम बदलने की चर्चा

हाल ही में राज्य का नाम Kerala से बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद देश में नाम परिवर्तन को लेकर नई बहस छिड़ गई है। इसी कड़ी में अब राष्ट्रीय राजधानी Delhi के नाम को लेकर भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

भारतीय जनता पार्टी के सांसद Praveen Khandelwal ने दिल्ली का नाम बदलकर ‘इंद्रप्रस्थ’ रखने की मांग उठाई है। उन्होंने इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah को औपचारिक पत्र भी लिखा है।

2. ‘इंद्रप्रस्थ’ नाम के पीछे क्या है तर्क?

प्रवीण खंडेलवाल का कहना है कि ‘दिल्ली’ नाम मध्यकालीन और औपनिवेशिक दौर की छाप लिए हुए है, जबकि ‘इंद्रप्रस्थ’ भारत की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है।

उनके अनुसार, नाम परिवर्तन केवल शब्दों का बदलाव नहीं होता, बल्कि यह इतिहास और पहचान को पुनर्स्थापित करने का प्रयास होता है। समर्थकों का मानना है कि इंद्रप्रस्थ नाम अपनाने से राजधानी को उसकी प्राचीन भारतीय जड़ों से जोड़ा जा सकेगा

3. महाभारत काल से जुड़ाव और ऐतिहासिक बहस

भारतीय पौराणिक ग्रंथ Mahabharata में इंद्रप्रस्थ का उल्लेख पांडवों की राजधानी के रूप में मिलता है, जिसे खांडवप्रस्थ वन को साफ करने के बाद बसाया गया था। कई इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का मानना है कि आज की दिल्ली का भौगोलिक क्षेत्र प्राचीन इंद्रप्रस्थ से मेल खाता है।

दिल्ली के Purana Qila क्षेत्र में हुई खुदाइयों में मिली वस्तुएं इस बात के संकेत देती हैं कि यहां हजारों वर्षों से मानव बसावट रही है। हालांकि, यह भी सच है कि आधुनिक दिल्ली और इंद्रप्रस्थ के बीच सीधा और निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाण आज भी शोध और बहस का विषय बना हुआ है।

4. दिल्ली के नामों का सफर और देश में मिसालें

इतिहास गवाह है कि दिल्ली कई बार बसाई गई, उजाड़ी गई और नए नामों से जानी गई। समय-समय पर इसके नाम इंद्रप्रस्थ, दिल्लिका, दहली, यशोधरा, तुगलकाबाद, शाहजहानाबाद और अंततः नई दिल्ली रहे। धीरे-धीरे ‘दिल्ली’ नाम ही सबसे अधिक प्रचलित और आधिकारिक बन गया।

नाम बदलने के समर्थक यह तर्क देते हैं कि जैसे बॉम्बे से मुंबई, कलकत्ता से कोलकाता, मद्रास से चेन्नई और इलाहाबाद से प्रयागराज किया गया, उसी तरह दिल्ली का नाम भी उसकी ऐतिहासिक पहचान के अनुरूप बदला जा सकता है।

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सवाल पॉलिटिक्सवाला

दिल्ली का नाम बदलने की मांग केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और राजनीति से जुड़ा विषय है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रस्ताव केवल बहस तक सीमित रहता है या वास्तव में राजधानी की पहचान में कोई बड़ा बदलाव आता है।

 

 

 

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