धुरंधर 2 ने नोटबंदी को राष्ट्रीय सुरक्षा ऑपरेशन के रूप में दिखाकर नई बहस छेड़ दी है। फिल्म ने सरकार की पुरानी चुप्पी तोड़ते हुए लोगों को उस दौर की वास्तविक परेशानियों और फैसले के प्रभाव को फिर याद दिला दिया है।
भारत में सिनेमा हमेशा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को आकार देने का एक प्रभावी जरिया भी रहा है। हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘धुरंधर 2’ इसी परंपरा का एक नया उदाहरण बनकर सामने आई है।
लेकिन इस बार बहस का केंद्र सिर्फ कहानी या अभिनेता नहीं, बल्कि घटना है जिसे फिल्म ने अपने तरीके से पेश करने की कोशिश की है जिकसा नाम है नोटबंदी।
फिल्म का सबसे विवादित पहलू यह है कि वह 2016 की नोटबंदी को एक गुप्त राष्ट्रीय सुरक्षा ऑपरेशन के रूप में पेश करती है। कहानी के मुताबिक, भारत में बड़े पैमाने पर नकली नोटों के जरिए एक साजिश रची जा रही थी,
और नोटबंदी उस साजिश को खत्म करने के लिए उठाया गया कदम था। यह सीन दर्शकों के सामने एक ऐसा नैरेटिव रखती है, जो वास्तविक घटनाओं से काफी अलग है और यहीं से विवाद शुरू होता है।
असल सवाल यह नहीं है कि फिल्म क्या दिखाती है, बल्कि यह है कि वह दर्शकों की याददाश्त के साथ क्या करती है। नोटबंदी कोई दूर की घटना नहीं थी, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के जीवन का अनुभव रही है।
8 नवंबर 2016 की रात को हुए ऐलान ने देश भर में अचानक एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी, जहां लोग अपनी ही जमा पूंजी के लिए बैंकों और एटीएम की कतारों में खड़े हो गए थे। छोटे व्यवसाय ठप हो गए, दिहाड़ी मजदूरों की आय रुक गई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा।
फिल्म इन अनुभवों को नज़रअंदाज़ करते हुए एक वैकल्पिक कहानी गढ़ती है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और देशभक्ति के नाम पर इस निर्णय को एक “मास्टरस्ट्रोक” के रूप में स्थापित किया जाता है। यह वही बिंदु है जहाँ सिनेमा और हकीकत के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि फिल्म में जिस खतरे को आधार बनाया गया है नकली करेंसी का व्यापक प्रसार वह हकीकत आंकड़ों के मुकाबले बहुत बड़ा दिखाया गया है।
उपलब्ध आर्थिक रिपोर्टों के अनुसार, उस समय कुल चलन में मौजूद मुद्रा में नकली नोटों की हिस्सेदारी बेहद मामूली थी। इसके बावजूद फिल्म इस खतरे को इतना बड़ा बना देती है कि नोटबंदी एक अनिवार्य और तत्काल कार्रवाई के रूप में नजर आने लगती है।
यहीं से यह सवाल उठता है कि क्या सिनेमा को किसी भी घटना की व्याख्या करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, खासकर तब जब वे घटनाएं हाल की हों और उनका असर आज भी समाज में महसूस किया जा रहा हो।
फिल्म का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि वह भावनात्मक और सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके अपनी बात को मजबूत करती है। धार्मिक उद्धरण, देशभक्ति से भरे डायलॉग और एक्शन सीन, जिसमें दर्शक कहानी के प्रभाव में आ जाते हैं और जो देखते हैं सही मान लेते हैं। इस प्रक्रिया में तथ्य और कल्पना के बीच का अंतर और भी धुंधला हो जाता है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह सिनेमा किसी समस्या या बड़ी घटना को सही ठहराने का जरिया बन जाती है। नोटबंदी जैसे फैसले का मूल्यांकन आंकड़ों, नीतिगत प्रभाव और सामाजिक परिणामों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक अपील या काल्पनिक कथाओं के जरिए।
दरअसल, नोटबंदी के प्रभावों की बात करें तो कई आर्थिक अध्ययनों ने इस कदम के मिश्रित परिणाम बताए हैं। जहां एक तरफ डिजिटल भुगतान में वृद्धि देखी गई,
वहीं दूसरी तरफ असंगठित क्षेत्र जो भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है को भारी नुकसान झेलना पड़ा। छोटे व्यापार, किसान और मजदूर वर्ग इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी के बाद लगभग पूरी मुद्रा वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आई थी। इसका मतलब यह हुआ कि काले धन को खत्म करने का जो प्रमुख उद्देश्य बताया गया था, वह पूरी तरह हासिल नहीं हो सका।
ऐसे में जब एक फिल्म इस पूरी प्रक्रिया को एक सफल और योजनाबद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा ऑपरेशन के रूप में पेश करती है, तो यह स्वाभाविक है कि उस पर सवाल उठेंगे।
फिल्म का एक अप्रत्यक्ष प्रभाव यह भी है कि उसने उस चुप्पी को तोड़ दिया है, जो पिछले कुछ वर्षों से नोटबंदी के मुद्दे पर बनी हुई थी। राजनीतिक स्तर पर इस विषय पर कम ही चर्चा होती रही है, लेकिन फिल्म के जरिए यह मुद्दा फिर से सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है।
यह स्थिति अपने आप में दिलचस्प है। एक तरफ फिल्म को मनोरंजन के तौर पर देखा जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ यह एक राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को फिर से जीवित कर देती है।
दर्शकों की प्रतिक्रिया भी इसी द्वंद्व को दर्शाती है। कुछ लोग इसे एक साहसी और देशभक्ति से भरी फिल्म मानते हैं, जबकि अन्य इसे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने वाला प्रयास बताते हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज के समय में दर्शक पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए लोग तुरंत जानकारी की जांच कर सकते हैं और अपनी राय बना सकते हैं।
ऐसे में किसी भी फिल्म के लिए यह आसान नहीं है कि वह पूरी तरह से एकतरफा नैरेटिव स्थापित कर सके।
फिर भी, धुरंधर 2 यह दिखाती है कि सिनेमा अब भी लोगों की सोच और यादों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। खासकर तब, जब वह हाल की घटनाओं को नए तरीके से पेश करता है।
यह फिल्म सिर्फ एक अनुभव नहीं रह जाती, बल्कि यह एक बड़े सवाल को जन्म देती है क्या हम अपने हालिया इतिहास को तथ्यों के आधार पर याद रखते हैं, या फिर कहानियों और भावनाओं के जरिए उसे नए रूप में स्वीकार कर लेते हैं?
नोटबंदी जैसे फैसले का असर आज भी देश की अर्थव्यवस्था और समाज में महसूस किया जा सकता है। ऐसे में जरूरी है कि उस पर चर्चा तथ्यों और अनुभवों के आधार पर हो, न कि केवल कल्पना या प्रचार के जरिए।
धुरंधर 2 ने शायद अनजाने में यही काम किया है उसने एक पुराने मुद्दे को फिर से सामने ला दिया है और लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि असल में क्या हुआ था और हमें उसे कैसे याद रखना चाहिए।
और शायद यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है!
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