असम में सियासत का फेरबदल: टिकट काटे जाने पर पावर मंत्री ने छोड़ा भाजपा का साथ! कांग्रेस का थामा हाथ!
असम विधानसभा चुनाव 2021 के आसपास की सियासत ने एक नया मोड़ ले लिया है, जिसने राज्य की राजनीतिक धरातल को हिला दिया है। आमतौर पर देखा जाता है कि चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के नेता सत्ता की लालसा में भाजपा में शामिल होते हैं, लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल उलट है।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार में शामिल पावर मंत्री नंदिता गोरलोसा ने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का ‘हाथ’ थाम लिया है। यह घटना उस समय हुई है जब चुनाव तारीखों की घोषणा हो चुकी है और मतदान की कवायद तेज हो गई है।
यह फैसला भाजपा के लिए उस समय बड़ा झटका बना है, जब पार्टी अपने “जन आशीर्वाद” और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है। आइए जानते हैं कि आखिर इस ‘गेम पलट’ के पीछे क्या सच्चाई है और इसका असर चुनाव पर क्या पड़ेगा।
नंदिता गोरलोसा के भाजपा छोड़ने से पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से खुद जाके उनसे बात की थी उन्हें मनाने की कोशिश की थी लेकिन नंदिता नहीं मानी और भाजपा का साथ छोड़ दिया।
टिकट बंटवारे का विवाद और पद का त्याग
असम की राजनीति में इस घटना को एक अपवाद माना जा रहा है। दरअसल, भाजपा ने चुनावी सर्वेक्षणों और अपनी आंतरिक रणनीति के तहत नंदिता गोरलोसा को इस बार टिकट देने से इनकार कर दिया। पार्टी द्वारा टिकट न मिलने पर नंदिता ने नाराजगी जाहिर करते हुए न केवल पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया, बल्कि मंत्री पद का त्याग भी कर दिया।
यह भी बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, जो असम की सत्ता की कुंजी माने जाते हैं, उन्होंने खुद नंदिता को समझाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की कि पार्टी में उनका सम्मान बना रहेगा और उन्हें छोड़ने की जरूरत नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि एक सत्ताधारी मंत्री के लिए टिकट न मिलना एक बड़ा राजनीतिक संदेश था।
नंदिता ने सीएम की बात नहीं मानी और उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ा जोखिम लेते हुए कांग्रेस का रुख किया।
कांग्रेस की सटीक रणनीति और ‘त्याग’ की राजनीति
कांग्रेस प्रबंधन ने इस मौके का सुनहरा फायदा उठाया। पार्टी को पता था कि दीमा हसाओ क्षेत्र में नंदिता का व्यक्तिगत प्रभाव किसी भी पार्टी के प्रतीक से बड़ा है। इसीलिए, कांग्रेस ने तुरंत फैसला लेते हुए हाफलांग सीट से अपने मूल घोषित उम्मीदवार निर्मल लंगथासा को वापस बुला लिया।
यह एक बड़ा राजनीतिक कदम था, जहां कांग्रेस ने अपने पुराने वफादार नेता का त्याग करके एक ‘जीतने वाले उम्मीदवार’ को प्राथमिकता दी।
कांग्रेस की इस रणनीति ने भाजपा को साफ पछाड़ दिया, क्योंकि भाजपा ने टिकट काटकर जो खालीपन पैदा किया, उसे कांग्रेस ने तुरंत भर लिया। अब नंदिता गोरलोसा उसी सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं जहां से वह पिछली बार भाजपा के लिए जीती थीं।
संवेदनशील जनजातीय समीकरण और छठी अनुसूची का असर
यह घटना भाजपा के लिए इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि नंदिता गोरलोसा केवल एक नेता नहीं, बल्कि दीमा हसाओ स्वायत्त पर्वतीय जिले की स्थानीय पहचान हैं।
यह क्षेत्र संविधान की छठी अनुसूची के तहत आता है, जहां जनजातीय समुदाय के हितों को लेकर गहरी संवेदनशीलता होती है। नंदिता का जन्म हाफलांग में हुआ है और वे इस इलाके की धरती पुत्री मानी जाती हैं।
भाजपा ने इस सीट पर रूपाली लंगथासा को टिकट दिया है, लेकिन नंदिता के जाने के बाद यह मैदान उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। यहां के मतदाता अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा स्थानीय पहचान और नेता की पहुंच को महत्व देते हैं।
मंत्री पद से इस्तीफा देकर विपक्ष में शामिल होना जनजातीय मतदाताओं के बीच सहानुभूति का कारण बन सकता है।
भाजपा की ‘नए चेहरे’ की रणनीति का बैकफायर?
भाजपा के फैसले के पीछे राजनीतिक जांचकर्ता दो वजहें मान रहे हैं। पहला, पार्टी को लगा होगा कि विरोधी दलों के गठबंधन के कारण नंदिता की जीत मुश्किल हो सकती है, या दूसरा, पार्टी ने अपनी स्थापित नीति के तहत ‘नए चेहरे’ (New Faces) लाने का फैसला किया होगा ताकि विरोध कम हो।
लेकिन, इस रणनीति ने पलटकर पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। एक सत्ताधारी मंत्री का चुनाव से ठीक पहले विपक्ष में जाना पार्टी के ‘विकासवादी’ चेहरे पर भी सवालिया निशान लगाता है।
कांग्रेस ने इसका पूरा राजनीतिक लाभ उठाते हुए आरोप लगाया कि भाजपा सरकार आदिवासियों की जमीन कॉर्पोरेट कंपनियों को दे रही है और जनजातीय नेताओं का सम्मान नहीं करती। इस आरोप के बीच नंदिता का कद कांग्रेस के लिए मजबूती लाया है।
गठबंधन की गतिशीलता और सीटों का गणित
असम में सीटों के गणित को देखें तो कुल 126 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस 100 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार रही है, जबकि उसने कई क्षेत्रीय दलों के साथ महागठबंधन का रास्ता अपनाया है। इस गठबंधन के सामने सत्ता को बचाने की चुनौती है।
हाफलांग सीट जीतने वाली नंदिता गोरलोसा के कांग्रेस में शामिल होने से एक सीट का अंतर भी राज्य की सत्ता के समीकरण बदल सकता है। यह घटना साबित करती है कि चुनाव से ठीक पहले ‘स्थानीय नेतृत्व’ की अनदेखी करना बड़ी राजनीतिक कीमत चुकाने पर आ सकती है।
अब 9 अप्रैल को होने वाले मतदान और 4 मई को आने वाले नतीजों में यह देखना होगा कि क्या नंदिता का यह दलबदल असम की सत्ता की राह बदल देता है।
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पॉलिटिक्सवाला के लिए सोनम सिंह की रिपोर्ट
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