पति का पत्नी पर बेवफाई का आरोप, बच्चे के ‘पैटरनिटी टेस्ट’ जांच पर SC की टिप्पणी! पत्नी से कहा यदि लॉयल तो डर किस बात का!
तलाक से जुड़े एक मामले में बच्चे के पितृत्व यानी पैटरनिटी टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी चर्चा में है।
मामले में पत्नी ने बच्चे का DNA टेस्ट कराने का विरोध किया था, जबकि पति का कहना था कि पत्नी पर लगाए गए बेवफाई के आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए DNA जांच जरूरी है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला से सवाल किया कि अगर वह अपने वैवाहिक जीवन में वफादार रही हैं तो फिर बच्चे के पितृत्व परीक्षण पर आपत्ति क्यों है।
मामला पति-पत्नी के बीच चल रहे तलाक विवाद से जुड़ा है। पति ने पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाते हुए बच्चे के जैविक पिता होने को लेकर भी संदेह जताया। उसका कहना था कि इन आरोपों को साबित करने के लिए DNA टेस्ट महत्वपूर्ण हो सकता है।
वहीं महिला की ओर से अदालत में इस जांच का विरोध किया गया और कहा गया कि पति की तलाक याचिका पर फैसला बच्चे का पैटरनिटी टेस्ट कराए बिना भी किया जा सकता है।
इस मामले में पुणे की फैमिली कोर्ट ने पति की मांग पर बच्चे का DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया था।
इसके बाद मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा, जहां निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा गया। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और बच्चे का पितृत्व परीक्षण कराने के फैसले को चुनौती दी।
पति की ओर से यह भी दावा किया गया कि उसने निजी स्तर पर हैदराबाद की एक लैब में DNA जांच कराई थी।
रिपोर्ट में उसके बच्चे का जैविक पिता होने की संभावना शून्य बताई गई। इसी आधार पर पति का कहना था कि DNA टेस्ट इस विवाद की सच्चाई सामने लाने के लिए जरूरी है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने मामले को और चर्चा में ला दिया।
कोर्ट ने सवाल किया कि अगर महिला अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह वफादार रही है तो उसे DNA टेस्ट से आपत्ति क्यों होनी चाहिए। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि पति के लगाए गए आरोपों की जांच और बच्चे के पितृत्व से जुड़े तथ्य को सामने लाने के लिए DNA जांच इस मामले में कितनी जरूरी है।
हालांकि, इस मामले को यह समझना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने हर तलाक या वैवाहिक विवाद में बच्चे का DNA टेस्ट अनिवार्य कर दिया है।
ऐसे मामलों में अदालत परिस्थितियों, उपलब्ध सबूतों, बच्चे के हित और उसकी निजता जैसे पहलुओं पर विचार करती है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि बच्चे को पति-पत्नी के विवाद में अनावश्यक रूप से नहीं घसीटा जाना चाहिए और DNA टेस्ट का आदेश सामान्य तरीके से नहीं दिया जाना चाहिए।
बच्चे का पितृत्व केवल पति-पत्नी के बीच विवाद का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध बच्चे की पहचान और निजता से भी जुड़ा होता है। इसलिए अदालत के सामने यह संतुलन बनाना जरूरी होता है कि किसी मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए वैज्ञानिक जांच कितनी आवश्यक है और उसका बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे एक बार फिर वैवाहिक विवादों में DNA टेस्ट के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज हो गई है।
एक तरफ पति का दावा है कि DNA जांच से पितृत्व को लेकर स्थिति साफ हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ पत्नी बच्चे की निजता और अपने अधिकारों का हवाला देते हुए इस जांच का विरोध कर रही है।
इस पूरे मामले ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि वैवाहिक विवाद में पति या पत्नी के आरोपों को साबित करने के लिए बच्चे को वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए या नहीं। अदालतों के सामने ऐसे मामलों में केवल पति-पत्नी के अधिकार ही नहीं, बल्कि बच्चे के हित और उसकी गरिमा का सवाल भी महत्वपूर्ण होता है।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब सबकी नजर आगे की कानूनी कार्यवाही पर है। इस मामले में अदालत के अंतिम रुख से यह स्पष्ट होगा कि संबंधित परिस्थितियों में DNA टेस्ट को किस तरह देखा जाता है और बच्चे के पितृत्व से जुड़े सवाल को तलाक की कार्यवाही में कितना महत्व दिया जाता है।
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