नरवर किले से इतिहास की चोरी: क्या सरकारी लापरवाही ने तोप तस्करों के लिए रास्ता खोल दिया?

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नरवर किले से इतिहास की चोरी: क्या सरकारी लापरवाही ने तोप तस्करों के लिए रास्ता खोल दिया?

मध्य प्रदेश में चोरों के हौसले इन दिनों इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब उनके निशाने पर सिर्फ घर या दुकानें नहीं, बल्कि सीधे तौर पर देश का गौरवशाली इतिहास आ गया है। जी हां, शिवपुरी के ऐतिहासिक नरवर किले से इतिहास चोरी हो गया है। वह इतिहास, जिसने चार सौ साल का लंबा सफर तय किया; जिसने राजाओं का दौर देखा, साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा, लेकिन अफ़सोस कि वह आज की सरकारी लापरवाही के आगे टिक नहीं सका।

किले की सुरक्षा को धत्ता बताते हुए 400 साल पुरानी ऐतिहासिक तोप को 25 से 30 हथियारबंद बदमाश लोडिंग वाहनों में भरकर अपने साथ ले गए। सबसे शर्मनाक बात यह है कि जिस अनमोल धरोहर की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार और पुरातत्व विभाग के कंधों पर थी, वह बदमाशों के लिए सबसे आसान शिकार बन गई।

रेकी से लेकर लोडिंग तक सोता रहा प्रशासन

जरा सोचिए, यह कोई सोने की चेन या मोबाइल नहीं था, जिसे जेब में डालकर चुपके से भाग जाया जाए। यह कई क्विंटल वजनी एक विशाल ऐतिहासिक तोप थी। जाहिर है कि इसे उठाने के लिए बाकायदा योजना बनी होगी, कई दिनों तक रेकी की गई होगी, भारी वाहन बुलाए गए होंगे और फिर पूरी तैयारी के साथ इस दुस्साहसिक वारदात को अंजाम दिया गया होगा।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सवाल यह उठता है कि आखिर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही थीं? हैरानी की बात तो यह है कि यह तोप करीब 12 दिन पहले अपने मुख्य स्थान से नीचे गिर गई थी। यानी जिम्मेदार प्रशासन के पास पूरे 12 दिन का लंबा वक्त था। वह चाहता तो इसे किसी सुरक्षित कमरे में रखवा सकता था, किले की सुरक्षा बढ़ा सकता था या इसे जिला मुख्यालय पहुंचा सकता था। लेकिन ऐसा लगता है कि जिम्मेदार विभाग को अपनी ऐतिहासिक धरोहरों से ज्यादा फिक्र सरकारी फाइलों और कागजी औपचारिकता की थी।

अंतरराष्ट्रीय हेरिटेज तस्कर गिरोह का साया!

सूत्रों के मुताबिक, अब पुलिस को यह आशंका है कि इस बड़ी चोरी के पीछे किसी अंतरराष्ट्रीय हेरिटेज तस्कर गिरोह का हाथ हो सकता है। दुनिया भर के ब्लैक मार्केट और विदेशों में भारत की ऐसी दुर्लभ ऐतिहासिक वस्तुओं की कीमत करोड़ों रुपये में लगती है। अगर पुलिस की यह आशंका सच साबित होती है, तो यह सिर्फ एक सामान्य चोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत की अंतरराष्ट्रीय तस्करी का एक बहुत बड़ा और गंभीर नेटवर्क है।

इतिहास पूछ रहा है, मेरी रखवाली कौन करेगा?

नरवर किले की यह वारदात व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक ऐतिहासिक और सुरक्षित माने जाने वाले किले में रखी 400 साल पुरानी तोप गायब हो सकती है, तो आखिर देश की बाकी धरोहरें किस भरोसे और किसके सहारे सुरक्षित हैं? क्या हम आधुनिक दौर में अपने समृद्ध इतिहास को बचाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं?

आज नरवर किले से सिर्फ एक ऐतिहासिक तोप गायब नहीं हुई है, बल्कि हमारी लचर व्यवस्था की नाकामी भी सरेआम बेनकाब हुई है। सच तो यह है कि “जिस इतिहास को दुश्मन चार सौ साल में नहीं लूट पाए, उसे आज सरकारी लापरवाही ने चोरों के हवाले कर दिया।” अब हमारा इतिहास चीख-चीख कर पूछ रहा है कि आखिर मेरी रखवाली कौन करेगा?

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