कैसे एक व्हिसलब्लोअर ने भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया और राम मंदिर के शीर्ष प्रबंधन पर उंगलियाँ उठाईं
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले का भेद खोलने वाला व्यक्ति कौन था और किसने 5 साल पहले ही चोरी के बारे में शीर्ष प्रबंधन को अवगत करा दिया था. मगर आरोपियों पर कार्रवाई करने के बजाय उसे ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 9 जून, 2026 को वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के यूट्यूब चैनल ‘टॉप सीक्रेट’ पर दिए गए एक साक्षात्कार में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व अकाउंटेंट महिपाल सिंह ने एक बड़ा खुलासा किया.
उन्होंने बताया कि अयोध्या के इस भव्य राम मंदिर की लेखांकन प्रक्रिया (अकाउंटिंग प्रोसेस) में गंभीर खामियां हैं, जहाँ रोज़ाना होने वाले वित्तीय ऑडिट या जवाबदेही का कोई ठोस तंत्र मौजूद नहीं है.
महिपाल सिंह (जिनका परिवार कोटा, राजस्थान में आरएसएस के काफी करीब रहा है और जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी) ने दावा किया कि मंदिर के दान में कथित चोरी का मामला सबसे पहले 2021 में उनके सामने आया था. जब उन्होंने इस बात की शिकायत ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और आमंत्रित सदस्य गोपाल राव से की, तो इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.
इसके विपरीत, उन्हें ट्रस्टी अनिल मिश्रा द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से हटाकर उनकी जगह एक नए व्यक्ति को नियुक्त कर दिया गया. विवाद बढ़ने के बाद चंपत राय ने इस्तीफा दे दिया और गोपाल राव को बैठकों से दूर रहने के लिए कहा गया है.
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अयोध्या के स्थानीय संतों, पीठाधीश्वरों और महंतों में ट्रस्ट के व्यवहार को लेकर गहरा असंतोष है. दंत धावन कुंड आचारी मंदिर के मुख्य पुजारी, महंत विवेक आचारी ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों का रवैया धीरे-धीरे स्थानीय धार्मिक गुरुओं के प्रति बेहद असभ्य और उपेक्षापूर्ण हो गया.
जनवरी 2024 के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह और नवंबर 2025 के ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान अयोध्या के प्रतिष्ठित धर्माचार्यों को मुख्य मंच से दूर एक तरफ बैठाया गया, जो कि ‘राम की मर्यादा’ के खिलाफ है.
मंदिर के भीतर प्रशासक गोपाल राव का इतना कड़ा नियंत्रण और हुक्म चलता था कि पुजारियों को बिना उनकी अनुमति के श्रद्धालुओं को एक तुलसी का पत्ता, फूल या चरणामृत तक देने की मनाही थी. यहाँ तक कि पुजारियों को पारंपरिक आदरसूचक नामों (जैसे पांडे जी या चौबे जी) के बजाय केवल ‘पुजारी’ कहकर पुकारने का सख्त नियम बनाया गया था.
इन अव्यवस्थाओं और कथित भ्रष्टाचार के कारण महंत विवेक आचारी ने मांग की है कि मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराई जानी चाहिए, ताकि निर्दोष अयोध्यावासियों के माथे से इस कलंक को धोया जा सके.
इस विवाद में ट्रस्टी पद से इस्तीफा देने वाले अनिल मिश्रा की भूमिका और पृष्ठभूमि विशेष रूप से जांच के दायरे में है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के जिला सचिव सूर्य कांत पांडे ने इस संबंध में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखकर आपत्ति जताई है. पांडे के अनुसार, 1990 के दशक में एक साधारण परिवार से आने वाले होम्योपैथिक डॉक्टर अनिल मिश्रा, जो संघ की गतिविधियों से जुड़े थे, उनके पास अयोध्या में दो कमरों का एक साधारण मकान था. लेकिन 2020 में ट्रस्ट का सदस्य बनने के बाद उनकी संपत्तियों में अचानक भारी इजाफा हुआ और उन्होंने कई नए फ्लैट व संपत्तियां खरीदीं.
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की प्रारंभिक रिपोर्ट (जो 6 जुलाई को सार्वजनिक हुई) में भी अनिल मिश्रा पर उंगली उठाई गई है. रिपोर्ट के अनुसार, वह मंदिर की मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के लिए जिम्मेदार थे. उन्हें यह अच्छी तरह पता था कि मंदिर के भीतर बिना तलाशी (फ्रिस्किंग) के लोगों को जाने दिया जा रहा है, जिससे चोरी का खतरा था. इसके बावजूद उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था और तलाशी को लेकर कोई लिखित निर्देश जारी नहीं किए.
इस विवाद के सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं को रेखांकित करने के लिए दो प्रमुख विचारकों की पुस्तकों का संदर्भ दिया गया है:
सुनील खिलनानी (द आइडिया ऑफ इंडिया, 1997): इन्होंने अयोध्या में राम जन्मभूमि परियोजना को भारत में एक “हिंदू वेटिकन” के निर्माण के रूप में देखा, जिसे दक्षिणपंथी ताकतों ने भारत को उसके गौरवशाली अतीत से जोड़ने के एक राजनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल किया. सिद्धार्थ देब (ट्विलाइट प्रिजनर्स, 2024): इन्होंने इसे भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक परियोजना बताया.
उनके अनुसार, मंदिर निर्माण के राष्ट्रव्यापी अभियान से भले ही हिंदू दक्षिणपंथ का उभार हुआ हो, लेकिन जमीनी स्तर पर अयोध्या की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस भव्य आयोजन और इसके राजनीतिक लाभ को अपने विशिष्ट नेतृत्व के साथ आगे बढ़ाया.
कुल मिलाकर, राम मंदिर के फंड में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं का यह गंभीर विवाद सामने आए एक महीना बीत चुका है, लेकिन इस राष्ट्रीय और धार्मिक महत्व के संवेदनशील मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से अभी तक कोई भी सार्वजनिक बयान या टिप्पणी नहीं आई है. अब तक नहीं.
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