वक्त बदला….. हालात बदले…अब नरोत्तम मिश्रा का क्या होगा?

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पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा पर यह शेर बिलकुल ठीक बैठता है की-

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे,
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएँ कैसे…

दतिया का ‘अध्याय’ खत्म या तूफान से पहले की शांति? नरोत्तम की ‘मजबूरी’, कैलाश की ‘नो-एंट्री’ और CM की चुप्पी के मायने तो अब क्या माना जाए क्या दतिया का अध्याय अब खत्म हो चुका है? क्या मध्य प्रदेश की राजनीति के सबसे मुखर चेहरों में से एक डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने दिल्ली के फरमान के आगे पूरी तरह सरेंडर कर दिया है?

ये सवाल इसलिए, क्योंकि दतिया उपचुनाव में नरोत्तम का टिकट कटने के बाद जो सियासी भूचाल आया था, अब उस पर धीरे-धीरे ‘सफेद चादर’ डाली जा रही है। कार्यकर्ताओं के इस्तीफे, मान-मनौव्वल और टिकट बदलने की तमाम हवाई चर्चाओं के बीच मध्य प्रदेश के तीन बड़े सूरमाओं के तेवरों ने दतिया की स्क्रिप्ट लगभग बदलकर रख दी है।

सबसे पहले बात उस नेता की, जिसकी पूरी सियासत ही ‘दबंगई’ और ‘बेबाकी’ पर टिकी रही। टिकट कटने के बाद जब नरोत्तम मिश्रा कैमरे के सामने आए, तो उम्मीद थी कि दर्द छलकेगा, लेकिन वहां सिर्फ ‘अनुशासन का प्रवचन’ मिला। नरोत्तम ने कहा:

ये पार्टी का निर्णय है… पेट्रोल और मिट्टी का तेल डालने जैसा काम मत कीजिए… अपनी बात पार्टी फोरम पर रखी जाती है।

जो नेता महीनों से दतिया की जमीन नाप रहा था, जिसने नामांकन फॉर्म तक खरीद लिया था, जो जातीय बैठकें कर जीतने की जुगत रहा था, वो अचानक इतना ‘संत’ कैसे हो गया? न कोई नाराजगी, न बगावत का संकेत, और न ही इस बात का मलाल कि उनके साथ अन्याय हुआ। साफ है, नरोत्तम जानते हैं कि इस समय दिल्ली से टकराने का मतलब राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिए पर जाना है।

रही-सहाय कसर बीजेपी के ‘संकटमोचक’ कहे जाने वाले मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पूरी कर दी। दतिया में टिकट बदलने की अफवाहों पर उन्होंने जो झाड़ू फेरी, उसने नरोत्तम समर्थकों की रही-सही उम्मीदों को भी दफन कर दिया। विजयवर्गीय ने दो टूक कह दिया कि:

“टिकट बहुत लोग मांगते हैं, सबको नहीं मिलता… और बीजेपी टिकट देने के बाद फैसला नहीं बदलती।”

कैलाश का यह बयान दतिया के लिए ‘फुल स्टॉप’ की तरह है। उन्होंने साफ कर दिया कि आशुतोष तिवारी का नाम फाइनल है और बीजेपी में ‘यू-टर्न’ जैसी कोई खिड़की खुली नहीं है। यानी, दतिया सीट पर दोबारा विचार करने का चैप्टर क्लोज हो चुका है।

तीसरी और सबसे दिलचस्प तस्वीर इंदौर से आई है। मीडिया के कैमरों ने सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को घेरा। सवाल दतिया को लेकर ही था। सीएम साहब रुके, मीडिया की तरफ देखा, मुस्कुराए और बिना एक शब्द बोले आगे बढ़ गए।

राजनीति में कभी-कभी ‘मौन’ सबसे ज्यादा शोर करता है। सीएम मोहन यादव की यह चुप्पी बता रही है कि दतिया का फैसला सीधे ‘हाईकमान’ का है, जिसमें न तो राज्य नेतृत्व की दखलंदाजी की कोई गुंजाइश है और ना ही किसी तरह की सफाई देने की जरूरत।

कुल मिलाकर, जो लोग ये उम्मीद लगाए बैठे थे कि दतिया में चौका मारते हुए कोई नया ट्विस्ट आएगा, उनके अरमान अब ठंडे पड़ चुके हैं। पार्टी का फैसला पत्थर की लकीर बन चुका है, नरोत्तम मिश्रा सार्वजनिक तौर पर ‘पार्टी लाइन’ पर चलने को मजबूर हैं और शीर्ष नेतृत्व ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं

लेकिन राजनीति की बिसात पर जो दिखता है, हमेशा वो होता नहीं है। अब सबसे बड़ा और कड़वा क्लॉज यही है क्या नरोत्तम मिश्रा ने मन ही मन इस फैसले को वाकई स्वीकार कर लिया है, या फिर, फिर से समुन्दर ने खुद को पीछे किया है? क्या वो आशुतोष तिवारी के सारथी बनेंगे या दतिया के रण में ‘भीष्म’ की तरह मौन रहकर कोई नया खेल कर जाएंगे?

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