मद्रास हाईकोर्ट ने कहा न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और जजों को किसी ‘होली काउ’ यानी ऐसी पवित्र संस्था की तरह नहीं माना जाना चाहिए, जिस पर सवाल ही न उठाए जा सकें।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब एनसीईआरटी की कक्षा 8 की एक किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’नाम से एक चैप्टर के चलते भयंकर विवाद हुआ था। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने काफी कड़ा रूख दिखाया था। CJI सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था और फिर NCERT को कड़ी फटकार लगाते हुए किताब से इस पूरे चैप्टर को हटाते हुए नई पुस्तकें छापने की बात कही थी। लेकिन अब मद्रास हाईकोर्ट का एक बयान काफी सुर्खियों में है मामला क्या है, क्यों चर्चा में आया.
मुझे लगता है इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को मद्रास हाईकोर्ट से सीख लेनी चाहिए। वैसे लोकतंत्र में अक्सर एक बात काही जाती है कि कोई भी संस्था सवालों से ऊपर नहीं हो सकती। चाहे वह सरकार हो, संसद हो, मीडिया हो या फिर न्यायपालिका। अब इसी बहस के बीच मद्रास हाईकोर्ट की एक टिप्पणी पूरे देश में चर्चा में है। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और जजों को किसी ‘होली काउ’ यानी ऐसी पवित्र संस्था की तरह नहीं माना जाना चाहिए, जिस पर सवाल ही न उठाए जा सकें।
यह टिप्पणी तमिल फिल्म ‘करुप्पु’ को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान आई। फिल्म में अभिनेता सूर्या और तृषा कृष्णन मुख्य भूमिकाओं में हैं। कहानी एक ऐसे किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो वकील के रूप में अदालत व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता हुआ दिखाई पड़ता है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि फिल्म में जजों को रिश्वत लेते और नशे का सेवन करते दिखाया गया है, जिससे न्यायपालिका की छवि खराब होती है और यह अदालत की अवमानना के दायरे में आता है।
लेकिन मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका आलोचना से परे नहीं है। फैसले में यह भी कहा गया कि न्याय कोई ऐसा गुण नहीं है, जो बंद कमरे में रहकर सम्मान प्राप्त करे। लोकतंत्र में संस्थाओं को सम्मानजनक और तर्कसंगत आलोचना का सामना करना ही पड़ता है। अदालत ने माना कि फिल्म का चित्रण काफी नाटकीय है, लेकिन भारतीय सिनेमा, खासकर तमिल फिल्मों में अतिशयोक्ति एक सामान्य शैली है। इसलिए किसी काल्पनिक कहानी को वास्तविक न्यायपालिका पर सीधा हमला नहीं माना जा सकता।
इस फैसले की अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हाल के वर्षों में न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर कई बहसें सामने आई हैं। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और कई कानूनी विशेषज्ञों ने भी समय-समय पर न्यायिक सुधारों की जरूरत पर जोर दिया है। न्यायपालिका में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ, नियुक्तियों को लेकर विवाद और कुछ मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप जैसी चुनौतियां सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रही हैं।
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक और महत्वपूर्ण बात कही कि आलोचना और अवमानना एक जैसी चीजें नहीं हैं। अगर कोई व्यक्ति या कलाकार तथ्य, तर्क और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से किसी संस्था पर सवाल उठाता है, तो उसे तुरंत अवमानना नहीं माना जा सकता। अदालत ने ‘आर्टिस्टिक लाइसेंस’ यानी कलात्मक स्वतंत्रता को भी लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
कुल मिलाकर यह फैसला केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की आलोचना के अधिकार पर एक बड़ा संदेश देता है। हालांकि मामले पर जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और वी.लक्ष्मीनारायणन ने की बेंच ने क्या कहा की न्यायपालिका में “ब्लैक शीप” रहे हैं और मद्रास हाईकोर्ट की फुल कोर्ट समय-समय पर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी करती रही है।
आपको बताया दें की कुछ दिन पहले ही भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी किताब’बेंच पर दादागिरी’की बात का जिक्र किया है। वे अपनी किताब ‘द बेंच, द बार एंड द बिजार’ में वे लिखते हैं कि न्यायिक दादागिरी कई रूप ले लेती है। इससे यह संकेत मिलता है कि कुछ मौकों पर न्यायाधीशों का रवैया सख्त या हावी होने वाला हो सकता है।
लेकिन किसी हाईकोर्ट की बेंच द्वारा खुले तौर पर यह स्वीकार करना कि ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है’ बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट का ऐसा मानना कि भ्रष्ट जज रहे हैं और हैं।…इससे लगता है न्यायपालिका आत्ममंथन के मोड में है और यह अच्छी बात है।
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