एक तरफ रक्षा समझौता, दूसरे तरफ फटेहाल! क्या सऊदी के समर्थन में उतरेगा पाकिस्तान?
पश्चिम एशिया में तेजी से बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। ईरान की ओर से सऊदी अरब पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद हालात और अधिक संवेदनशील हो गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच मौजूद रक्षा सहयोग समझौता फिर चर्चा में आ गया है। इस समझौते के तहत यदि किसी एक देश की सुरक्षा को खतरा होता है तो दूसरा देश सहयोग देने के लिए बाध्य माना जाता है। यही कारण है कि मौजूदा हालात में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा परिस्थिति ने पाकिस्तान के सामने एक जटिल रणनीतिक स्थिति खड़ी कर दी है। एक ओर उसका पुराना सहयोगी सऊदी अरब है, जबकि दूसरी ओर ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा और कई सामरिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस्लामाबाद के सामने यह चुनौती है कि वह किस तरह संतुलन बनाए रखे। इसी बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का सऊदी अरब दौरा इस बहस को और तेज कर गया है।
सूत्रों के अनुसार असीम मुनीर ने रियाद में सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान से मुलाकात की। इस बैठक में ईरान के हमलों, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और संभावित रक्षा सहयोग पर विस्तार से चर्चा हुई। बताया जा रहा है कि दोनों पक्षों ने मौजूदा रक्षा समझौते के तहत संभावित विकल्पों पर भी विचार किया। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों की नजर अब पाकिस्तान की अगली रणनीति पर टिकी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान खुलकर सऊदी अरब के समर्थन में उतरता है तो उसके सामने कई नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। सबसे बड़ी चुनौती ईरान के साथ संबंधों को लेकर होगी, क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से ही संवेदनशील सीमा क्षेत्र मौजूद है। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा सुरक्षा के लिहाज से पहले ही जटिल मानी जाती है, ऐसे में किसी नए सैन्य तनाव का खतरा इस्लामाबाद के लिए गंभीर साबित हो सकता है।
हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तान का अहम सहयोगी रहा है। आर्थिक संकट के दौर में रियाद ने कई बार पाकिस्तान को वित्तीय सहायता दी है और तेल आपूर्ति के माध्यम से भी सहयोग किया है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग काफी मजबूत माना जाता है। इसके बावजूद पाकिस्तान अब तक ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधे पक्ष लेने से बचता रहा है।
पाकिस्तान की आंतरिक परिस्थितियां भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। देश में सुन्नी और शिया दोनों समुदायों की बड़ी आबादी रहती है। ईरान शिया बहुल देश है, जबकि सऊदी अरब सुन्नी नेतृत्व वाला राष्ट्र माना जाता है। यदि पाकिस्तान किसी एक पक्ष के समर्थन में खुलकर सामने आता है तो उसके भीतर सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है। इसलिए सरकार और सेना दोनों ही इस मामले में सावधानी बरतते दिखाई दे रहे हैं।
कुछ समय पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबरों के बाद पाकिस्तान के कई शहरों में शिया समुदाय के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए थे। उस दौरान कुछ स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी सामने आई थीं और अमेरिकी मिशन को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। हालात को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों को हस्तक्षेप करना पड़ा था। इस घटना ने पाकिस्तान की सरकार को यह एहसास करा दिया कि क्षेत्रीय संघर्ष का असर देश के भीतर भी पड़ सकता है।
रणनीतिक दृष्टि से भी पाकिस्तान की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वह एक परमाणु शक्ति है और कई मुस्लिम देशों के बीच उसकी सेना का प्रभाव देखा जाता है। यदि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाता है तो इससे पूरे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है। साथ ही अमेरिका, इजराइल, चीन और रूस जैसे बड़े देशों के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, इसलिए पाकिस्तान का फैसला अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकता है।
हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान फिलहाल सीधे युद्ध में उतरने से बचने की कोशिश करेगा। संभव है कि वह कूटनीतिक समर्थन, सैन्य सलाह या सीमित सहयोग तक ही अपनी भूमिका रखे। असीम मुनीर की हालिया कूटनीतिक सक्रियता को भी इसी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि यदि ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव और बढ़ता है तो पाकिस्तान किस तरह की भूमिका निभाता है। इस्लामाबाद का निर्णय न केवल क्षेत्रीय राजनीति बल्कि पश्चिम एशिया के व्यापक शक्ति समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
कैसे इस दुविधा से बाहर निकलेगा पाकिस्तान, जब हालत पहले ही खस्ता हों..
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