27% ओबीसी आरक्षण मामला: सुप्रीम कोर्ट में एमपी सरकार की गैरहाजिरी, 4 फरवरी को अगली सुनवाई
सुनवाई के दौरान सरकार का कोई वकील मौजूद नहीं
मध्य प्रदेश में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की बड़ी लापरवाही सामने आई। जब प्रकरण सुनवाई के लिए बुलाए गए, तब मध्य प्रदेश सरकार की ओर से एक भी अधिवक्ता कोर्ट में मौजूद नहीं था।
इस पर सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति नरसिंहा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए इसे गंभीर आचरण बताया और इस रवैये पर खेद व्यक्त किया। ओबीसी वर्ग के अधिवक्ताओं के आग्रह पर अब इन मामलों की अगली सुनवाई 4 फरवरी 2026 को होगी।
सीरियल नंबर 106 पर अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध थे मामले
सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी प्रकरण गुरुवार को सीरियल नंबर 106 पर अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध थे। जैसे ही मामलों को कॉल किया गया, यह स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकार की ओर से कोई भी वकील कोर्ट में उपस्थित नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार की गैरमौजूदगी में सुनवाई आगे बढ़ाना संभव नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह का रवैया न्यायिक प्रक्रिया के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाता है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं की नियुक्ति के बावजूद कोर्ट में गैरहाजिरी
ओबीसी वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सहित छह वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नियुक्त कर रखा है।
इसके बावजूद सुनवाई के दिन किसी भी अधिवक्ता का कोर्ट में उपस्थित न होना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने से बचने के लिए लगातार सुनवाई टालने की रणनीति अपना रही है।
बिना किसी स्टे के लागू नहीं हो रहा 27% आरक्षण
मामले का अहम पहलू यह है कि 27% ओबीसी आरक्षण कानून पर न हाईकोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट ने कोई रोक लगाई है। इसके बावजूद राज्य सरकार पिछले एक साल से अधिक समय से इस पर अमल नहीं कर रही है।
आरोप है कि भर्ती विज्ञापनों में 27% आरक्षण का उल्लेख किया जा रहा है, लेकिन नियमों के विपरीत 13 प्रतिशत पद होल्ड कर लिए जा रहे हैं। अब तक हर सुनवाई में सरकार की ओर से समय मांगा जाता रहा, लेकिन इस बार अदालत में अनुपस्थिति ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
ऐसे में अब सभी की निगाहें 4 फरवरी 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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