Uniform Civil Code

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UCC पर NDA में दरार? JDU के विरोध से बढ़ी BJP की चिंता

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UCC को लेकर NDA में अलग-अलग राय सामने आई है। TDP, शिवसेना और HAM समर्थन में हैं, जबकि JDU ने बिहार में इसे लागू नहीं करने की बात कही है।

समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर NDA के भीतर ही अलग-अलग सुर सुनाई देने लगे हैं। केंद्र सरकार की ओर से 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने की तैयारी का संकेत दिया गया है।

इसी बीच NDA के कुछ सहयोगी दल खुलकर इसके समर्थन में आ गए हैं, जबकि बिहार में जनता दल यूनाइटेड ने साफ कर दिया है कि वह राज्य में UCC लागू करने के पक्ष में नहीं है।

गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को कहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और NDA की सरकार वाले 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य है। फिलहाल उत्तराखंड में जनवरी 2025 से UCC लागू है।

इसके अलावा गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में इससे जुड़ा विधेयक विधानसभा से पारित हो चुका है। हालांकि इन राज्यों में इसे पूरी तरह लागू करने के लिए आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होना बाकी है।

UCC को लेकर NDA के भीतर सबसे पहले तेलुगु देशम पार्टी की ओर से समर्थन की बात सामने आई। लोकसभा में TDP के नेता लावू कृष्ण देवरायुलु ने कहा कि पार्टी समान नागरिक संहिता का समर्थन करेगी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कानून लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों के साथ चर्चा और बातचीत जरूरी होगी। खास बात यह है कि TDP पहले इस मुद्दे पर अलग रुख रखती रही है।

बिहार में NDA की प्रमुख सहयोगी JDU ने हालांकि UCC को लेकर अपना पुराना रुख दोहराया है। JDU नेता श्याम रजक के मुताबिक पार्टी देश के स्तर पर UCC का समर्थन करती है, लेकिन बिहार में इसे लागू नहीं होने देगी।

उन्होंने कहा कि पार्टी अपने रुख पर कायम है। इस मुद्दे को लेकर JDU नेता संजय झा की गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात भी प्रस्तावित बताई गई है।

महाराष्ट्र में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना ने भी UCC के समर्थन का ऐलान किया है। शिवसेना नेता श्रीकांत शिंदे ने इसे समानता, न्याय और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा विषय बताया। वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा यानी HAM ने भी अमित शाह के बयान का स्वागत करते हुए समान नागरिक संहिता का समर्थन किया है।

पश्चिम बंगाल में भी UCC को लेकर राजनीतिक हलचल बढ़ रही है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य में इसे लागू करने की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी। हालांकि, बीजेपी की सहयोगी NCPI ने अभी इस मुद्दे पर अपना अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया है और प्रस्ताव आने के बाद चर्चा करने की बात कही है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने NDA के भीतर UCC को लेकर एकराय होने पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि अगर बीजेपी के पास संसद में UCC पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या है तो उसे संसद में ही विधेयक लाना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल किया कि इसे अलग-अलग राज्यों के माध्यम से लागू करने की कोशिश क्यों की जा रही है।

दूसरी तरफ, केरल की मुस्लिम संस्था समस्त केरल जेम-इयातुल उलमा भी UCC के विरोध में है। संस्था के अध्यक्ष मोहम्मद जिफ्री ने कहा है कि सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि ईसाई, बौद्ध और जैन समुदायों के लोग भी समान नागरिक संहिता को लेकर अपनी आपत्तियां रख सकते हैं। उनका तर्क है कि शादी, तलाक और विरासत जैसे कई विषय धार्मिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं।

समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य देश के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में समान नियम लागू करना है। हालांकि, धार्मिक पूजा-पद्धति और आस्था से जुड़े विषय इसके दायरे में सीधे नहीं आते। संविधान और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को कुछ विशेष छूट मिलने की संभावना भी रहती है

किसी राज्य में UCC लागू करने के लिए विधेयक को विधानसभा से पारित कराने के बाद राज्यपाल की मंजूरी और जरूरी अधिसूचना की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। ऐसे में अमित शाह के 21 राज्यों वाले लक्ष्य के बीच अलग-अलग राज्यों और NDA के सहयोगी दलों के रुख पर अब राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। UCC आने वाले समय में NDA के लिए बड़ा राजनीतिक और नीतिगत मुद्दा बन सकता है।

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