फिल्म समीक्षा- सिकंदर

फिल्म समीक्षा- सिकंदर

Sikandar review : कहीं का ‘सि’, कहीं का ‘कंद’ और कहीं का ‘र’

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Film Review – Sikandar

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा ! खोदा पहाड़, निकला छछुंदर !
कहानी क्यों बताऊं? इत्ता बता देता हूं कि राजकोट के पूर्व राजा के लड़के के तीन नाम हैं – सिकंदर, जो उसके दादा ने रखा था, एक नाम है राजा साब, जो जनता कहती है और एक नाम है संजय, जो उसकी दादी मां ने रखा था। यानी संजय नाम के राजा साब सिकंदर हैं। जय राजकोट!
अब राजा है तो रानी भी है। आधी से कम उम्र की। जिसे कोई काम नहीं है सिवाय राजा साब को यह बताने के, कि बहुत काम हो गया। थोड़ा टाइम मुझे भी दे दो। पर राजा साब को लेपटॉप लेकर बहुत काम करना पड़ता है। मारपीट उनका दूसरा काम है, जिसे वे न्याय भी कहते हैं। यूं तो उनके हजारों छर्रे हैं, लेकिन मारपीट का महत्वपूर्ण कार्य वे खुद करना पसंद करते हैं। उनके सामने कोई टिक नहीं पाता। दो-दो सौ लोग भी आ जाएँ तो राजा साब खुद दूसरों का मांजा सूत देते हैं।
राजा साब हर बार लड़ाई के लिए लोकेशन बहुत बढ़िया चुनते हैं। तो हवाई जहाज की बिजनेस क्लास में ही एक शोहदे को मजम्मत कर देते हैं, जो मंत्री का बेटा है। एक बार रेलवे क्रासिंग में दुष्टों को मार मार कर अधमरा कर देते हैं। एक बार मोरबी की खदान के इलाके में बारूद के बीच दे दनादन, दे दनादन! फिर मुंबई की धारावी में न्याय की लड़ाई। एक बार तो अस्पताल परिसर को युद्ध भूमि बनाने की आपदा आन पड़ती है।
राजा साब बड़े कॉम्प्लेक्स में रहते हैं। बोलते भी हैं कि उसकी जान बचाने के लिए बहुत कम उम्र की कन्या से शादी की थी। असल में रानी बार-बार राजा साब की जान बचाती है और राजा साब के लिए ही प्राण तज देती है। लेकिन रानी साहिबा मर कैसे सकती हैं? वे ऑर्गन डोनेशन का वचन पत्र भर चुकी हैं तो उनकी आँखें, गुर्दे और दिल किसी और को डोनेट की जाती है। एक रानी साहिबा तीन-तीन लोगों को नया जीवन देती हैं। इस ऑर्गन डोनेशन के साथ ही फिल्म पवित्र दौर में आ जाती है।
फिल्म के डायरेक्टर गजनी डायरेक्ट कर चुके हैं। उनको मारपीट और एक्शन दिखाने का अच्छा एक्सपीरियंस है। अब हीरो को मारपीट करने के लिए कोई तो चाहिए। बाहुबली को तो कटप्पा मार ही चुका था, इसलिए फिल्म में कटप्पा की एंट्री होती है (क्योंकि वो तो जिन्दा था ही) तो खलनायक का काम सत्यराज यानी कटप्पा के जिम्मे। वही कटप्पा, जिसने महिष्मति साम्राज्य के सिंहासन के गुलाम का रोल किया था, महाराष्ट्र में मंत्री है। अब होती है भूतपूर्व राजा और वर्तमान मंत्री की अभूतपूर्व अदावत। जिसमें तीन जान के लिए दर्जनों लोग मारे जाते हैं।

फिल्म के तीन सन्देश :

1. ऑर्गन डोनेशन ज़रूर करना चाइये।

2. बहू-बेटियों को नौकरी से नहीं रोकना चाइये और

3. लाइफ पार्टनर को पूरा टाइम डिवोट करना जरूरी है क्योंकि हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से।

‘सिकंदर’ बॉलीवुड मसाला फिल्म है, जो हर किसी को प्रभावित करने में पीछे रह जाती है। यह फिल्म तेज रफ्तार एक्शन, भव्य सेट्स और सलमान की स्टार पावर के सहारे चलती है, लेकिन कहानी और किरदारों की गहराई में कमी इसे औसत बनाती है। तमाम मसालों के बावजूद यह कोई नया या यादगार अनुभव नहीं देती।

अगर आप भाईजान के फैन हैं तो फिल्म पसंद आएगी। भाईजान की फिल्म है, तो पूरे टाइम परदे पर वे ही नज़र आएंगे। उनके साथ कभी रश्मिका मंदाना, कभी सत्यराज, कभी प्रतीक बब्बर, कभी शरमन जोशी, कभी काजल अग्रवाल तो कभी संजय कपूर भी नजर आ सकते हैं।
सलमान के फैंस के लिए देखनीय, वरना झेलनीय !
-प्रकाश हिन्दुस्तानी
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